नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽध्यायः
वक्षःस्थल—भेद, लक्षण तथा योजना
आभुग्नमथ निर्भुग्नं तथा चैव प्रकम्पितम् ।
उद्वाहितं समञ्चैव ह्युरैः पञ्चविधं स्मृतम् ॥ १ ॥
वक्षःस्थल के पांच प्रकार हैं । यथा—( १ ) आभुग्न, ( २ ) निर्भुग्न,
( ३ ) प्रकम्पित, ( ४ ) उद्वाहित तथा ( ५ ) सम ॥ १ ॥
निम्नमुन्नतपृष्ठञ्च व्याभुग्नांसं श्लथं कचित् ।
आभुग्नं तदुरो ज्ञेयं कर्म चास्य निबोधत ॥ २ ॥
सम्भ्रमविषादमूर्च्छाशोकभयव्याधिहृदयशल्येषु ।
कार्य शीतस्पर्शे वर्षे लज्जाऽन्वितेऽर्थवशात् ॥ ३ ॥
आभुग्न—यदि स्कन्ध झुके हुए, पीठ उठी हुई तथा वक्षःस्थल और
दोनों कन्धे नीचे झुके हों तो 'आभुग्न' वक्षस्थल कहलाता है। इसकी
योजना सम्भ्रम, विषाद, मूर्च्छा, शोक, भय, व्याधि, हृदयशल्य, शीतस्पर्श,
वर्षा तथा लज्जा में (आवश्यकतानुसार) की जाती है ॥ २-३ ॥
स्तब्धञ्च निम्नपृष्ठञ्च निर्भुग्नांसैसमुन्नतम् ।
उरो निर्भुग्नमेतद्धि कर्म चास्य निबोधत ॥ ४ ॥
स्तम्भे मानग्रहणे विस्मयदृष्टे च सत्यवचने च ।
अहमिति च दर्पवचने गर्वोत्सेके च कर्त्तव्यम् ॥ ५ ॥
निर्भुग्नः—यदि वक्षःस्थल दृढ़, पीठ झुकी हुई तथा कन्धे (न झुक कर)
उठे हुए हों तो उसे 'निर्भुग्न' वक्षःस्थल जानो ।
इसकी योजना स्तम्भ, मान, विस्मयपूर्वक अवलोकन, सत्यवचन,
'अहम्' (गर्वयुक्त) वचन तथा गर्वातिशय (उत्सेक) में करनी चाहिए ॥४-५॥
[ दीर्घनिःश्वसिते चैव जृम्भणे मोटने तथा ।
बिब्बोके च पुनः स्त्रीणां तद्विज्ञेयं प्रयोक्तृभिः ]
१. उरः—ग० २ व्याभुग्नं संश्लथं—ख-ग ।
३. शिल्पेषु—ख० । ४. लज्जायिते—ग० ।
५. निर्भुग्नांसं समुन्नतम्—ग० । ६. गर्वोत्साहे तु—ग० ।