नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः ८१
वियुतास्संयुताश्चैव नृत्तहस्ताः प्रकीर्तिताः ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि करांन् करणसंश्रयान् ॥ २०४ ॥
किन्तु आवश्यकतानुसार इनका प्रयोग मिश्रित (या आन्तरिक परि-
वर्तन के साथ) भी हो सकता है पर नाट्य तथा नृत्य में इन हस्तों का
इनके कथित नामों (संज्ञाओं) के अनुसार ही प्रयोग होता है। नृत्तहस्त
संयुक्त तथा असंयुत दोनों प्रकार के होते हैं। अब मैं करणों¹ से सम्बद्ध
'हस्तों' (की क्रियाओं) को बतलाता हूँ ॥ २०३-२०४ ॥
हस्तकरणों के चार प्रकार :-
सर्वेषामेव हस्तानां नाट्यहस्तनिदेशिभिः ।
विज्ञातव्यं प्रयत्नेन करणन्तु चतुर्विधम् ॥ २०५ ॥
अथावेष्टितमेकं स्यादुद्वेष्टितमथापरम् ।
व्यावर्तितं तृतीयन्तु चतुर्थं परिवर्तितम् ॥ २०६ ॥
नाट्य तथा हस्ताभिनय के विशेषज्ञों ने हाथों के चार विभाग किये
हैं। इनको ध्यान से जान लेना उचित है। ये चार करण के विभाग
(इस प्रकार) हैं :—(१) आवेष्टित, (२) उद्वेष्टित, (३) व्यावर्तित
तथा (४) परिवर्तित ॥ २०५-२०६ ॥
आवेष्ट्यन्ते यदाङ्गुल्यस्तर्जन्याद्या यथाक्रमम् ।
अभ्यन्तरेण करणं तदावेष्टितमुच्यते ॥ २०७ ॥
आवेष्टित—तर्जनी अंगुली से प्रारम्भ होकर सभी अंगुलियाँ वेष्टित
होती हों और हाथ गोल घुमाव से रहा हो तो इस करण को 'आवेष्टित'
जानो ॥ २०७ ॥
उद्वेष्ट्यन्ते यदाङ्गुल्यस्तर्जन्यैद्या बहिर्मुखम् ।
क्रमशः करणं विप्रास्तदुद्वेष्टितमुच्यते ॥ २०८ ॥
उद्वेष्टित—जब तर्जनी से प्रारंभ होकर सभी उंगलियों द्वारा क्रमशः
हस्त को बाहरी भाग से आवेष्टित किया जाए और फिर हाथ गोल घुमाव
ले तो उसे 'व्यावर्तित' करण जानो ॥ २०८ ॥
१. ये 'करण' चतुर्थाध्याय के ताण्डव में प्रयुक्त करणों से भिन्न है।
१. करणं हस्तसंश्रयम्—ग० । २. नाट्यहस्ते निदेशिभिः—ख० ।
३. विज्ञातव्या—ख० । ४. तर्जन्या बहिर्मुखाः—ग० ।
६ ना० शा० द्वि०