नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ नाट्यशास्त्रम्
आवर्त्यन्ते कनिष्ठाद्या अङ्गुल्योऽभ्यन्तरेण तु ।
यथाक्रमेण करणं तद् व्यावर्त्तितमुच्यते ।। २०९ ।।
व्यावर्तित—यदि कनिष्ठिका उंगली से प्रारंभ हो कर सभी उंगलियों
को क्रमशः भीतरी भाग से आवेष्टित किया जाए और हाथ गोल घुमाव ले
तो उसे 'व्यावर्तित' करण जानो ।। २०६ ।।
उद्वर्त्यन्ते कनिष्ठाद्या बाह्यतः क्रमशो यदा ।
अङ्गुल्यः करणं विप्रास्तदुक्तं परिवर्तितम् ।। २१० ।।
परिवर्तित—जब कनिष्ठिका उंगली से प्रारम्भ होकर सभी उंगलियां
क्रमशः हस्त को बाहरी भाग से आवेष्टित करें और हस्त गोल घुमाव ले
तो यह 'परिवर्तित' कहलाता है ।। २१० ।।
नृत्तेऽभिनययोगे च पाणिभिर्वर्तनाश्रयैः ।
मुख-भ्रू-नेत्रयुक्तानि करणानि प्रयोजयेत् ।। २११ ।।
जब नृत्त तथा नाट्य अभिनय की दशा में इन हस्तों को उनकी विभिन्न
क्रियाओं में प्रदर्शित किया जाए तो उन्हें मुख, भौंहें तथा नेत्र के अनुसार
करणों के द्वारा अनुसृत करते हुए रखा जाए ।। २११ ।।
तिर्यक् तथोर्ध्वसंस्थो ह्यधोमुखश्चाञ्चितोऽपविद्धस्तु ।
मण्डलगतिस्तथा स्वस्तिकश्च पृष्ठानुसारी च ।। २१२ ।।
उद्वेष्टितःप्रसारित इत्येते वै स्मृताः प्रकारास्तु ।
बाह्वोरिति करणगता विज्ञेया नर्तकैर्नित्यम् ।। २१३ ।।
नर्तकों को करणों में स्थित बाहुओं के इन (दस) प्रकारों का सदैव
ज्ञान रखना चाहिए। ये हैं (१) तिर्यक, (२) ऊर्ध्वसंस्थ, (३) अधोमुख,
(४) अञ्चित, (५) अपविद्ध, (६) मंडलगति, (७) स्वस्तिक, (८)
पृष्ठानुसारी, (९) उद्वेष्टित तथा (१०) प्रसारित ।। २१२-२१३ ।।
१. आवर्तन्ते—ग० । २. यत्तु क्रमेण—ग० । ३. उद्वर्तन्ते—ग० ।
४. ग—पुस्तकेतु तिर्यगूर्ध्वगतञ्चैव तथाधोमुख एव च ।
आविद्धश्चापविद्धश्च मण्डलस्वस्तिकस्तथा ।।
अञ्चितः कुञ्चितश्चैव पृष्ठगश्चेतिचोदितः ।
बाहुप्रकारो दशधा नाट्यनृत्तप्रयोक्तृभिः ।। इत्यधिकम् ।
५. विज्ञेया निवर्तकैः—ख० ।