नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 185, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ें७४ नाट्यशास्त्रम्
उत्तम तथा मध्यम पात्रों के द्वारा इन हस्तमुद्राओं का प्रयोग शास्त्रीय
लक्षणों के अनुसार अर्थाभिव्यक्ति करे परन्तु अधमपात्रों के द्वारा
लोकक्रियाओं का हस्ताभिनय में अनुसरण किया जाय ॥ १६८ ॥
अथवान्यादृशं प्राप्य प्रयोगं कालमेव च ।
विपरीताश्रया हस्ताः प्रयोक्तव्या बुधैर्न१ वा ॥ १६९ ॥
परन्तु जब कोई असम्मान्यप्रयोग या समय हो तो बुद्धिमान इन
हस्तमुद्राओं के प्रयोग को वर्णित लक्षण से भिन्न स्वरूप में संयोजित करे
या न भी करे ॥ १६९ ॥
विषण्णे मूर्च्छिते २ह्रीते जुगुप्सा-शोकपीडिते ।
ग्लाने ३स्वप्ने विहस्ते च निश्चेष्टे तन्द्रिते जडे ॥ १७० ॥
व्याधिग्रस्ते जरार्त्ते च भयार्त्ते शीतविप्लुते ।
मत्ते प्रमत्ते चोन्मत्ते चिन्तायां तपसि स्थिते ॥ १७१ ॥
हिमवर्षहते बद्धे ५वारिणि प्लवसंश्रिते ।
स्वप्नायिते च सम्भ्रान्ते ६नर्तनसंस्फोटने तथा ॥ १७२ ॥
न हस्ताभिनयः कार्यः कार्यः सत्त्वसमाश्रयः ।
तथा ७काकुविशेषश्च नानार्थ८रसभावकः ॥ १७३ ॥
जब कोई पात्र, खिन्न, मूर्च्छित, लज्जित, घृणा तथा शोक से प्रपीडित,
मलिन (ग्लान) सोया हुआ, लूला (विहस्त) बेहोश, तन्द्रिल, जड़,
बीमार, बुढ़ापे से त्रस्त, भय पीड़ित, ठंड से ठिठुरता हुआ या त्रस्त,
मदमत्त, पागल, चिन्तित, तप करते हुए, बर्फ या वर्षा के कारण त्रस्त
(आहत), कैद, जल या डोंगें में संचारशील, स्वप्न में बकते हुए, भ्रान्तियुक्त,
तथा नखों से कुरेदने या पटकनेवाला रहे तो ऐसी दशा में हस्त की
योजना न की जाए किन्तु अनेक अर्थ रस तथा भावों को अभिव्यक्त करने
वाला तथा विभिन्न स्वरों से अभिव्यक्त होने वाला रसाभिनय प्रारम्भ करना
चाहिए (या उसका ग्रहण करना चाहिए) ॥ १७०-१७३ ॥
१. बुधैर्नरैः—ग। २. भीते—ख०, ग०। ३. सुप्ते—ख०, ग०।
४. हिमवर्षगते—ख०, ग०। ५. बन्धे हरिणप्लवसंश्रिते—ख०, ग०।
६. नखसंस्फो—ख०, ग०। ७ तथाकारविशेषश्च—ख०, ग०।
८. नानाभावरसान्वितः—ख०, ग०।