नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽध्यायः ८९
ऊरू—( भेद एवं लक्षण )
कम्पनं वलनञ्चैव स्तम्भनोद्वर्तने तथा ।
विवर्तनञ्च पञ्चैतान्यूरु-कर्माणि योजयेत् ॥ २७ ॥
ऊरू (पिंडलियां) की पांच अवस्थाएं होती हैं। (१) कम्पन, (२)
चलन, (३) स्तम्भन, (४) उद्वर्तन तथा, (५) विवर्तन ॥ २७ ॥
नमनोन्नमनात् पाष्णेर्मुहुः स्यादूरुकम्पनम् ।
गच्छेद्भ्यन्तरं जानु यत्तु तद्वलितं स्मृतम् ।
स्तम्भनञ्चात्र विज्ञेयमपविद्धक्रियात्मकम् ॥ २८ ॥
वलिता विद्धकरणादुद्वर्तनमितीरितम् ।
पार्ष्णिरभ्यन्तरं गच्छेद्यत्र तत्तु निवर्तनम् ॥ २९ ॥
बार-बार पैर की एड़ी के अग्रभाग (पाष्णि) को ऊपर तथा नीचे धुजाना
(या लेजाना) 'कम्पन' कहलाता है। पैर घुटने के अन्दर के भाग में रहें
और पिंडलियां गति शील हो तो 'वलित'; स्थिर गति रखना 'स्तम्भन',
घुटनों को सिकुड़ाना तथा हिलाना 'उद्वर्तन' तथा पैर की एड़ी को अन्दर
की ओर सिकुड़ाना 'विवर्तन' कहलाता है ॥ २८-२९ ॥
गतिष्वधमपात्राणां भये चापि हि कम्पनम् ।
वलनञ्चैव कर्त्तव्यं स्त्रीणां स्वैरपरिक्रमे ॥ ३० ॥
साध्वसे च विषादे च स्तम्भनं सम्प्रयोजयेत् ।
व्यायामे ताण्डवे चैव कार्यमुद्वर्तनं बुधैः ॥ ३१ ॥
निवर्तनञ्च कर्तव्यं सम्भ्रमादि परिक्रमे ।
योजना—अधमपात्रों की चाल (गति) तथा भय की दशा में 'कम्पन'
की, स्त्री की यथेच्छ गति में 'वलन' की, भय और विषाद की अवस्था में
'स्तम्भन' की, व्यायाम तथा ताण्डवनृत्य में 'उद्वर्तन' की तथा भ्रान्त और
घूमने की दशा में 'निवर्तन' की योजना करनी चाहिए ॥ ३०-३२ ॥
१. निवर्तनञ्च—ग०। २. कारयेत्—ख०-ग०।
३. दम्यन्तराज्जानु यत्र—ग०।
४. स्तम्भनं चापि विज्ञेयमपवृत्तक्रियात्मकम्—ख०, ग०।
५. द्वयोरुद्वर्तनं स्मृतम्—ख-ग०। ६. तत्र—ख-ग०।
७ स्तम्भनन्तु प्रयोजयेत्—ग०। ८. परिभ्रमे—ख-ग०।