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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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८६ नाट्यशास्त्रम्
नतं समुन्नतञ्चैव प्रसारितविवर्तिते ।
तथोपसृतमेवन्तु पार्श्वयोः कर्म पञ्चधा ॥ ११ ॥
पार्श्व के पांच प्रकार हैं। यथा--(१) नत, (२) समुन्नत, (३)
प्रसारित, (४) विवर्तित तथा (५) अपसृत ॥ ११ ॥
कटी भवेत्तु व्याभुग्ना पार्श्वमाभुग्नमेव च ।
तथैवापसृतांसञ्च किञ्चित्पार्श्वं नतं स्मृतम् ॥ १२ ॥
नत—यदि कटी तथा उसी ओर की पार्श्व (बाजू) थोड़ी झुकी हुई
और कन्धा नमता हुआ रखा जाए तो 'नत' पार्श्व जानो ॥ १२ ॥
नतस्यैवापरं पार्श्वं विपरीतन्तु युक्तितः ।
कटिपार्श्वभुजांसैश्चाभ्युन्नतैरुन्नतं भवेत् ॥ १३ ॥
समुन्नत—यदि, दूसरी बाजू (जो कि नत पार्श्व की हो) उठी हुई
रहे तथा कटि, पार्श्व, भुजा और कन्धा भी (जिसके कारण) उठा हुआ
हो तो 'समुन्नत' पार्श्व जानो ॥ १३ ॥
आयामानादुभयतः पार्श्वयोः स्यात् प्रसारितम् ।
परिवर्तत् त्रिकस्यापि विवर्तितमिहेष्यते ॥ १४ ॥
प्रसारित—यदि कोख की दोनों बाजुओं को उनकी अपनी दिशा में
फैलाया जाए तो 'प्रसारित' पार्श्व होता है ।
विवर्तित—यदि त्रिक (पीठ) को एक घुमाव दिया जाए तो 'विवर्तित'
पार्श्व होता है ॥ १४ ॥
विवर्तनापनयनाद् भवेदपसृतं पुनः ।
पार्श्वलक्षणमित्युक्तं विनियोगं निबोधत ॥ १५ ॥
अपसृत—यदि विवर्तित (पार्श्व) की स्थिति से पार्श्व-भाग पुनः
अपनी मूल-स्थिति में आ जाए तो उसे 'अपसृत' पार्श्व जानो। (इस प्रकार)
मैंने पार्श्वलक्षण बतलाए अब इनकी योजना सुनिये ॥ १५ ॥
उपसर्पे नतं कार्यमुन्नतं चापसर्पणे ।
प्रसारितं प्रहर्षादौ परिवृत्ते विवर्तितम् ॥ १६ ॥
१. तथा प्रसृतमेतत्—ग० । २. कटिर्भवेत्तु—ग० ।
३. तस्यैव चापरं—ख०, ग० । ४. श्चाप्युन्नतः—ख० ।
५. परिवर्तित्रिकस्यापि—ख-ग० ।
६. विवर्तितोपनयनात्—ख०, विवर्तितापनयनात्—ग० ।
७. परिवर्त्तौ—ग० ।