सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 668 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 199

५८ नाट्यशास्त्रम्
कटि—(भेद, लक्षण तथा योजना)
छिन्ना चैव निवृत्ता च रेचिता कम्पिता तथा ।
उद्वाहिता चेति कटी नाट्ये¹ नृत्ते च पञ्चधा ॥ २१ ॥
नाट्य तथा नृत्त में उपयोगी 'कटि' के पांच प्रकार हैं :—(१) छिन्ना,
(२) निवृत्ता, (३) रेचिता, (४) कम्पिता तथा (५) उद्वाहिता ।
कटी मध्यस्य वलनाच्छिन्ना सम्परिकीर्तिता ।
पराङ्मुखस्याभिमुखी निवृत्ता स्यान्निवर्तिता ॥ २२ ॥
सर्वतो भ्रमणाच्चापि विज्ञेया रेचिता कटी ।
तिर्यग्गतागता क्षिप्रं कटी ज्ञेया प्रकम्पिता ॥ २३ ॥
नितम्बपार्श्वोद्वहनाच्छनैरुद्वाहिता कटी ।
बीच से (मध्य-भाग में) लचकती हुई रहनेवाली कटि 'छिन्ना'
कहलाती है, सामने की ओर घुमाव देकर फिर सामने की ओर उठाकर
रखने या लौटाने पर 'निवृत्ता', चारों ओर घुमाव देने पर 'रेचिता',
द्रुतगति से आड़ी तिरछी आने जाने वाली 'कम्पिता' तथा बगल और
नितम्ब भाग से ऊपर की ओर धीरे-धीरे उठाने पर 'उद्वाहिता' कटि
कहलाती है ॥ २२-२४ ॥
⁴कटिकर्म मया प्रोक्तं विनियोगं निबोधत ॥ २४ ॥
छिन्ना व्यायामसंभ्रान्तव्यावृत्त प्रेक्षणादिषु ।
निवृत्ता वर्तने चैव रेचिता ⁵भ्रमणादिषु ॥ २५ ॥
कुब्ज-वामन-नीचानां गतौ कार्या प्रकम्पिता ।
स्थूलेषूद्वाहिता योज्या स्त्रीणां लीलागतेषु च ॥ २६ ॥
इस प्रकार मैंने कटि (कर्म) के लक्षण बतलाए अब मैं इनकी योजना
बतलाता हूँ।
'छिन्ना' की व्यायाम, भ्रान्ति तथा पीछे घूम कर देखने में, गोल,
घूमने में 'निवृत्ता' की, भ्रमण आदि सामान्य क्रियाओं में 'रेचिता' की,
कूबड़े (कुब्ज), बौने तथा नीच प्रकृति के पुरुषों की चाल में 'प्रकम्पिता'
की तथा स्थूल पुरुष और स्त्रियों की लीला-पूर्ण (ललित) गति में
'उद्वाहिता' कटि की योजना करनी चाहिए ॥ २४-२६ ॥
१. नाट्यनृत्ते—ग० । २. तिर्यंगता गताक्षिप्ता—ख-ग० ।
३. नितम्बोद्वहनाच्चैव क्रमेणोद्वाहिता स्मृता—क०।
४. पुनश्चासां प्रवक्ष्यामि विनियोग-प्रयोजनम्—क-ख०।
५. भ्रमणेषु च—ग०।