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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 668 में से

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नवमोऽध्यायः ७९
कटिशीर्षनिवि¹ष्टौ द्वौ त्रिपताकौ यदा करौ ।
पक्षवञ्चितकौ हस्तौ तदा ज्ञेयौ प्रयोक्तृभिः ॥ १९२ ॥
पक्षवंचितक—एक त्रिपताक हस्त कटि प्रदेश पर तथा दूसरा शीर्ष
स्थान (के बराबर—) पर रखना ॥ १९२ ॥
तावेव तु परावृत्तौ पक्षप्रद्योतकौ स्मृतौ ।
अधोमुखतलाविद्धौ ज्ञेयौ गरुडपक्षको ॥ १९३ ॥
पक्षप्रद्योतक—पक्षवंचितक हस्तोँ को उलटे कर देना ।
गरुडपक्ष—पक्षवंचित हस्त को औंधी हथेली करते हुए रखना ॥१९३॥
हंसपक्षकृतौ हस्तौ व्यावृत्तपरिवर्तितौ ।
तथो² प्रसारितभुजौ दण्डपक्षाविति स्मृतौ ॥ १९४ ॥
दण्डपक्ष :—दोनों हंसपक्ष हस्तोँ को क्रमशः उलटे सीधे घुमाकर
(तथा) बाद में कोहनी से कंधे तक बाहुओं को सीधे फैलाकर रखना ॥१९४॥
ऊर्ध्वमण्डलिनौ हस्तौ ऊर्ध्वदेशविवर्तनात् ।
तावेव पार्श्वविन्यस्तौ पार्श्वमण्डलिनौ स्मृतौ ॥ १९५ ॥
ऊर्ध्वमण्डली—दण्डपक्ष हस्त को ऊपर की ओर गोल (चक्कर)
घुमाना ।
पार्श्वमण्डली—एक बाजू में ऊर्ध्वमण्डली हस्तोँ को रखना ॥ १९५ ॥
उद्वेष्टितो भवेदेको द्वितीय³श्चापवेष्टितः ।
भ्र⁴मितावुरसः स्थाने ह्युरोमण्डलिनौ स्मृतौ ॥ १९६ ॥
उरोमण्डली—एक उद्वेष्टित (ऊपर की ओर उठाए हुए) तथा दूसरे
अपवेष्टित (नीचे की ओर झुके हुए) हस्त को वक्षःस्थल के समीप घुमाते
हुए रखना ॥ १९६ ॥
अलपल्लवकारालावुरोऽर्धभ्रमणक्रमात् ।
पार्श्वार्वतश्च विज्ञेयावुरःपार्श्वार्धमण्डलौ ॥ १९७ ॥
उरःपार्श्वमण्डल—अलपल्लव तथा अराल हस्तोँ को आधा घुमाव
देकर एक को बाजू में व दूसरे को ऊपर (वक्षःस्थल के समीप) रखना ॥१९७॥
१. शीर्षनिविष्टाग्रौ—ग० । २. यथा—ग० ।
३. द्वितीयश्च विवेष्टितः—ग० । ४. भ्रामिता—ख ।
५. अरालपल्लवकरावुरो—ख० ।