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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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७२ नाट्यशास्त्रम्
उन्हें भी रस तथा भावों की सूचक चेष्टाओं के साथ स्वेच्छानुसार प्रयुक्त
करना चाहिए।
देशं कालं प्रयोगञ्चाप्यर्थयुक्तिमवेक्ष्य च।
हस्ता ह्येते प्रयोक्तव्या नृणां स्त्रीणां विशेषतः ॥ १५८ ॥
ये हस्तमुद्राएं पुरुषों तथा विशेषतः स्त्रियों के द्वारा देश, काल, प्रयोग
तथा योग्यता (अर्थयुक्ति) को देखकर प्रयुक्त की जाएं ॥ १५८ ॥
हस्तमुद्राओं की विविध क्रियाएं—
सर्वेषामेव हस्तानां यानि कर्माणि सन्ति वै।
तान्यहं सम्प्रवक्ष्यामि रसभावकृतानि तु ॥ १५९ ॥
उत्कर्षणं विकर्षणं तथा व्योकर्षणं पुनः।
परिग्रहो निग्रहश्चाह्वानं तोदनमेव च ॥ १६० ॥
संश्लेषश्च वियोगश्च रक्षणं मोक्षणन्तथा।
विक्षेपधूनने चैव विसर्गस्तर्जनन्तथा ॥ १६१ ॥
छेदनं भेदनञ्चैव स्फोटनं मोटनन्तथा।
ताडनञ्चेति विज्ञेयं तज्ज्ञैः कर्म करान् प्रति ॥ १६२ ॥
अब मैं (इन) सभी हस्तों की उन क्रियाओं को जो रस तथा भाव
से युक्त होती हैं—वर्णन करूंगा। ये क्रियाएं हैं—उत्कर्षण, (ऊपर की
ओर उछलना), विकर्षण (खींचना), व्याकर्षण (बाहर छिटकना), परिग्रह
(ग्रहण करना), निग्रह (विनाश करना), आह्वान (बुलाना, संकेत करना),
तोदन (ताड़न करना), संश्लेष (मिलना, मिलाना), वियोग (हटाना,
हटना), रक्षण (रक्षा करना), मोक्षण (फेंकना), विक्षेप (फेंकना, त्याग
करना), धूनन (हिलाना कंपाना); विसर्ग (ससम्मान अर्पण या त्याग
करना), छेदन (तोड़ना), भेदन (काटना), स्फोटन (विकसित करना), मोटन
(संकोच करना) तथा ताडन (पीटना) ॥ १५९–१६२ ॥
उत्तानः पार्श्वगश्चैव तथाधोमुख एव च।
हस्तप्रचारस्त्रिविधो नाट्यतत्त्वसमाश्रयः ॥ १६३ ॥
१. अर्थयुक्तिम्—ग०। २. सन्ति हि—ग०।
३. चैवापकर्षणम्—ग०। ४. परिग्रहश्चाप्याह्वानं ताडनं तर्जनं तथा—ख०।
५. नोदनं तथा—ग०। ६. विसर्गस्तदनन्तरम्—ग०।
७. मोहनं तथा—ग०।