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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 186

नवमोऽध्यायः ७५
यत्र व्यग्रावुभौ हस्तौ तत्तैर्दृष्टिविलोकनैः ।
वाचिकाभिनयं कुर्याद् विरामैरर्थदर्शकः ॥ १७४ ॥
वाचिकाभिनय के समय विभिन्न ( तथा वर्णित उन सभी ) दृष्टियों
तथा अवलोकन क्रियाओं को हस्त क्रियाओं के अनुसार इस प्रकार दक्षता-
पूर्वक निदर्शित करना चाहिए जिससे कि उनके द्वारा प्रदर्शित वाचिक
अभिनय के विराम आदि नियमानुसार प्रस्तुत करने पर अर्थों की
( स्पष्टतः ) अभिव्यक्ति हो ॥ १७४ ॥
उत्तानः पार्श्वगश्चैव तथाऽधोमुख एव च ।
प्रचारस्त्रिविधोऽङ्गानां नाट्यनृत्तसमाश्रयः ॥ १७५ ॥
नाट्य तथा नृत्त में प्रयोग ( के समय प्रदर्शित ) किया जाने वाला
हस्त प्रचार त्रिविध है—यथा ( १ ) उत्तान, ( २ ) पार्श्वग तथा ( ३ )
अधोमुख ॥ १७५ ॥
उत्तानो वर्त्तुलस्त्र्यश्रः स्थितोऽधोमुख एव च ।
पञ्च प्रचारा हस्तस्य नाट्यनृत्तसमाश्रयाः ॥ १७६ ॥
अभिनय तथा नृत्य में हस्त प्रचार की पांच विधायें हैं । यथा ( १ )
उत्तान ( उपर की ओर हथेली का रहना ), ( २ ) वर्तुल ( गोल घुमाव
लेना ), ( ३ ) त्र्यस्त्र ( तिरछे या मोड़ कर घुमाना ), ( ४ ) स्थित
(स्थिर रहना) तथा ( ५ ) अधोमुख (हथेली को उल्टी करना) ॥ १७६ ॥
एवं ज्ञेयाः करा ह्येते नानाभिनयसंश्रयाः ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि करान् नृत्तसमाश्रयान् ॥ १७७ ॥
इस प्रकार अनेक रसों तथा भावों से सम्बद्ध अनेक हस्त मुद्राओं को
मैंने बतलाया अब मैं नृत्त हस्तों को बतलाता हूँ ॥ १७७ ॥
नृत्तहस्त—
वक्षसोऽष्टाङ्गुलस्थौ तु प्राङ्मुखौ कँटकामुखौ ।
समानकूर्परांसौ च चतुरस्रौ प्रकीर्तितौ ॥ १७८ ॥
१. नृत्तहस्त—नृत्त के अन्तर्गत होनेवाले विभिन्न प्रचार (चाल) शारीरिक
मुद्राओं तथा स्थितियों में शोभा, सौन्दर्य तथा आकर्षण उत्पन्न करने के लिए ही
१. तत्र दृष्टि—ख; यत्र दृष्टि—ग० ।
२. उत्तालोऽधस्तलस्तिर्यगूर्ध्वाऽधोमुख एव च । हस्तप्रचारा विज्ञेया नाट्ये
नृत्ते च पञ्चधा—ग० ।
३. पद्यमेतत् ग—पुस्तके नास्ति । ४. संश्रिताः—ग० ।
५ वक्षःस्थोऽष्टाङ्गुल—ग०। ६. खटका—क-ख०।