नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः ७३
नाट्यतत्वों के (सिद्धान्त के) अनुसार हस्तप्रचार तीन प्रकार से किया
जाता है । यथा—(१) उत्तान (ऊपर की ओर मुंह करके), (२) पार्श्वग
(दायी या बांयी ओर मुंह करके) तथा (३) अधोमुख (नीचे की ओर
मुंह करके......) ॥ १६३ ॥
सर्वे हस्तप्रचाराश्च प्रयोगेषु यथाविधि ।
नेत्रभ्रूमुखरा^१गैद्यैः कर्तव्या व्यञ्जिता बुधैः ॥ १६४ ॥
इन हस्तप्रचारों को प्रयोग के समय शास्त्र निदर्शित विधि के साथ नेत्र,
भौंहे, मुखराग आदि के द्वारा बुद्धिमान प्रयोक्ताजन व्यक्त करें ॥ १६४ ॥
हस्तमुद्राओं का कार्य—
करणं कर्म स्थानं प्रचारयुक्तिं क्रियाञ्च ^२समवेक्ष्य ।
हस्ताभिनयः कार्यस्तज्ज्ञैर्लोकोपचारेण ॥ १६५ ॥
बुद्धिमान (प्रयोक्ता) जन इन हस्तों (हस्ताभिनयों) का लोक व्यवहार
के अनुसार प्रयोग करें तथा उसी समय इनके करण, (अध्याय ४ में वर्णित)
कर्म, (पताक आदि) स्थान, (ललाट आदि प्रदेश) प्रचार, (अल्प, मध्य
आदि) युक्ति (मुख्य या गौण बनाने का कारण) तथा क्रिया को
देख कर प्रयोग निश्चित कर लें ॥ १६५ ॥
उत्तमानां कराः कार्या ललाटक्षेत्रचारिणः ।
वक्षःस्थाश्चैव मध्यमानामधमानामधोगताः ॥ १६६ ॥
उत्तम पात्रों के हस्तों को ललाट प्रदेश के समीप, मध्यम पात्रों के
वक्षःस्थल के समीप तथा अधमपात्रों के इससे नीचे शरीर के भाग के समीप
क्रियाशील रखना चाहिए ॥ १६६ ॥
हस्तमुद्राओं का प्रचार—
ज्येष्ठे स्वल्पप्रचाराः स्युर्मध्ये^४ कुर्वीत मध्यमैः ।
अधमेषु प्रकीर्णाश्च हस्ताः कार्याः प्रयोक्तृभिः ॥ १६७ ॥
ज्येष्ठ अभिनय में इन हस्तमुद्राओं का प्रचार अल्प रहना चाहिए
मध्य में मध्यमप्रचार तथा अधम अभिनय में हस्त मुद्राओं का विपुलता
से प्रचार रहना चाहिए ॥ १६७ ॥
लक्षणव्यञ्जिता हस्ताः कार्यास्तूत्तममध्यमैः ।
लोकक्रियास्वभावेन नीचैरप्यर्थसंश्रयाः ॥ १६८ ॥
१. रागैश्च—ग० । २. सम्प्रेक्ष्य—ग० । ३. तज्ज्ञैः कार्यो—ग० ।
४. मध्ये मध्यविचारिणः—ख—ग० । ५. प्रकीर्णास्तु—ग० ।