नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः ७७
अलपल्लव-संस्थानावूर्ध्वास्यौ पद्मकोशकौ ।
अरालकटकाख्यौ चाप्येरालखटकामुखौ ॥ १८२ ॥
अराल खटकामुख—दोनों अलपल्लव हस्तोँ को ऊपर हथेली रखते हुए
पद्मकोश हस्तोँ में परिवर्तित कर देना । इसका अन्य नाम 'अरालखटका'
भी है ॥ १८२ ॥
[ तथैव मणिबन्धान्ते हारलौ विच्युतावुभौ ।
ज्ञेयौ प्रयोक्तृभिर्नित्यम् अरालखटकाविति ॥ ]
(प्रक्षिप्तः—यदि दो अराल हस्तोँ को कलाई को नोक से स्वस्तिक के
बाद विच्युत कर दिया जाए तो उसे प्रयोक्तागण अरालखटकामुख जानें ।)
भुजांसकूर्पराग्रैस्तु कुटिलावर्तितौ करौ ।
पराङ्मुखतलौविद्धौ ज्ञेयावाविद्धवक्रकौ ॥ १८३ ॥
आविद्धवक्र—विपरीत बाहु, कंधा तथा कोहनी के कोनों को कुटिल
(तिरछी) गति से दोनों हाथों से स्पर्श करते हुए दोनों अराल मुद्रा की
हथेलियों को ऊपर तथा नीचे की ओर कंपित करते हुए बदलना ।
हस्तौ तु सर्पशिरसौ मध्यमाङ्गुष्ठकौ यदा ।
तिर्यक्प्रसारितास्यौ च तदा सूचीमुखौ स्मृतौ ॥ १८४ ॥
सूचीमुख—दो सर्पशीर्ष हस्तोँ को अपने अंगूठों के साथ तिरछे फैलाकर
हथेली के मध्य का (मध्यमांगुली का) स्पर्श करते हुए रखना ॥ १८४ ॥
[ संर्पशीर्षौ यदा हस्तौ भवेतां स्वस्तिकस्थितौ ।
मध्यप्रसारिताङ्गुष्ठौ ज्ञेयौ सूचीमुखौ तदा ]
अथवा स्वस्तिक के पश्चात् (यदि) दो सर्पशीर्ष हस्तोँ को मध्यमां-
गुली के पास हथेली में अंगूठों का स्पर्श करते हुए रखना सूचीमुख है।
रेचितौ वापि विज्ञेयौ हंसपक्षौ द्रुतभ्रमौ ।
प्रसारितोत्तानतलौ रेचिताविति संज्ञितौ ॥ १८५ ॥
रेचित—दो हंसपक्ष हस्तोँ को तेजी से घुमाकर हथेली को ऊपर की
ओर मुंह कराते हुए फैला देना ॥ १८५ ॥
१. खटका—क-ख० । २. वाप्य-ख; वा—ग० ।
३. पद्यमेतत्—ग-पुस्तके नास्ति । ४. हारालविच्युता—ख० ।
५ मुखतया—ख० । ६. मध्यस्था—ख० ।
७ पद्यमेतत् ग—पुस्तके नास्ति । ८. हंसपक्षोद्धृतभ्रमौ—ख० ।
९. संस्थितौ—ख० ।