नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽध्यायः ८७
विनिवृत्ते त्वपसृतं पार्श्वमर्थवशाद् भवेत् ।
एतानि पार्श्वकर्माणि जठरस्य निबोधत ॥ १७ ॥
किसी व्यक्ति के पास आने में 'नत' की, पीछे खिसकने में 'समुन्नत'
की, अतिहर्ष में 'प्रसारित' की, पीछे घूमने में 'विवर्तित' की तथा लौटने
(विनिवृत्त-पीछे घूमने) में 'अपसृत' की योजना करनी चाहिए। इस
प्रकार पार्श्व (कोख) के ये भेद तथा कार्य बतलाए हैं। अब मैं उदर के
लक्षण बतलाता हूँ ॥ १६-१७ ॥
उदर-- (भेद, लक्षण तथा योजना)
क्षामं खल्वञ्च पूर्णञ्च सम्प्रोक्तमुदरं त्रिधा ।
तनु क्षामं नतं खल्वं पूर्णमाध्मातमुच्यते ॥ १८ ॥
उदर के तीन प्रकार हैं। (१) क्षाम, (२) खल्व तथा (३) पूर्ण।
इनमें दुबला या खिंचा हुआ उदर 'क्षाम', झुका हुआ 'खल्व' तथा भरा
हुआ 'पूर्ण' कहलाता है ॥ १८ ॥
क्षामं हास्ये¹ऽथ रुदिते निःश्वासे जृम्भणे भवेत् ।
व्याधिते तपसि² श्रान्ते क्षुधार्ते खल्वमिष्यते ॥ १९ ॥
³पूर्णमुच्छ्वसिते स्थूले व्याधितात्यशनादिषु ।
योजना--हास्य, रुदन, निश्वास तथा जंभाई लेने में 'क्षाम' की,
बीमारी, तपस्या, थकावट तथा भूख में 'खल्व' की तथा उच्छ्वास, स्थूलता,
व्याधि तथा अतिशय भोजन करने में 'पूर्ण' उदर की योजना करना
चाहिए ।
[ ⁴क्षामं खल्लं समं पूर्णमुदरं स्याच्चतुर्विधम् । ]
(प्रक्षिप्त—क्षाम, खल्व, सम तथा पूर्ण भेद से उदर के चार प्रकार हैं)
इत्येतदु⁵दरस्योक्तं कर्म⁶ कट्या निबोधत ॥ २० ॥
इस प्रकार मैंने उदर के कार्य बतलाए। अब मैं कटि के कार्य बतलाता
हूँ ॥ १९-२० ॥
१. हासे च—ग० । २. तपसा—क० ।
३. पूर्णमुच्चलितं स्थूले व्याधितन्द्राशनादिषु—ख—ग० ।
४. एतत्पद्यार्धं ग—पुस्तके नास्ति । ५. इत्येतदुदरं प्रोक्तं—ग० ।
६. कटचाः कर्म—ग० ।