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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

७२ नाट्यशास्त्रम्
उन्हें भी रस तथा भावों की सूचक चेष्टाओं के साथ स्वेच्छानुसार प्रयुक्त
करना चाहिए।
देशं कालं प्रयोगञ्चाप्यर्थयुक्तिमवेक्ष्य च।
हस्ता ह्येते प्रयोक्तव्या नृणां स्त्रीणां विशेषतः ॥ १५८ ॥
ये हस्तमुद्राएं पुरुषों तथा विशेषतः स्त्रियों के द्वारा देश, काल, प्रयोग
तथा योग्यता (अर्थयुक्ति) को देखकर प्रयुक्त की जाएं ॥ १५८ ॥
हस्तमुद्राओं की विविध क्रियाएं—
सर्वेषामेव हस्तानां यानि कर्माणि सन्ति वै।
तान्यहं सम्प्रवक्ष्यामि रसभावकृतानि तु ॥ १५९ ॥
उत्कर्षणं विकर्षणं तथा व्योकर्षणं पुनः।
परिग्रहो निग्रहश्चाह्वानं तोदनमेव च ॥ १६० ॥
संश्लेषश्च वियोगश्च रक्षणं मोक्षणन्तथा।
विक्षेपधूनने चैव विसर्गस्तर्जनन्तथा ॥ १६१ ॥
छेदनं भेदनञ्चैव स्फोटनं मोटनन्तथा।
ताडनञ्चेति विज्ञेयं तज्ज्ञैः कर्म करान् प्रति ॥ १६२ ॥
अब मैं (इन) सभी हस्तों की उन क्रियाओं को जो रस तथा भाव
से युक्त होती हैं—वर्णन करूंगा। ये क्रियाएं हैं—उत्कर्षण, (ऊपर की
ओर उछलना), विकर्षण (खींचना), व्याकर्षण (बाहर छिटकना), परिग्रह
(ग्रहण करना), निग्रह (विनाश करना), आह्वान (बुलाना, संकेत करना),
तोदन (ताड़न करना), संश्लेष (मिलना, मिलाना), वियोग (हटाना,
हटना), रक्षण (रक्षा करना), मोक्षण (फेंकना), विक्षेप (फेंकना, त्याग
करना), धूनन (हिलाना कंपाना); विसर्ग (ससम्मान अर्पण या त्याग
करना), छेदन (तोड़ना), भेदन (काटना), स्फोटन (विकसित करना), मोटन
(संकोच करना) तथा ताडन (पीटना) ॥ १५९–१६२ ॥
उत्तानः पार्श्वगश्चैव तथाधोमुख एव च।
हस्तप्रचारस्त्रिविधो नाट्यतत्त्वसमाश्रयः ॥ १६३ ॥
१. अर्थयुक्तिम्—ग०। २. सन्ति हि—ग०।
३. चैवापकर्षणम्—ग०। ४. परिग्रहश्चाप्याह्वानं ताडनं तर्जनं तथा—ख०।
५. नोदनं तथा—ग०। ६. विसर्गस्तदनन्तरम्—ग०।
७. मोहनं तथा—ग०।

नवमोऽध्यायः ७३
नाट्यतत्वों के (सिद्धान्त के) अनुसार हस्तप्रचार तीन प्रकार से किया
जाता है । यथा—(१) उत्तान (ऊपर की ओर मुंह करके), (२) पार्श्वग
(दायी या बांयी ओर मुंह करके) तथा (३) अधोमुख (नीचे की ओर
मुंह करके......) ॥ १६३ ॥
सर्वे हस्तप्रचाराश्च प्रयोगेषु यथाविधि ।
नेत्रभ्रूमुखरा^१गैद्यैः कर्तव्या व्यञ्जिता बुधैः ॥ १६४ ॥
इन हस्तप्रचारों को प्रयोग के समय शास्त्र निदर्शित विधि के साथ नेत्र,
भौंहे, मुखराग आदि के द्वारा बुद्धिमान प्रयोक्ताजन व्यक्त करें ॥ १६४ ॥
हस्तमुद्राओं का कार्य—
करणं कर्म स्थानं प्रचारयुक्तिं क्रियाञ्च ^२समवेक्ष्य ।
हस्ताभिनयः कार्यस्तज्ज्ञैर्लोकोपचारेण ॥ १६५ ॥
बुद्धिमान (प्रयोक्ता) जन इन हस्तों (हस्ताभिनयों) का लोक व्यवहार
के अनुसार प्रयोग करें तथा उसी समय इनके करण, (अध्याय ४ में वर्णित)
कर्म, (पताक आदि) स्थान, (ललाट आदि प्रदेश) प्रचार, (अल्प, मध्य
आदि) युक्ति (मुख्य या गौण बनाने का कारण) तथा क्रिया को
देख कर प्रयोग निश्चित कर लें ॥ १६५ ॥
उत्तमानां कराः कार्या ललाटक्षेत्रचारिणः ।
वक्षःस्थाश्चैव मध्यमानामधमानामधोगताः ॥ १६६ ॥
उत्तम पात्रों के हस्तों को ललाट प्रदेश के समीप, मध्यम पात्रों के
वक्षःस्थल के समीप तथा अधमपात्रों के इससे नीचे शरीर के भाग के समीप
क्रियाशील रखना चाहिए ॥ १६६ ॥
हस्तमुद्राओं का प्रचार—
ज्येष्ठे स्वल्पप्रचाराः स्युर्मध्ये^४ कुर्वीत मध्यमैः ।
अधमेषु प्रकीर्णाश्च हस्ताः कार्याः प्रयोक्तृभिः ॥ १६७ ॥
ज्येष्ठ अभिनय में इन हस्तमुद्राओं का प्रचार अल्प रहना चाहिए
मध्य में मध्यमप्रचार तथा अधम अभिनय में हस्त मुद्राओं का विपुलता
से प्रचार रहना चाहिए ॥ १६७ ॥
लक्षणव्यञ्जिता हस्ताः कार्यास्तूत्तममध्यमैः ।
लोकक्रियास्वभावेन नीचैरप्यर्थसंश्रयाः ॥ १६८ ॥
१. रागैश्च—ग० । २. सम्प्रेक्ष्य—ग० । ३. तज्ज्ञैः कार्यो—ग० ।
४. मध्ये मध्यविचारिणः—ख—ग० । ५. प्रकीर्णास्तु—ग० ।

७४ नाट्यशास्त्रम्
उत्तम तथा मध्यम पात्रों के द्वारा इन हस्तमुद्राओं का प्रयोग शास्त्रीय
लक्षणों के अनुसार अर्थाभिव्यक्ति करे परन्तु अधमपात्रों के द्वारा
लोकक्रियाओं का हस्ताभिनय में अनुसरण किया जाय ॥ १६८ ॥
अथवान्यादृशं प्राप्य प्रयोगं कालमेव च ।
विपरीताश्रया हस्ताः प्रयोक्तव्या बुधैर्न१ वा ॥ १६९ ॥
परन्तु जब कोई असम्मान्यप्रयोग या समय हो तो बुद्धिमान इन
हस्तमुद्राओं के प्रयोग को वर्णित लक्षण से भिन्न स्वरूप में संयोजित करे
या न भी करे ॥ १६९ ॥
विषण्णे मूर्च्छिते २ह्रीते जुगुप्सा-शोकपीडिते ।
ग्लाने ३स्वप्ने विहस्ते च निश्चेष्टे तन्द्रिते जडे ॥ १७० ॥
व्याधिग्रस्ते जरार्त्ते च भयार्त्ते शीतविप्लुते ।
मत्ते प्रमत्ते चोन्मत्ते चिन्तायां तपसि स्थिते ॥ १७१ ॥
हिमवर्षहते बद्धे ५वारिणि प्लवसंश्रिते ।
स्वप्नायिते च सम्भ्रान्ते ६नर्तनसंस्फोटने तथा ॥ १७२ ॥
न हस्ताभिनयः कार्यः कार्यः सत्त्वसमाश्रयः ।
तथा ७काकुविशेषश्च नानार्थ८रसभावकः ॥ १७३ ॥
जब कोई पात्र, खिन्न, मूर्च्छित, लज्जित, घृणा तथा शोक से प्रपीडित,
मलिन (ग्लान) सोया हुआ, लूला (विहस्त) बेहोश, तन्द्रिल, जड़,
बीमार, बुढ़ापे से त्रस्त, भय पीड़ित, ठंड से ठिठुरता हुआ या त्रस्त,
मदमत्त, पागल, चिन्तित, तप करते हुए, बर्फ या वर्षा के कारण त्रस्त
(आहत), कैद, जल या डोंगें में संचारशील, स्वप्न में बकते हुए, भ्रान्तियुक्त,
तथा नखों से कुरेदने या पटकनेवाला रहे तो ऐसी दशा में हस्त की
योजना न की जाए किन्तु अनेक अर्थ रस तथा भावों को अभिव्यक्त करने
वाला तथा विभिन्न स्वरों से अभिव्यक्त होने वाला रसाभिनय प्रारम्भ करना
चाहिए (या उसका ग्रहण करना चाहिए) ॥ १७०-१७३ ॥
१. बुधैर्नरैः—ग। २. भीते—ख०, ग०। ३. सुप्ते—ख०, ग०।
४. हिमवर्षगते—ख०, ग०। ५. बन्धे हरिणप्लवसंश्रिते—ख०, ग०।
६. नखसंस्फो—ख०, ग०। ७ तथाकारविशेषश्च—ख०, ग०।
८. नानाभावरसान्वितः—ख०, ग०।

नवमोऽध्यायः ७५
यत्र व्यग्रावुभौ हस्तौ तत्तैर्दृष्टिविलोकनैः ।
वाचिकाभिनयं कुर्याद् विरामैरर्थदर्शकः ॥ १७४ ॥
वाचिकाभिनय के समय विभिन्न ( तथा वर्णित उन सभी ) दृष्टियों
तथा अवलोकन क्रियाओं को हस्त क्रियाओं के अनुसार इस प्रकार दक्षता-
पूर्वक निदर्शित करना चाहिए जिससे कि उनके द्वारा प्रदर्शित वाचिक
अभिनय के विराम आदि नियमानुसार प्रस्तुत करने पर अर्थों की
( स्पष्टतः ) अभिव्यक्ति हो ॥ १७४ ॥
उत्तानः पार्श्वगश्चैव तथाऽधोमुख एव च ।
प्रचारस्त्रिविधोऽङ्गानां नाट्यनृत्तसमाश्रयः ॥ १७५ ॥
नाट्य तथा नृत्त में प्रयोग ( के समय प्रदर्शित ) किया जाने वाला
हस्त प्रचार त्रिविध है—यथा ( १ ) उत्तान, ( २ ) पार्श्वग तथा ( ३ )
अधोमुख ॥ १७५ ॥
उत्तानो वर्त्तुलस्त्र्यश्रः स्थितोऽधोमुख एव च ।
पञ्च प्रचारा हस्तस्य नाट्यनृत्तसमाश्रयाः ॥ १७६ ॥
अभिनय तथा नृत्य में हस्त प्रचार की पांच विधायें हैं । यथा ( १ )
उत्तान ( उपर की ओर हथेली का रहना ), ( २ ) वर्तुल ( गोल घुमाव
लेना ), ( ३ ) त्र्यस्त्र ( तिरछे या मोड़ कर घुमाना ), ( ४ ) स्थित
(स्थिर रहना) तथा ( ५ ) अधोमुख (हथेली को उल्टी करना) ॥ १७६ ॥
एवं ज्ञेयाः करा ह्येते नानाभिनयसंश्रयाः ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि करान् नृत्तसमाश्रयान् ॥ १७७ ॥
इस प्रकार अनेक रसों तथा भावों से सम्बद्ध अनेक हस्त मुद्राओं को
मैंने बतलाया अब मैं नृत्त हस्तों को बतलाता हूँ ॥ १७७ ॥
नृत्तहस्त—
वक्षसोऽष्टाङ्गुलस्थौ तु प्राङ्मुखौ कँटकामुखौ ।
समानकूर्परांसौ च चतुरस्रौ प्रकीर्तितौ ॥ १७८ ॥
१. नृत्तहस्त—नृत्त के अन्तर्गत होनेवाले विभिन्न प्रचार (चाल) शारीरिक
मुद्राओं तथा स्थितियों में शोभा, सौन्दर्य तथा आकर्षण उत्पन्न करने के लिए ही
१. तत्र दृष्टि—ख; यत्र दृष्टि—ग० ।
२. उत्तालोऽधस्तलस्तिर्यगूर्ध्वाऽधोमुख एव च । हस्तप्रचारा विज्ञेया नाट्ये
नृत्ते च पञ्चधा—ग० ।
३. पद्यमेतत् ग—पुस्तके नास्ति । ४. संश्रिताः—ग० ।
५ वक्षःस्थोऽष्टाङ्गुल—ग०। ६. खटका—क-ख०।

७६ नाट्यशास्त्रम्
चतुरस्र—छाती से आठ अंगुल के अन्तर पर सामने की ओर दोनों
हाथों को कटकामुखमुद्रा में तथा दोनों कन्धों तथा कोहनी को समान
ऊंचाई पर रखना 'चतुरस्र' कहलाता है ॥ १७८ ॥
हंसपक्षकृतौ हस्तौ व्यावृतौ तालवृन्तवत् ।
उद्वृत्ताविति विज्ञेयावथवा तालवृन्तकौ ॥ १७९ ॥
उद्वृत्तः—दो हंसपक्ष हस्तों को पंखे के समान हिलाना । इसका अन्य
नाम 'तालवृन्तक' भी है ॥ १७९ ॥
चतुरस्रस्थितौ हस्तौ हंसपक्षकृतौ तथा ।
तिर्यक्स्थितौ चाभिमुखौ ज्ञेयौ तलमुखाविति ॥ १८० ॥
तलमुख—चतुरस्त्र दशा में हंसपक्ष हस्तों को तिरछे तथा एक दूसरे
के सम्मुख रखना ॥ १८० ॥
तावेव मणिबन्धान्ते स्वस्तिकाकृतिसंस्थितौ ।
स्वस्तिकाविति विख्यातौ वियुतौ विप्रकीर्णकौ ॥ १८१ ॥
स्वस्तिक—यदि तलमुख नृत्त-हस्त कलाई पर से स्वस्तिक किये जाएं ।
विप्रकीर्ण—( तथा ) स्वस्तिक नृत्तहस्त के प्रदर्शन के पश्चात् उन्हें
हटा लेना ॥ १८१ ॥
नृत्त-हस्तों की सर्जना की गई । वस्तुतः ये नृत्तहस्त हाथ की विभिन्न अवस्थाएं
ही हैं क्योंकि इनसे किसी अर्थविशेष की प्रतीति नहीं होती; फिर भी अंग-भंगों
से जो लावण्य निखरता है उसमें नृतहस्तों का बड़ा हाथरहता है । ये समतोलपन
( Balance ) के सिद्धान्त पर निर्मित किये गये ( प्रतीत होते ) हैं, क्योंकि
समतलपन ( चतुरस्रता ) भी शरीर के सौन्दर्य में समाविष्ट माना जाता है ।
नृत्तहस्त हाथ, पैर तथा शरीर के सामंजस्य द्वारा सौन्दर्य उत्पन्न करते हैं और
नृत्यप्रदर्शन को शोभा शाली बनाते हैं । इसीलिए ये नृत्य के अलंकार माने गये ।
नृतहस्तों की उत्पत्ति संयुत तथा असंयुत हस्तमुद्राओं से हुई है परन्तु कुछ
नृत्तहस्तों में मिश्रमुद्राओं ( के भिन्न मुद्राओं में संयोजन ) की भी योजना रहती
है । नृतहस्त हाथ के चालन से निर्मित होने के कारण उनका रेखांकन संभव
नहीं; यही कारण है कि संयुत तथा असंयुतहस्तों के सभी रेखाचित्र दिये गए पर
नृत्तहस्तों के नहीं दिये जा सके ।

नवमोऽध्यायः ७७

अलपल्लव-संस्थानावूर्ध्वास्यौ पद्मकोशकौ ।
अरालकटकाख्यौ चाप्येरालखटकामुखौ ॥ १८२ ॥
अराल खटकामुख—दोनों अलपल्लव हस्तोँ को ऊपर हथेली रखते हुए
पद्मकोश हस्तोँ में परिवर्तित कर देना । इसका अन्य नाम 'अरालखटका'
भी है ॥ १८२ ॥
[ तथैव मणिबन्धान्ते हारलौ विच्युतावुभौ ।
ज्ञेयौ प्रयोक्तृभिर्नित्यम् अरालखटकाविति ॥ ]
(प्रक्षिप्तः—यदि दो अराल हस्तोँ को कलाई को नोक से स्वस्तिक के
बाद विच्युत कर दिया जाए तो उसे प्रयोक्तागण अरालखटकामुख जानें ।)
भुजांसकूर्पराग्रैस्तु कुटिलावर्तितौ करौ ।
पराङ्मुखतलौविद्धौ ज्ञेयावाविद्धवक्रकौ ॥ १८३ ॥
आविद्धवक्र—विपरीत बाहु, कंधा तथा कोहनी के कोनों को कुटिल
(तिरछी) गति से दोनों हाथों से स्पर्श करते हुए दोनों अराल मुद्रा की
हथेलियों को ऊपर तथा नीचे की ओर कंपित करते हुए बदलना ।
हस्तौ तु सर्पशिरसौ मध्यमाङ्गुष्ठकौ यदा ।
तिर्यक्प्रसारितास्यौ च तदा सूचीमुखौ स्मृतौ ॥ १८४ ॥
सूचीमुख—दो सर्पशीर्ष हस्तोँ को अपने अंगूठों के साथ तिरछे फैलाकर
हथेली के मध्य का (मध्यमांगुली का) स्पर्श करते हुए रखना ॥ १८४ ॥
[ संर्पशीर्षौ यदा हस्तौ भवेतां स्वस्तिकस्थितौ ।
मध्यप्रसारिताङ्गुष्ठौ ज्ञेयौ सूचीमुखौ तदा ]
अथवा स्वस्तिक के पश्चात् (यदि) दो सर्पशीर्ष हस्तोँ को मध्यमां-
गुली के पास हथेली में अंगूठों का स्पर्श करते हुए रखना सूचीमुख है।
रेचितौ वापि विज्ञेयौ हंसपक्षौ द्रुतभ्रमौ ।
प्रसारितोत्तानतलौ रेचिताविति संज्ञितौ ॥ १८५ ॥
रेचित—दो हंसपक्ष हस्तोँ को तेजी से घुमाकर हथेली को ऊपर की
ओर मुंह कराते हुए फैला देना ॥ १८५ ॥
१. खटका—क-ख० । २. वाप्य-ख; वा—ग० ।
३. पद्यमेतत्—ग-पुस्तके नास्ति । ४. हारालविच्युता—ख० ।
५ मुखतया—ख० । ६. मध्यस्था—ख० ।
७ पद्यमेतत् ग—पुस्तके नास्ति । ८. हंसपक्षोद्धृतभ्रमौ—ख० ।
९. संस्थितौ—ख० ।

चतुरश्रो भवेद्वामः सव्यहस्तश्च रेचितः ।
विज्ञेयौ नृत्ततत्त्वज्ञैरर्धरेचितसंज्ञितौ ॥ १८६ ॥
अर्धरेचित—बाएं हाथ को चतुरस्र तथा दाहिने हाथ को रेचित
करना नृत्त के विद्वानों के मत में 'अर्धरेचित' है ॥ १८६ ॥
अञ्चितौ कूर्परांसौ तु त्रिपताकौ करौ कृतौ ।
किञ्चित्तिर्यग्गतावेतौ स्मृतावुत्तानवञ्चितौ ॥ १८७ ॥
उत्तानवंचित—दो त्रिपताक हस्तों को कुछ तिरछे और कुछ नमाते
हुए रखना तथा कन्धों और केहुनियों को हिलाना ॥ १८७ ॥
मणिबन्धनमुक्तौ तु पताकौ पल्लवौ स्मृतौ ।
बाहुशीर्षाद्विनिष्क्रान्तौ नितम्बाविति कीर्तितौ ॥ १८८ ॥
पल्लव—कलाई से दो पताक हस्तों को मिलाना (तथा हाथों को
कन्धे के बराबर रखना)
नितम्ब—(पल्लव हस्त को या) दो पताक हस्तों को कन्धे से ऊपर
निकाल कर ले जाना ॥ १८८ ॥
केशदेशाद्विनिष्क्रान्तौ परिपार्श्वोत्थितौ तथा ।
विज्ञेयौ केशबन्धौ तु करावाचार्यसम्मतौ ॥ १८९ ॥
केशबन्ध—केश प्रदेश या शिखा पर से ऊपर घुमाकर दोनों (पताक-)
हस्तों को दोनों बाजुओं में (सीधा) रखना ॥ १८६ ॥
तिर्यक् प्रसारितौ चैव पार्श्वसंस्थौ तथैव च ।
लताख्यौ च करौ ज्ञेयौ नृत्ताभिनयने प्रति ॥ १९० ॥
लता—(बन्ध)—दोनों हाथों को तिरछे फैलाकर बाद में दोनों
बाजुओं में फैलाकर रखना ॥ १९० ॥
समुन्नतो लताहस्तः पार्श्वात् पार्श्वं विलोलितः ।
त्रिपताकोऽपरः कर्णे करिहस्तैः प्रकीर्तितः ॥ १९१ ॥
करिहस्त—लता हस्त करने के बाद उसे ऊंचा करते हुए एक बाजू से
दूसरी बाजू की ओर झुलाना (विलोळित) तथा बाद में एक हाथ का
त्रिपताक मुद्रा में कर्ण के समीप रखना ॥ १९१ ॥
१. त्रिपताकाकृतौ करौ—ख-ग०। २. परिपार्श्वस्थितौ—ख०।
३. केशबन्धाख्यौ—ख-ग०। ४. करिहस्तौ प्रकीर्तितौ—ग०।

नवमोऽध्यायः ७९
कटिशीर्षनिवि¹ष्टौ द्वौ त्रिपताकौ यदा करौ ।
पक्षवञ्चितकौ हस्तौ तदा ज्ञेयौ प्रयोक्तृभिः ॥ १९२ ॥
पक्षवंचितक—एक त्रिपताक हस्त कटि प्रदेश पर तथा दूसरा शीर्ष
स्थान (के बराबर—) पर रखना ॥ १९२ ॥
तावेव तु परावृत्तौ पक्षप्रद्योतकौ स्मृतौ ।
अधोमुखतलाविद्धौ ज्ञेयौ गरुडपक्षको ॥ १९३ ॥
पक्षप्रद्योतक—पक्षवंचितक हस्तोँ को उलटे कर देना ।
गरुडपक्ष—पक्षवंचित हस्त को औंधी हथेली करते हुए रखना ॥१९३॥
हंसपक्षकृतौ हस्तौ व्यावृत्तपरिवर्तितौ ।
तथो² प्रसारितभुजौ दण्डपक्षाविति स्मृतौ ॥ १९४ ॥
दण्डपक्ष :—दोनों हंसपक्ष हस्तोँ को क्रमशः उलटे सीधे घुमाकर
(तथा) बाद में कोहनी से कंधे तक बाहुओं को सीधे फैलाकर रखना ॥१९४॥
ऊर्ध्वमण्डलिनौ हस्तौ ऊर्ध्वदेशविवर्तनात् ।
तावेव पार्श्वविन्यस्तौ पार्श्वमण्डलिनौ स्मृतौ ॥ १९५ ॥
ऊर्ध्वमण्डली—दण्डपक्ष हस्त को ऊपर की ओर गोल (चक्कर)
घुमाना ।
पार्श्वमण्डली—एक बाजू में ऊर्ध्वमण्डली हस्तोँ को रखना ॥ १९५ ॥
उद्वेष्टितो भवेदेको द्वितीय³श्चापवेष्टितः ।
भ्र⁴मितावुरसः स्थाने ह्युरोमण्डलिनौ स्मृतौ ॥ १९६ ॥
उरोमण्डली—एक उद्वेष्टित (ऊपर की ओर उठाए हुए) तथा दूसरे
अपवेष्टित (नीचे की ओर झुके हुए) हस्त को वक्षःस्थल के समीप घुमाते
हुए रखना ॥ १९६ ॥
अलपल्लवकारालावुरोऽर्धभ्रमणक्रमात् ।
पार्श्वार्वतश्च विज्ञेयावुरःपार्श्वार्धमण्डलौ ॥ १९७ ॥
उरःपार्श्वमण्डल—अलपल्लव तथा अराल हस्तोँ को आधा घुमाव
देकर एक को बाजू में व दूसरे को ऊपर (वक्षःस्थल के समीप) रखना ॥१९७॥
१. शीर्षनिविष्टाग्रौ—ग० । २. यथा—ग० ।
३. द्वितीयश्च विवेष्टितः—ग० । ४. भ्रामिता—ख ।
५. अरालपल्लवकरावुरो—ख० ।

हस्तौ तु मणिबन्धान्ते कुञ्चितावञ्चितौ यदा ।
खटकाख्यौ कृतौ स्यातां मुष्टिकस्वस्तिकौ तदा ॥ १९८ ॥
मुष्टिकस्वस्तिक—दो खटकामुख हस्तों की कलाई के कोनो पर झुकाते
हुए तथा गोल घुमाव देते हुए उद्वेष्टित करण में रखना ॥ १९८ ॥
पद्मकोशौ यदा हस्तौ व्योवृत्तपरिवर्तितौ ।
नलिनीपद्मकोशौ तु तदा ज्ञेयौ प्रयोक्तृभिः ॥ १९९ ॥
नलिनीपद्मकोश—पद्मकोश हस्तों को औंधे सीधे (घुमाव देना या)
पलटना ॥ १९९ ॥
करावुद्वेष्टिताग्रौ च प्रविधायालपल्लवौ ।
ऊर्ध्वप्रसारिताविद्धौ कर्त्तव्यावुल्बणाविति ॥ २०० ॥
अलपल्लव—दोनों हाथों को ऊपर की ओर घुमाव देते हुए उद्वेष्टित
करण में रखना ।
उल्बण—अलपल्लव हस्तों को ऊपर की ओर फैलाकर (कन्धे के बराबर)
घुमाया जाना ॥ २०० ॥
पल्लवौ च शिरोदेशं⁴ सम्प्राप्तौ ललितौ स्मृतौ ।
कूर्परस्वस्तिकगतौ लताख्यौ वलिताविति ॥ २०१ ॥
ललित—दो पल्लव हस्तों को सिर पर (घुमाव देना) ले जाना ।
वलित—दो लता हस्तों को कलाई पर स्वस्तिक कर देना ॥ २०१ ॥
करणे तु प्रयोक्तव्या नृत्तहस्ता विशेषतः ।
तथार्थाभिनये चैव पताकाद्याः प्रयोक्तृभिः ॥ २०२ ॥
नृत्तहस्तों का विशेष रूप से प्रयोग करणों के निर्माणार्थ करना चाहिए
तथा अर्थाभिनय के प्रदर्शन में भी करना चाहिए जैसा कि पताक आदि
हस्तमुद्राओं का अर्थ प्रदर्शन हेतु प्रयोग किया जाता है ॥ २०२ ॥
सङ्करोऽपि भवेत्तेषां प्रयोगोऽर्थवशात् पुनः ।
प्राधान्येन पुनस्सञ्ज्ञा नाट्ये नृत्ते करेष्विह ॥ २०३ ॥
१. कटकाख्यौ तु तौ—ग० । २. व्यावत्तै—ग०
३. विज्ञेयावुल्वणावपि—ख; विज्ञेयौ उल्बणाविति—ग० ।
४. एतत् पद्यत्रयं ख-पुस्तके नास्ति । ५. शिरोदेशे—ग० ।
६. ललिताविति—ग० ।

नवमोऽध्यायः ८१
वियुतास्संयुताश्चैव नृत्तहस्ताः प्रकीर्तिताः ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि करांन् करणसंश्रयान् ॥ २०४ ॥
किन्तु आवश्यकतानुसार इनका प्रयोग मिश्रित (या आन्तरिक परि-
वर्तन के साथ) भी हो सकता है पर नाट्य तथा नृत्य में इन हस्तों का
इनके कथित नामों (संज्ञाओं) के अनुसार ही प्रयोग होता है। नृत्तहस्त
संयुक्त तथा असंयुत दोनों प्रकार के होते हैं। अब मैं करणों¹ से सम्बद्ध
'हस्तों' (की क्रियाओं) को बतलाता हूँ ॥ २०३-२०४ ॥
हस्तकरणों के चार प्रकार :-
सर्वेषामेव हस्तानां नाट्यहस्तनिदेशिभिः ।
विज्ञातव्यं प्रयत्नेन करणन्तु चतुर्विधम् ॥ २०५ ॥
अथावेष्टितमेकं स्यादुद्वेष्टितमथापरम् ।
व्यावर्तितं तृतीयन्तु चतुर्थं परिवर्तितम् ॥ २०६ ॥
नाट्य तथा हस्ताभिनय के विशेषज्ञों ने हाथों के चार विभाग किये
हैं। इनको ध्यान से जान लेना उचित है। ये चार करण के विभाग
(इस प्रकार) हैं :—(१) आवेष्टित, (२) उद्वेष्टित, (३) व्यावर्तित
तथा (४) परिवर्तित ॥ २०५-२०६ ॥
आवेष्ट्यन्ते यदाङ्गुल्यस्तर्जन्याद्या यथाक्रमम् ।
अभ्यन्तरेण करणं तदावेष्टितमुच्यते ॥ २०७ ॥
आवेष्टित—तर्जनी अंगुली से प्रारम्भ होकर सभी अंगुलियाँ वेष्टित
होती हों और हाथ गोल घुमाव से रहा हो तो इस करण को 'आवेष्टित'
जानो ॥ २०७ ॥
उद्वेष्ट्यन्ते यदाङ्गुल्यस्तर्जन्यैद्या बहिर्मुखम् ।
क्रमशः करणं विप्रास्तदुद्वेष्टितमुच्यते ॥ २०८ ॥
उद्वेष्टित—जब तर्जनी से प्रारंभ होकर सभी उंगलियों द्वारा क्रमशः
हस्त को बाहरी भाग से आवेष्टित किया जाए और फिर हाथ गोल घुमाव
ले तो उसे 'व्यावर्तित' करण जानो ॥ २०८ ॥
१. ये 'करण' चतुर्थाध्याय के ताण्डव में प्रयुक्त करणों से भिन्न है।
१. करणं हस्तसंश्रयम्—ग० । २. नाट्यहस्ते निदेशिभिः—ख० ।
३. विज्ञातव्या—ख० । ४. तर्जन्या बहिर्मुखाः—ग० ।
६ ना० शा० द्वि०

८२ नाट्यशास्त्रम्
आवर्त्यन्ते कनिष्ठाद्या अङ्गुल्योऽभ्यन्तरेण तु ।
यथाक्रमेण करणं तद् व्यावर्त्तितमुच्यते ।। २०९ ।।
व्यावर्तित—यदि कनिष्ठिका उंगली से प्रारंभ हो कर सभी उंगलियों
को क्रमशः भीतरी भाग से आवेष्टित किया जाए और हाथ गोल घुमाव ले
तो उसे 'व्यावर्तित' करण जानो ।। २०६ ।।
उद्वर्त्यन्ते कनिष्ठाद्या बाह्यतः क्रमशो यदा ।
अङ्गुल्यः करणं विप्रास्तदुक्तं परिवर्तितम् ।। २१० ।।
परिवर्तित—जब कनिष्ठिका उंगली से प्रारम्भ होकर सभी उंगलियां
क्रमशः हस्त को बाहरी भाग से आवेष्टित करें और हस्त गोल घुमाव ले
तो यह 'परिवर्तित' कहलाता है ।। २१० ।।
नृत्तेऽभिनययोगे च पाणिभिर्वर्तनाश्रयैः ।
मुख-भ्रू-नेत्रयुक्तानि करणानि प्रयोजयेत् ।। २११ ।।
जब नृत्त तथा नाट्य अभिनय की दशा में इन हस्तों को उनकी विभिन्न
क्रियाओं में प्रदर्शित किया जाए तो उन्हें मुख, भौंहें तथा नेत्र के अनुसार
करणों के द्वारा अनुसृत करते हुए रखा जाए ।। २११ ।।
तिर्यक् तथोर्ध्वसंस्थो ह्यधोमुखश्चाञ्चितोऽपविद्धस्तु ।
मण्डलगतिस्तथा स्वस्तिकश्च पृष्ठानुसारी च ।। २१२ ।।
उद्वेष्टितःप्रसारित इत्येते वै स्मृताः प्रकारास्तु ।
बाह्वोरिति करणगता विज्ञेया नर्तकैर्नित्यम् ।। २१३ ।।
नर्तकों को करणों में स्थित बाहुओं के इन (दस) प्रकारों का सदैव
ज्ञान रखना चाहिए। ये हैं (१) तिर्यक, (२) ऊर्ध्वसंस्थ, (३) अधोमुख,
(४) अञ्चित, (५) अपविद्ध, (६) मंडलगति, (७) स्वस्तिक, (८)
पृष्ठानुसारी, (९) उद्वेष्टित तथा (१०) प्रसारित ।। २१२-२१३ ।।
१. आवर्तन्ते—ग० । २. यत्तु क्रमेण—ग० । ३. उद्वर्तन्ते—ग० ।
४. ग—पुस्तकेतु तिर्यगूर्ध्वगतञ्चैव तथाधोमुख एव च ।
आविद्धश्चापविद्धश्च मण्डलस्वस्तिकस्तथा ।।
अञ्चितः कुञ्चितश्चैव पृष्ठगश्चेतिचोदितः ।
बाहुप्रकारो दशधा नाट्यनृत्तप्रयोक्तृभिः ।। इत्यधिकम् ।
५. विज्ञेया निवर्तकैः—ख० ।

नवमोऽध्यायः ८३
हस्तानां करणविधिर्मया समासेन निगदितो विप्राः
अत ऊर्ध्वं व्याख्यास्ये हृदयोदरपार्श्वकर्माणि ॥ २१४ ॥
हे मुनिजन, इस प्रकार संक्षेप में मैंने करणों की हस्ताभिनय द्वारा
होने वाली विधि बतलाई । अब मैं हृदय, ( वक्षस्थल ) उदर तथा बाजुओं
के अभिनय कार्यों को बतलाता हूँ ॥ २१४ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे हस्ताभिनयो नाम नवमोऽध्यायः ॥
॥ भरतनाट्यशास्त्र का 'हस्ताभिनय' नामक नवम अध्याय समाप्त ॥
१. क० ख—पुस्तकयोर्नात्राध्यायसमाप्तिः ।

दशमोऽध्यायः
वक्षःस्थल—भेद, लक्षण तथा योजना
आभुग्नमथ निर्भुग्नं तथा चैव प्रकम्पितम् ।
उद्वाहितं समञ्चैव ह्युरैः पञ्चविधं स्मृतम् ॥ १ ॥
वक्षःस्थल के पांच प्रकार हैं । यथा—( १ ) आभुग्न, ( २ ) निर्भुग्न,
( ३ ) प्रकम्पित, ( ४ ) उद्वाहित तथा ( ५ ) सम ॥ १ ॥
निम्नमुन्नतपृष्ठञ्च व्याभुग्नांसं श्लथं कचित् ।
आभुग्नं तदुरो ज्ञेयं कर्म चास्य निबोधत ॥ २ ॥
सम्भ्रमविषादमूर्च्छाशोकभयव्याधिहृदयशल्येषु ।
कार्य शीतस्पर्शे वर्षे लज्जाऽन्वितेऽर्थवशात् ॥ ३ ॥
आभुग्न—यदि स्कन्ध झुके हुए, पीठ उठी हुई तथा वक्षःस्थल और
दोनों कन्धे नीचे झुके हों तो 'आभुग्न' वक्षस्थल कहलाता है। इसकी
योजना सम्भ्रम, विषाद, मूर्च्छा, शोक, भय, व्याधि, हृदयशल्य, शीतस्पर्श,
वर्षा तथा लज्जा में (आवश्यकतानुसार) की जाती है ॥ २-३ ॥
स्तब्धञ्च निम्नपृष्ठञ्च निर्भुग्नांसैसमुन्नतम् ।
उरो निर्भुग्नमेतद्धि कर्म चास्य निबोधत ॥ ४ ॥
स्तम्भे मानग्रहणे विस्मयदृष्टे च सत्यवचने च ।
अहमिति च दर्पवचने गर्वोत्सेके च कर्त्तव्यम् ॥ ५ ॥
निर्भुग्नः—यदि वक्षःस्थल दृढ़, पीठ झुकी हुई तथा कन्धे (न झुक कर)
उठे हुए हों तो उसे 'निर्भुग्न' वक्षःस्थल जानो ।
इसकी योजना स्तम्भ, मान, विस्मयपूर्वक अवलोकन, सत्यवचन,
'अहम्' (गर्वयुक्त) वचन तथा गर्वातिशय (उत्सेक) में करनी चाहिए ॥४-५॥
[ दीर्घनिःश्वसिते चैव जृम्भणे मोटने तथा ।
बिब्बोके च पुनः स्त्रीणां तद्विज्ञेयं प्रयोक्तृभिः ]
१. उरः—ग० २ व्याभुग्नं संश्लथं—ख-ग ।
३. शिल्पेषु—ख० । ४. लज्जायिते—ग० ।
५. निर्भुग्नांसं समुन्नतम्—ग० । ६. गर्वोत्साहे तु—ग० ।

दशमोऽध्यायः ८५
(प्रक्षिप्त—दीर्घनिश्वास, जृम्भा, अंगों के मरोड़ने तथा स्त्रियों के
विव्वोक की दशा में भी प्रयोक्ताजन इसकी योजना करें ।)
ऊर्ध्वक्षेपैरुरो यन्नै¹ निरन्तरकृतैः कृतम् ।
प्रकम्पितञ्च तज्ज्ञेयमुरो नाट्यप्रयोक्तृभिः ॥ ६ ॥
प्रकम्पित—यदि वक्षःस्थल निरन्तर फुलाया तथा सिकुड़ाया जाए
तो 'प्रकम्पित' वक्षःस्थल कहलाता है ॥ ६ ॥
हसितरुदितेषु कार्यं श्रमे भये श्वासकासयोश्चैव ।
हिक्के दुःखे च तथा नाट्यज्ञैरर्थयोगेन ॥ ७ ॥
इसकी योजना हास्य, रुदन, श्रम, भय, श्वास, कास, हिक्का तथा
दुःख की दशा में स्थिति के अनुसार करनी चाहिये ॥ ७ ॥
उद्वाहितं तूर्ध्व³कृतमुरो ज्ञेयं प्रयो⁴क्तृभिः ।
⁵दीर्घोच्छ्वासोन्नतालोके जृम्भणादिषु चेष्यते ॥ ८ ॥
उद्वाहित—यदि वक्षःस्थल को उठा हुआ रखे तो 'उद्वहित' वक्षःस्थल
होता है। इसे दीर्घ उच्छ्वास, ऊँची वस्तु का अवलोकन तथा जंभाई लेने
की अवस्था में प्रयुक्त करना चाहिए ॥ ८ ॥
सर्वैरेवाङ्गविन्यासैश्चतुरश्रकृतैः कृतम् ।
उरः समन्तु विज्ञेयं स्वस्थं सौष्ठवसंयुतम् ॥ ९ ॥
सम—सभी अवयव चतुरस्र हों (समान रहे) तथा सौष्ठव युक्त हों
तो (वह) वक्षःस्थल 'सम' (स्वाभाविक) कहलाता है। इसे स्वाभाविक
दशा के अभिनय में प्रयुक्त करें ॥ ९ ॥
पार्श्व—भेद लक्षण तथा योजना—
एतदुक्तं मया सम्यगुरसस्तु विकल्पनम् ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि पार्श्वयोरिह लक्षणम् ॥ १० ॥
इस प्रकार मैंने वक्षःस्थल के विभेद बतलाए । अब मैं 'पार्श्व' (कोख)
के लक्षण बतलाता हूँ ।
१. यत्तु—ग० ।
२. हसितरुदितादिसम्भ्रमश्रमव्याधिपीडितार्थेषु । नानाभावोपगतं कार्यमुरो
नाट्ययोगेषु ॥—ग० ।
३. मूर्ध्वंगत—ग० । ४. प्रयोगतः—ग० ।
५. दीर्घोच्छ्वसनता—ग। ६. सर्वैः ससौष्ठवैरङ्गैः—ग० ।

८६ नाट्यशास्त्रम्
नतं समुन्नतञ्चैव प्रसारितविवर्तिते ।
तथोपसृतमेवन्तु पार्श्वयोः कर्म पञ्चधा ॥ ११ ॥
पार्श्व के पांच प्रकार हैं। यथा--(१) नत, (२) समुन्नत, (३)
प्रसारित, (४) विवर्तित तथा (५) अपसृत ॥ ११ ॥
कटी भवेत्तु व्याभुग्ना पार्श्वमाभुग्नमेव च ।
तथैवापसृतांसञ्च किञ्चित्पार्श्वं नतं स्मृतम् ॥ १२ ॥
नत—यदि कटी तथा उसी ओर की पार्श्व (बाजू) थोड़ी झुकी हुई
और कन्धा नमता हुआ रखा जाए तो 'नत' पार्श्व जानो ॥ १२ ॥
नतस्यैवापरं पार्श्वं विपरीतन्तु युक्तितः ।
कटिपार्श्वभुजांसैश्चाभ्युन्नतैरुन्नतं भवेत् ॥ १३ ॥
समुन्नत—यदि, दूसरी बाजू (जो कि नत पार्श्व की हो) उठी हुई
रहे तथा कटि, पार्श्व, भुजा और कन्धा भी (जिसके कारण) उठा हुआ
हो तो 'समुन्नत' पार्श्व जानो ॥ १३ ॥
आयामानादुभयतः पार्श्वयोः स्यात् प्रसारितम् ।
परिवर्तत् त्रिकस्यापि विवर्तितमिहेष्यते ॥ १४ ॥
प्रसारित—यदि कोख की दोनों बाजुओं को उनकी अपनी दिशा में
फैलाया जाए तो 'प्रसारित' पार्श्व होता है ।
विवर्तित—यदि त्रिक (पीठ) को एक घुमाव दिया जाए तो 'विवर्तित'
पार्श्व होता है ॥ १४ ॥
विवर्तनापनयनाद् भवेदपसृतं पुनः ।
पार्श्वलक्षणमित्युक्तं विनियोगं निबोधत ॥ १५ ॥
अपसृत—यदि विवर्तित (पार्श्व) की स्थिति से पार्श्व-भाग पुनः
अपनी मूल-स्थिति में आ जाए तो उसे 'अपसृत' पार्श्व जानो। (इस प्रकार)
मैंने पार्श्वलक्षण बतलाए अब इनकी योजना सुनिये ॥ १५ ॥
उपसर्पे नतं कार्यमुन्नतं चापसर्पणे ।
प्रसारितं प्रहर्षादौ परिवृत्ते विवर्तितम् ॥ १६ ॥
१. तथा प्रसृतमेतत्—ग० । २. कटिर्भवेत्तु—ग० ।
३. तस्यैव चापरं—ख०, ग० । ४. श्चाप्युन्नतः—ख० ।
५. परिवर्तित्रिकस्यापि—ख-ग० ।
६. विवर्तितोपनयनात्—ख०, विवर्तितापनयनात्—ग० ।
७. परिवर्त्तौ—ग० ।

दशमोऽध्यायः ८७
विनिवृत्ते त्वपसृतं पार्श्वमर्थवशाद् भवेत् ।
एतानि पार्श्वकर्माणि जठरस्य निबोधत ॥ १७ ॥
किसी व्यक्ति के पास आने में 'नत' की, पीछे खिसकने में 'समुन्नत'
की, अतिहर्ष में 'प्रसारित' की, पीछे घूमने में 'विवर्तित' की तथा लौटने
(विनिवृत्त-पीछे घूमने) में 'अपसृत' की योजना करनी चाहिए। इस
प्रकार पार्श्व (कोख) के ये भेद तथा कार्य बतलाए हैं। अब मैं उदर के
लक्षण बतलाता हूँ ॥ १६-१७ ॥
उदर-- (भेद, लक्षण तथा योजना)
क्षामं खल्वञ्च पूर्णञ्च सम्प्रोक्तमुदरं त्रिधा ।
तनु क्षामं नतं खल्वं पूर्णमाध्मातमुच्यते ॥ १८ ॥
उदर के तीन प्रकार हैं। (१) क्षाम, (२) खल्व तथा (३) पूर्ण।
इनमें दुबला या खिंचा हुआ उदर 'क्षाम', झुका हुआ 'खल्व' तथा भरा
हुआ 'पूर्ण' कहलाता है ॥ १८ ॥
क्षामं हास्ये¹ऽथ रुदिते निःश्वासे जृम्भणे भवेत् ।
व्याधिते तपसि² श्रान्ते क्षुधार्ते खल्वमिष्यते ॥ १९ ॥
³पूर्णमुच्छ्वसिते स्थूले व्याधितात्यशनादिषु ।
योजना--हास्य, रुदन, निश्वास तथा जंभाई लेने में 'क्षाम' की,
बीमारी, तपस्या, थकावट तथा भूख में 'खल्व' की तथा उच्छ्वास, स्थूलता,
व्याधि तथा अतिशय भोजन करने में 'पूर्ण' उदर की योजना करना
चाहिए ।
[ ⁴क्षामं खल्लं समं पूर्णमुदरं स्याच्चतुर्विधम् । ]
(प्रक्षिप्त—क्षाम, खल्व, सम तथा पूर्ण भेद से उदर के चार प्रकार हैं)
इत्येतदु⁵दरस्योक्तं कर्म⁶ कट्या निबोधत ॥ २० ॥
इस प्रकार मैंने उदर के कार्य बतलाए। अब मैं कटि के कार्य बतलाता
हूँ ॥ १९-२० ॥
१. हासे च—ग० । २. तपसा—क० ।
३. पूर्णमुच्चलितं स्थूले व्याधितन्द्राशनादिषु—ख—ग० ।
४. एतत्पद्यार्धं ग—पुस्तके नास्ति । ५. इत्येतदुदरं प्रोक्तं—ग० ।
६. कटचाः कर्म—ग० ।

५८ नाट्यशास्त्रम्
कटि—(भेद, लक्षण तथा योजना)
छिन्ना चैव निवृत्ता च रेचिता कम्पिता तथा ।
उद्वाहिता चेति कटी नाट्ये¹ नृत्ते च पञ्चधा ॥ २१ ॥
नाट्य तथा नृत्त में उपयोगी 'कटि' के पांच प्रकार हैं :—(१) छिन्ना,
(२) निवृत्ता, (३) रेचिता, (४) कम्पिता तथा (५) उद्वाहिता ।
कटी मध्यस्य वलनाच्छिन्ना सम्परिकीर्तिता ।
पराङ्मुखस्याभिमुखी निवृत्ता स्यान्निवर्तिता ॥ २२ ॥
सर्वतो भ्रमणाच्चापि विज्ञेया रेचिता कटी ।
तिर्यग्गतागता क्षिप्रं कटी ज्ञेया प्रकम्पिता ॥ २३ ॥
नितम्बपार्श्वोद्वहनाच्छनैरुद्वाहिता कटी ।
बीच से (मध्य-भाग में) लचकती हुई रहनेवाली कटि 'छिन्ना'
कहलाती है, सामने की ओर घुमाव देकर फिर सामने की ओर उठाकर
रखने या लौटाने पर 'निवृत्ता', चारों ओर घुमाव देने पर 'रेचिता',
द्रुतगति से आड़ी तिरछी आने जाने वाली 'कम्पिता' तथा बगल और
नितम्ब भाग से ऊपर की ओर धीरे-धीरे उठाने पर 'उद्वाहिता' कटि
कहलाती है ॥ २२-२४ ॥
⁴कटिकर्म मया प्रोक्तं विनियोगं निबोधत ॥ २४ ॥
छिन्ना व्यायामसंभ्रान्तव्यावृत्त प्रेक्षणादिषु ।
निवृत्ता वर्तने चैव रेचिता ⁵भ्रमणादिषु ॥ २५ ॥
कुब्ज-वामन-नीचानां गतौ कार्या प्रकम्पिता ।
स्थूलेषूद्वाहिता योज्या स्त्रीणां लीलागतेषु च ॥ २६ ॥
इस प्रकार मैंने कटि (कर्म) के लक्षण बतलाए अब मैं इनकी योजना
बतलाता हूँ।
'छिन्ना' की व्यायाम, भ्रान्ति तथा पीछे घूम कर देखने में, गोल,
घूमने में 'निवृत्ता' की, भ्रमण आदि सामान्य क्रियाओं में 'रेचिता' की,
कूबड़े (कुब्ज), बौने तथा नीच प्रकृति के पुरुषों की चाल में 'प्रकम्पिता'
की तथा स्थूल पुरुष और स्त्रियों की लीला-पूर्ण (ललित) गति में
'उद्वाहिता' कटि की योजना करनी चाहिए ॥ २४-२६ ॥
१. नाट्यनृत्ते—ग० । २. तिर्यंगता गताक्षिप्ता—ख-ग० ।
३. नितम्बोद्वहनाच्चैव क्रमेणोद्वाहिता स्मृता—क०।
४. पुनश्चासां प्रवक्ष्यामि विनियोग-प्रयोजनम्—क-ख०।
५. भ्रमणेषु च—ग०।

दशमोऽध्यायः ८९
ऊरू—( भेद एवं लक्षण )
कम्पनं वलनञ्चैव स्तम्भनोद्वर्तने तथा ।
विवर्तनञ्च पञ्चैतान्यूरु-कर्माणि योजयेत् ॥ २७ ॥
ऊरू (पिंडलियां) की पांच अवस्थाएं होती हैं। (१) कम्पन, (२)
चलन, (३) स्तम्भन, (४) उद्वर्तन तथा, (५) विवर्तन ॥ २७ ॥
नमनोन्नमनात् पाष्णेर्मुहुः स्यादूरुकम्पनम् ।
गच्छेद्भ्यन्तरं जानु यत्तु तद्वलितं स्मृतम् ।
स्तम्भनञ्चात्र विज्ञेयमपविद्धक्रियात्मकम् ॥ २८ ॥
वलिता विद्धकरणादुद्वर्तनमितीरितम् ।
पार्ष्णिरभ्यन्तरं गच्छेद्यत्र तत्तु निवर्तनम् ॥ २९ ॥
बार-बार पैर की एड़ी के अग्रभाग (पाष्णि) को ऊपर तथा नीचे धुजाना
(या लेजाना) 'कम्पन' कहलाता है। पैर घुटने के अन्दर के भाग में रहें
और पिंडलियां गति शील हो तो 'वलित'; स्थिर गति रखना 'स्तम्भन',
घुटनों को सिकुड़ाना तथा हिलाना 'उद्वर्तन' तथा पैर की एड़ी को अन्दर
की ओर सिकुड़ाना 'विवर्तन' कहलाता है ॥ २८-२९ ॥
गतिष्वधमपात्राणां भये चापि हि कम्पनम् ।
वलनञ्चैव कर्त्तव्यं स्त्रीणां स्वैरपरिक्रमे ॥ ३० ॥
साध्वसे च विषादे च स्तम्भनं सम्प्रयोजयेत् ।
व्यायामे ताण्डवे चैव कार्यमुद्वर्तनं बुधैः ॥ ३१ ॥
निवर्तनञ्च कर्तव्यं सम्भ्रमादि परिक्रमे ।
योजना—अधमपात्रों की चाल (गति) तथा भय की दशा में 'कम्पन'
की, स्त्री की यथेच्छ गति में 'वलन' की, भय और विषाद की अवस्था में
'स्तम्भन' की, व्यायाम तथा ताण्डवनृत्य में 'उद्वर्तन' की तथा भ्रान्त और
घूमने की दशा में 'निवर्तन' की योजना करनी चाहिए ॥ ३०-३२ ॥
१. निवर्तनञ्च—ग०। २. कारयेत्—ख०-ग०।
३. दम्यन्तराज्जानु यत्र—ग०।
४. स्तम्भनं चापि विज्ञेयमपवृत्तक्रियात्मकम्—ख०, ग०।
५. द्वयोरुद्वर्तनं स्मृतम्—ख-ग०। ६. तत्र—ख-ग०।
७ स्तम्भनन्तु प्रयोजयेत्—ग०। ८. परिभ्रमे—ख-ग०।

९० नाट्यशास्त्रम्
यथा दर्शनमन्यच्च लोकाद् ग्राह्यं प्रयोक्तृभिः ॥ ३२ ॥
इत्यूर्वोर्लक्षणं प्रोक्तं जङ्घयोस्तु निबोधत ।
इसके अतिरिक्त ऊरू की अन्य क्रिया तथा अवस्थाएं प्रयोक्ता जन कार्य
के अनुसार लौकिक स्थिति से ग्रहण करें। इस प्रकार 'ऊरू' का वर्णन
किया गया। अब 'जंघाओं' का कार्य कहता हूँ, उन्हें भी जानिये ॥३२-३३॥
जंघा — (भेद एवं लक्षण)
आवर्तितं नतं क्षिप्तमुद्वाहितमथापि वा ॥ ३३ ॥
परिवृत्तं तथा चैव जङ्घा कर्माणि पञ्चधा ।
वामो दक्षिणपार्श्वेन दक्षिणाच्चापि वामतः ॥ ३४ ॥
पादो यत्र व्रजेद्विप्रास्तदावर्तितमुच्यते ।
जानुनः कुञ्चनाच्चैव नतं ज्ञेयं प्रयोक्तृभिः ॥ ३५ ॥
विक्षेपाच्चापि जङ्घायाः क्षिप्तमित्यभिधीयते ।
उद्वाहितञ्च विज्ञेयमूर्ध्वमुद्वाहनादिह ॥ ३६ ॥
प्रतीपनयनं यत्तु परिवृत्तं तदुच्यते ।
जंघा के पांच भेद होते हैं :— (१) आवर्तित, (२) नत, (३)
क्षिप्त, (४) उद्वाहित तथा, (५) परिवृत्त ।
यदि बायां पैर सीधी ओर तथा सीधा पैर बायीं ओर घूमे तो
'आवर्तित', जंघा को सिकुड़ाने (कुंचनात्-झुकाने) पर 'नत', जंघा को
झटके से आगे फेंकने पर 'क्षिप्त', जंघा को ऊपर (की ओर) उठाने को
'उद्वाहित' तथा पीछे की ओर मोड़ने (या 'उद्वाहित' के विपरीत बढ़ाने)
को 'परिवृत्त' जानो ॥ ३३-३७ ॥
आवर्तितं प्रयोक्तव्यं विदूषकपरिक्रमे ॥ ३७ ॥
नतञ्चापि हि कर्तव्यं स्थानासनगतादिषु ।
क्षिप्तं व्यायामयोगेषु ताण्डवे च प्रयुज्यते ॥ ३८ ॥
१. जंघायास्तु—ग० ।
२. जंघास्वस्तिकयोगेन क्रमादावर्तितं भवेत् — इति क-पुस्तके प्रक्षिप्तम-
धिकञ्च ।
३. जानुनः कुञ्चनं वापि—ग० ।
४. नतं स्याज्जानुनमनाद् क्षिप्तं विक्षेपणाद्वहिः—क-ख० ।
५. यत्तत्—ग० । ६. सम्भ्रमातिपरिक्रमे—ख-ग

दशमोऽध्यायः ९५
तथा चोद्वाहितं १कार्यमाविद्धगमनादिषु ।
ताण्डवादौ प्रयोक्तव्यं परिवृत्तं प्रयोक्तृभिः ॥ ३९ ॥
योजना—विदूषक की गति में 'आवर्तित' की, स्थिति ( खड़े होने )
तथा आसन ग्रहण करने में 'नत' की, व्यायाम तथा ताण्डवनृत्य में 'क्षिप्त'
की आविद्ध ( वक्र ) गति आदि में 'उद्वाहित' की तथा ताण्डव आदि
के प्रस्तुतीकरण में 'परिवृत्त' जंघा की योजना करनी चाहिए ॥ ३७-३९ ॥
पादकर्म—( लक्षण तथा योजना )
२इत्येवं जङ्घयोः कर्म पादयोस्तु निबोधत ।
३उद्घट्टितः समश्चैव तथाग्रतलसञ्चरः ॥ ४० ॥
अञ्चितः कुञ्चितश्चैव४ पादः पञ्चविधः स्मृतः ।
मैंने ये जंघा के कार्य बतलाए । अब आप पैरों के कार्य सुनिये ।
पादकर्म के पांच भेद हैं । ( १ ) उद्घट्टित, ( २ ) सम, ( ३ )
अग्रतलसंचर, ( ४ ) अंचित तथा ( ५ ) कुंचित ।
स्थित्वा पादतलाम्रेण पाष्णिर्भूभौ निपात्यते ॥ ४१ ॥
यस्य पादस्य करणे भवेदुद्घट्टितस्तु सः ।
५अयमुद्घट्टितकरणेष्वनुकरणार्थं प्रयोगमासाद्य ॥ ४२ ॥
६द्रुतमध्यमप्रचारः सकृदसकृद्वा प्रयोक्तव्यः ।
पैरों से पंजे के बल खड़े होकर एड़ी से भूमि का स्पर्श करने पर
'उद्घट्टित पाद' होता है । इसको अनुसरण करने तथा एक या अनेक
बार होने वाली द्रुत और मध्यम गति में संयोजित किया जाता है ॥४१-४२॥
स्वभाव७रचितो भूमौ८समस्थानश्च यो भवेत् ॥ ४३ ॥
९समपादः स विज्ञेयः स्वभावाभिनयाश्रयः ।
स्थिरः स्वभावाभिनये नानाकरणसंश्रये ॥ ४४ ॥
१०चलितश्च पुनः कार्यो विधि११ज्ञैः पादरेचिते ।
१२समस्यैव यदा पाष्णिः पादस्याभ्यन्तरे भवेत् ॥ ४५ ॥
१. कुर्यादाविद्ध—ग० । २. इत्येतज्जङ्घयोः—ग० ।
३. उद्धट्टितं समञ्चैव—ख—ग० ।
४. कुञ्चितः सूचीपादः षोढा प्रकीर्तितः—ख० । ५. अयमुद्वेष्टित—क० ।
६. हृतमध्यम—ख—ग० । ७. स्वभावरचिते—ग० । ८. समस्थाने—ग० ।
९. समः पादः—ख-ग० । १०. चलिताक्ष—ग० ।
११. विक्षेपः—ख० ग० । १२. एतत् श्लोकद्वयं—ख-ग-पुस्तके नास्ति ।