नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशोऽध्यायः १२५
बाएं पैर से 'भ्रमरी' और दाहिने पैर से स्यन्दिता चारी का प्रदर्शन कर पृथ्वी
पर पैरों को जोर से पटके तो 'अङ्कित' मण्डल होजाता है ॥ ५६-५८ ॥
आद्यन्तु जनितं कृत्वा तेनैव च निकुट्टकम् ।
स एव शकटास्यश्च वामश्चास्कन्दितो भवेत् ॥ ५९ ॥
पादैश्च शकटास्यस्थैः पर्यायेणाथ मण्डलम् ।
विज्ञेयं शकटास्यन्तु व्यायामे युद्धमण्डलम् ॥ ६० ॥
शकटास्य—यदि दाहिने पैर द्वारा 'जनिता' चारी को और फिर इसे
तलसंचरपाद (निकुट्टक) लक्षण में गतिशील रखे, फिर इसी पैर से
'शकटास्य' चारी तथा बाएं पैर से स्यन्दिता (आस्यन्दिता) चारी का
प्रदर्शन करे । फिर शकटास्या चारी में दोनों पैरों के द्वारा क्रमशः गोल
घुमाव ले तो 'शकटास्य' मण्डल होता है । युद्धप्रदर्शन में इसी मण्डल की
योजना की जाती है ॥ ५९-६० ॥
आद्यस्तु जनितो भूत्वा स एवास्कन्दितो भवेत् ।
अपसर्पी पुनर्वामः शकटास्यश्च दक्षिणः ॥ ६१ ॥
भ्रान्त्वा चारीभिरेताभिः पर्यायेणाथ मण्डलम् ।
अध्यर्धमेतद्विज्ञेयं नियुद्धे चापि⁵ मण्डलम् ॥ ६२ ॥
अध्यर्ध—यदि दाहिने पैर द्वारा 'जनिता' चारी तथा पुनः उसी से
आस्कन्दिता चारी का प्रदर्शन करे, फिर बायां पैर अपक्रान्ता (अपसर्पित)
चारी का तथा दाहिना पैर शकटास्या चारी का रखे । इस प्रकार इन
चारियों में क्रमशः घुमते हुए मण्डल बनाया जाए तो उसे 'अध्यर्ध' मण्डल
जानो । इसकी बाहुयुद्ध में योजना की जाती है ॥ ६१-६२ ॥
सूचीमाद्यक्रमं कृत्वा ह्यपक्रान्तश्च वामकम् ।
भुजङ्गत्रासितैश्चाद्य² एवमेव³ च वामकः ॥ ६३ ॥
भुजङ्गत्रासितैर्भ्रान्त्वा पादैरपि⁴ च मण्डलम् ।
पिष्टकुट्टश्च विज्ञेयं चौरीभिर्मण्डलं¹ बुधैः ॥ ६४ ॥
पिष्टकुट्ट—यदि दाहिने पैर द्वारा 'सूची' चारी का तथा बाएं पैर से
अपक्रान्ता चारी का प्रदर्शन करे, फिर दाहिने पैर से भुजंगत्रासिता चारी
१. चारिमण्डलम्—ग० । २. त्रासितञ्चान्य—ग० ।
३. एष एव तु—ग० । ४. चारैरपि—० ।
५. नियुद्धे चारिमण्डलम्—ग० ।