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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 187

७६ नाट्यशास्त्रम्
चतुरस्र—छाती से आठ अंगुल के अन्तर पर सामने की ओर दोनों
हाथों को कटकामुखमुद्रा में तथा दोनों कन्धों तथा कोहनी को समान
ऊंचाई पर रखना 'चतुरस्र' कहलाता है ॥ १७८ ॥
हंसपक्षकृतौ हस्तौ व्यावृतौ तालवृन्तवत् ।
उद्वृत्ताविति विज्ञेयावथवा तालवृन्तकौ ॥ १७९ ॥
उद्वृत्तः—दो हंसपक्ष हस्तों को पंखे के समान हिलाना । इसका अन्य
नाम 'तालवृन्तक' भी है ॥ १७९ ॥
चतुरस्रस्थितौ हस्तौ हंसपक्षकृतौ तथा ।
तिर्यक्स्थितौ चाभिमुखौ ज्ञेयौ तलमुखाविति ॥ १८० ॥
तलमुख—चतुरस्त्र दशा में हंसपक्ष हस्तों को तिरछे तथा एक दूसरे
के सम्मुख रखना ॥ १८० ॥
तावेव मणिबन्धान्ते स्वस्तिकाकृतिसंस्थितौ ।
स्वस्तिकाविति विख्यातौ वियुतौ विप्रकीर्णकौ ॥ १८१ ॥
स्वस्तिक—यदि तलमुख नृत्त-हस्त कलाई पर से स्वस्तिक किये जाएं ।
विप्रकीर्ण—( तथा ) स्वस्तिक नृत्तहस्त के प्रदर्शन के पश्चात् उन्हें
हटा लेना ॥ १८१ ॥
नृत्त-हस्तों की सर्जना की गई । वस्तुतः ये नृत्तहस्त हाथ की विभिन्न अवस्थाएं
ही हैं क्योंकि इनसे किसी अर्थविशेष की प्रतीति नहीं होती; फिर भी अंग-भंगों
से जो लावण्य निखरता है उसमें नृतहस्तों का बड़ा हाथरहता है । ये समतोलपन
( Balance ) के सिद्धान्त पर निर्मित किये गये ( प्रतीत होते ) हैं, क्योंकि
समतलपन ( चतुरस्रता ) भी शरीर के सौन्दर्य में समाविष्ट माना जाता है ।
नृत्तहस्त हाथ, पैर तथा शरीर के सामंजस्य द्वारा सौन्दर्य उत्पन्न करते हैं और
नृत्यप्रदर्शन को शोभा शाली बनाते हैं । इसीलिए ये नृत्य के अलंकार माने गये ।
नृतहस्तों की उत्पत्ति संयुत तथा असंयुत हस्तमुद्राओं से हुई है परन्तु कुछ
नृत्तहस्तों में मिश्रमुद्राओं ( के भिन्न मुद्राओं में संयोजन ) की भी योजना रहती
है । नृतहस्त हाथ के चालन से निर्मित होने के कारण उनका रेखांकन संभव
नहीं; यही कारण है कि संयुत तथा असंयुतहस्तों के सभी रेखाचित्र दिये गए पर
नृत्तहस्तों के नहीं दिये जा सके ।