नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुरश्रो भवेद्वामः सव्यहस्तश्च रेचितः ।
विज्ञेयौ नृत्ततत्त्वज्ञैरर्धरेचितसंज्ञितौ ॥ १८६ ॥
अर्धरेचित—बाएं हाथ को चतुरस्र तथा दाहिने हाथ को रेचित
करना नृत्त के विद्वानों के मत में 'अर्धरेचित' है ॥ १८६ ॥
अञ्चितौ कूर्परांसौ तु त्रिपताकौ करौ कृतौ ।
किञ्चित्तिर्यग्गतावेतौ स्मृतावुत्तानवञ्चितौ ॥ १८७ ॥
उत्तानवंचित—दो त्रिपताक हस्तों को कुछ तिरछे और कुछ नमाते
हुए रखना तथा कन्धों और केहुनियों को हिलाना ॥ १८७ ॥
मणिबन्धनमुक्तौ तु पताकौ पल्लवौ स्मृतौ ।
बाहुशीर्षाद्विनिष्क्रान्तौ नितम्बाविति कीर्तितौ ॥ १८८ ॥
पल्लव—कलाई से दो पताक हस्तों को मिलाना (तथा हाथों को
कन्धे के बराबर रखना)
नितम्ब—(पल्लव हस्त को या) दो पताक हस्तों को कन्धे से ऊपर
निकाल कर ले जाना ॥ १८८ ॥
केशदेशाद्विनिष्क्रान्तौ परिपार्श्वोत्थितौ तथा ।
विज्ञेयौ केशबन्धौ तु करावाचार्यसम्मतौ ॥ १८९ ॥
केशबन्ध—केश प्रदेश या शिखा पर से ऊपर घुमाकर दोनों (पताक-)
हस्तों को दोनों बाजुओं में (सीधा) रखना ॥ १८६ ॥
तिर्यक् प्रसारितौ चैव पार्श्वसंस्थौ तथैव च ।
लताख्यौ च करौ ज्ञेयौ नृत्ताभिनयने प्रति ॥ १९० ॥
लता—(बन्ध)—दोनों हाथों को तिरछे फैलाकर बाद में दोनों
बाजुओं में फैलाकर रखना ॥ १९० ॥
समुन्नतो लताहस्तः पार्श्वात् पार्श्वं विलोलितः ।
त्रिपताकोऽपरः कर्णे करिहस्तैः प्रकीर्तितः ॥ १९१ ॥
करिहस्त—लता हस्त करने के बाद उसे ऊंचा करते हुए एक बाजू से
दूसरी बाजू की ओर झुलाना (विलोळित) तथा बाद में एक हाथ का
त्रिपताक मुद्रा में कर्ण के समीप रखना ॥ १९१ ॥
१. त्रिपताकाकृतौ करौ—ख-ग०। २. परिपार्श्वस्थितौ—ख०।
३. केशबन्धाख्यौ—ख-ग०। ४. करिहस्तौ प्रकीर्तितौ—ग०।