नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहस्तौ तु मणिबन्धान्ते कुञ्चितावञ्चितौ यदा ।
खटकाख्यौ कृतौ स्यातां मुष्टिकस्वस्तिकौ तदा ॥ १९८ ॥
मुष्टिकस्वस्तिक—दो खटकामुख हस्तों की कलाई के कोनो पर झुकाते
हुए तथा गोल घुमाव देते हुए उद्वेष्टित करण में रखना ॥ १९८ ॥
पद्मकोशौ यदा हस्तौ व्योवृत्तपरिवर्तितौ ।
नलिनीपद्मकोशौ तु तदा ज्ञेयौ प्रयोक्तृभिः ॥ १९९ ॥
नलिनीपद्मकोश—पद्मकोश हस्तों को औंधे सीधे (घुमाव देना या)
पलटना ॥ १९९ ॥
करावुद्वेष्टिताग्रौ च प्रविधायालपल्लवौ ।
ऊर्ध्वप्रसारिताविद्धौ कर्त्तव्यावुल्बणाविति ॥ २०० ॥
अलपल्लव—दोनों हाथों को ऊपर की ओर घुमाव देते हुए उद्वेष्टित
करण में रखना ।
उल्बण—अलपल्लव हस्तों को ऊपर की ओर फैलाकर (कन्धे के बराबर)
घुमाया जाना ॥ २०० ॥
पल्लवौ च शिरोदेशं⁴ सम्प्राप्तौ ललितौ स्मृतौ ।
कूर्परस्वस्तिकगतौ लताख्यौ वलिताविति ॥ २०१ ॥
ललित—दो पल्लव हस्तों को सिर पर (घुमाव देना) ले जाना ।
वलित—दो लता हस्तों को कलाई पर स्वस्तिक कर देना ॥ २०१ ॥
करणे तु प्रयोक्तव्या नृत्तहस्ता विशेषतः ।
तथार्थाभिनये चैव पताकाद्याः प्रयोक्तृभिः ॥ २०२ ॥
नृत्तहस्तों का विशेष रूप से प्रयोग करणों के निर्माणार्थ करना चाहिए
तथा अर्थाभिनय के प्रदर्शन में भी करना चाहिए जैसा कि पताक आदि
हस्तमुद्राओं का अर्थ प्रदर्शन हेतु प्रयोग किया जाता है ॥ २०२ ॥
सङ्करोऽपि भवेत्तेषां प्रयोगोऽर्थवशात् पुनः ।
प्राधान्येन पुनस्सञ्ज्ञा नाट्ये नृत्ते करेष्विह ॥ २०३ ॥
१. कटकाख्यौ तु तौ—ग० । २. व्यावत्तै—ग०
३. विज्ञेयावुल्वणावपि—ख; विज्ञेयौ उल्बणाविति—ग० ।
४. एतत् पद्यत्रयं ख-पुस्तके नास्ति । ५. शिरोदेशे—ग० ।
६. ललिताविति—ग० ।