नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९० नाट्यशास्त्रम्
यथा दर्शनमन्यच्च लोकाद् ग्राह्यं प्रयोक्तृभिः ॥ ३२ ॥
इत्यूर्वोर्लक्षणं प्रोक्तं जङ्घयोस्तु निबोधत ।
इसके अतिरिक्त ऊरू की अन्य क्रिया तथा अवस्थाएं प्रयोक्ता जन कार्य
के अनुसार लौकिक स्थिति से ग्रहण करें। इस प्रकार 'ऊरू' का वर्णन
किया गया। अब 'जंघाओं' का कार्य कहता हूँ, उन्हें भी जानिये ॥३२-३३॥
जंघा — (भेद एवं लक्षण)
आवर्तितं नतं क्षिप्तमुद्वाहितमथापि वा ॥ ३३ ॥
परिवृत्तं तथा चैव जङ्घा कर्माणि पञ्चधा ।
वामो दक्षिणपार्श्वेन दक्षिणाच्चापि वामतः ॥ ३४ ॥
पादो यत्र व्रजेद्विप्रास्तदावर्तितमुच्यते ।
जानुनः कुञ्चनाच्चैव नतं ज्ञेयं प्रयोक्तृभिः ॥ ३५ ॥
विक्षेपाच्चापि जङ्घायाः क्षिप्तमित्यभिधीयते ।
उद्वाहितञ्च विज्ञेयमूर्ध्वमुद्वाहनादिह ॥ ३६ ॥
प्रतीपनयनं यत्तु परिवृत्तं तदुच्यते ।
जंघा के पांच भेद होते हैं :— (१) आवर्तित, (२) नत, (३)
क्षिप्त, (४) उद्वाहित तथा, (५) परिवृत्त ।
यदि बायां पैर सीधी ओर तथा सीधा पैर बायीं ओर घूमे तो
'आवर्तित', जंघा को सिकुड़ाने (कुंचनात्-झुकाने) पर 'नत', जंघा को
झटके से आगे फेंकने पर 'क्षिप्त', जंघा को ऊपर (की ओर) उठाने को
'उद्वाहित' तथा पीछे की ओर मोड़ने (या 'उद्वाहित' के विपरीत बढ़ाने)
को 'परिवृत्त' जानो ॥ ३३-३७ ॥
आवर्तितं प्रयोक्तव्यं विदूषकपरिक्रमे ॥ ३७ ॥
नतञ्चापि हि कर्तव्यं स्थानासनगतादिषु ।
क्षिप्तं व्यायामयोगेषु ताण्डवे च प्रयुज्यते ॥ ३८ ॥
१. जंघायास्तु—ग० ।
२. जंघास्वस्तिकयोगेन क्रमादावर्तितं भवेत् — इति क-पुस्तके प्रक्षिप्तम-
धिकञ्च ।
३. जानुनः कुञ्चनं वापि—ग० ।
४. नतं स्याज्जानुनमनाद् क्षिप्तं विक्षेपणाद्वहिः—क-ख० ।
५. यत्तत्—ग० । ६. सम्भ्रमातिपरिक्रमे—ख-ग