नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽध्यायः ८५
(प्रक्षिप्त—दीर्घनिश्वास, जृम्भा, अंगों के मरोड़ने तथा स्त्रियों के
विव्वोक की दशा में भी प्रयोक्ताजन इसकी योजना करें ।)
ऊर्ध्वक्षेपैरुरो यन्नै¹ निरन्तरकृतैः कृतम् ।
प्रकम्पितञ्च तज्ज्ञेयमुरो नाट्यप्रयोक्तृभिः ॥ ६ ॥
प्रकम्पित—यदि वक्षःस्थल निरन्तर फुलाया तथा सिकुड़ाया जाए
तो 'प्रकम्पित' वक्षःस्थल कहलाता है ॥ ६ ॥
हसितरुदितेषु कार्यं श्रमे भये श्वासकासयोश्चैव ।
हिक्के दुःखे च तथा नाट्यज्ञैरर्थयोगेन ॥ ७ ॥
इसकी योजना हास्य, रुदन, श्रम, भय, श्वास, कास, हिक्का तथा
दुःख की दशा में स्थिति के अनुसार करनी चाहिये ॥ ७ ॥
उद्वाहितं तूर्ध्व³कृतमुरो ज्ञेयं प्रयो⁴क्तृभिः ।
⁵दीर्घोच्छ्वासोन्नतालोके जृम्भणादिषु चेष्यते ॥ ८ ॥
उद्वाहित—यदि वक्षःस्थल को उठा हुआ रखे तो 'उद्वहित' वक्षःस्थल
होता है। इसे दीर्घ उच्छ्वास, ऊँची वस्तु का अवलोकन तथा जंभाई लेने
की अवस्था में प्रयुक्त करना चाहिए ॥ ८ ॥
सर्वैरेवाङ्गविन्यासैश्चतुरश्रकृतैः कृतम् ।
उरः समन्तु विज्ञेयं स्वस्थं सौष्ठवसंयुतम् ॥ ९ ॥
सम—सभी अवयव चतुरस्र हों (समान रहे) तथा सौष्ठव युक्त हों
तो (वह) वक्षःस्थल 'सम' (स्वाभाविक) कहलाता है। इसे स्वाभाविक
दशा के अभिनय में प्रयुक्त करें ॥ ९ ॥
पार्श्व—भेद लक्षण तथा योजना—
एतदुक्तं मया सम्यगुरसस्तु विकल्पनम् ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि पार्श्वयोरिह लक्षणम् ॥ १० ॥
इस प्रकार मैंने वक्षःस्थल के विभेद बतलाए । अब मैं 'पार्श्व' (कोख)
के लक्षण बतलाता हूँ ।
१. यत्तु—ग० ।
२. हसितरुदितादिसम्भ्रमश्रमव्याधिपीडितार्थेषु । नानाभावोपगतं कार्यमुरो
नाट्ययोगेषु ॥—ग० ।
३. मूर्ध्वंगत—ग० । ४. प्रयोगतः—ग० ।
५. दीर्घोच्छ्वसनता—ग। ६. सर्वैः ससौष्ठवैरङ्गैः—ग० ।