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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

नवमोऽध्यायः ६१
योजना—इस के द्वारा पितरों को जल-प्रदान ( तर्पण ) तथा कपोल
के समीप ले जाने पर किसी दान का ग्रहण करना प्रकट होता है, तथा
( भोजन के समय किया जाने वाला ) ब्राह्मणों का आचमन तथा भोजन,
आलिंगन, बड़े स्तम्भ के दर्शन, रोमांच, स्पर्श, चन्दन-लेपन, संवाहन
( पैर या शरीर दबाने ) का अर्थ प्रकट होता है। इस मुद्रा का रसों के
अनुसार तथा स्त्रियों के रागात्मक अभिनय में उनके दुःख, (ठुड्डी के स्पर्श )
तथा उरोज प्रदेश के विशेष विभ्रमों के अर्थ प्रकाशनार्थ प्रयोग करना
चाहिए ॥ १०५-१०७ ॥
१सन्दंश—
तर्जन्यङ्गुष्ठसन्दष्टैस्त्व१रालस्य यदा भवेत् ।
आभुग्नतलमध्यस्थः स सन्दंश इति स्मृतः ॥ १०८ ॥
यदि अरालहस्त में तर्जनी तथा अंगूठे का अग्रभाग मिला कर हथेली
को थोड़ी नमा दी जाए तो 'सन्दंश' हस्त हो जाता है ॥ १०८ ॥
सन्दंशस्त्रिविधो ज्ञेयस्त्व३ग्रजो मुखजस्तथा ।
तथा पार्श्वगतश्चैव रसभावोपबृंहितः ॥ १०६ ॥
रस तथा भावों से विस्तार प्राप्तकरनेवाला सन्दंश-हस्त तीन प्रकार
का होता है—( १ ) अग्रज, ( सामने की ओर रहने वाला ) ( २ )
मुखज ( मुंह के समीप रहने वाला ) तथा ( ३ ) पार्श्वगत ( एक ओर
रहने ( या होने ) वाला ॥ १०९ ॥
पुष्पापचयग्रथने ग्रहणे तृणपर्णकेशसूत्राणाम् ।
शल्यावयवग्रहणे प्रकर्षणे चाग्रसन्दंशः ॥ ११० ॥
योजना—अग्रज-सन्दंश के द्वारा पुष्पों का एकत्र करना तथा माला
का गूँथना, तृण, पर्ण, केश तथा सूत्र का ग्रहण, कण्टक की नोक के
ग्रहण करने ( शल्यावयवग्रहणे ) तथा बाण के खींचने का अर्थ प्रकट
होता है । ॥ ११० ।
१. सन्दंश (उत्पत्तिकथा) इस मुद्रा का प्रयोग भगवती वीणापाणी सरस्वती
द्वारा किया गया था। यह हस्त ज्ञानमुद्रा के रूप में अनेक प्राचीनमूर्तिशिल्पों में
दृष्टिगत होता है ।
१. सन्दंशो ह्यरालस्य—ख ग० । २. तलमध्यश्च—ख० ग० ।
३. ज्ञेयो अग्रजो—ग० । ४. शल्याकर्षणग्रहणापकर्षणे—ख० ग० ।

६२ नाट्यशास्त्रम्
वृन्तात् पुष्पोद्धरणं वर्तिशलाकादिपूरणञ्चैव ।
धिगिति च वचनं रोषे मुखसन्दंशस्य कर्माणि ॥ १११ ॥
मुखसन्दंश से टहनी से पुष्पों को तोड़ने, दीपक में बाती को रखने
या उसे शलाका से ठीक करने, किसी वस्तु की पूर्ति करने, धिक्कार के
शब्द तथा क्रोध करने अर्थ प्रकाशित होता है ॥ १११ ॥
यज्ञोपवीतधारण-वेधन-गुणसूक्ष्मबाणलक्ष्येषु ।
योगे² ध्याने स्तोके संयुक्तकैररणस्तु कर्त्तव्यः ॥ ११२ ॥
दो मुखसन्दंश हस्तों को मिलाने से यज्ञोपवीत धारण, (रत्न आदि
का) वेधन, प्रत्यंचा, बारीकी, बाण, लक्ष्य, योग, ध्यान तथा छोटी वस्तु
को बतलाया जाता है ॥ ११२ ॥
पेलॅवकुत्सासूया-सदोषवचने च वामहस्तेन ।
किञ्चिद्विवर्त्तिताग्रः प्रयुज्यते पार्श्वसन्दंशः ॥११३॥
पार्श्वसन्दंश—यदि बाँयी ओर सन्दंशहस्त के अग्रभाग को थोड़ा
(धीरे-धीरे) मोड़ते हुए रखा जाए तो इसपार्श्वसन्दंश से कोमलता (पेलव),
असूया तथा दोषपूर्ण शब्दों की अभिव्यक्ति होती है ॥ ११३ ॥
आलेख्यनेत्ररञ्जन-वितर्कवृन्तप्रवालरर्चनञ्च ।
निष्पीडनं तथालक्तकस्य कार्यञ्च नारीभिः ॥ ११४ ॥
इस मुद्रा का स्त्रियों के द्वारा प्रयोग करने पर उससे चित्रलेखन, नेत्रों
में अंजन धारण, वितर्क (शंका), टहनी तथा पत्तों की चित्रकारी (प्रवाल-
रचना) करना (जो कि शरीर पर की जाती है) तथा महावर का लगाना
बतलाया जाता है ॥ ११४ ॥
मुकुल¹—
समागताग्राँस्सहिता यस्याङ्गुल्यो भवन्ति हि ।
ऊर्ध्वा हंसमुखस्यैव स भवेन्मुकुलः करः ॥ ११५ ॥
यदि हंसास्यहस्त में ऊपर की ओर मुंह किये हुए सभी उंगलियाँ


१. मुकुलः (उत्पत्तिकथा) वायुपुत्र हनुमान द्वारा सूर्य को झड़पने के लिए
इसी हस्त का उपयोग किया गया था तभी से इसका प्रचलन हो गया ।


१. यज्ञोपवीतनिधन—ग० । २. योगेऽध्ययने—ग० ।
३. संयुक्तकरस्तु—ख० ग० । ४. पेशल—ग० ।
५. किञ्चिद्विवर्त्तितकराग्रः—ग० । ६. रचनेषु—ग० ।
७. समा नताग्राः सहिताः—ख ग० ।

नवमोऽध्यायः ६३
एक दूसरे से मिली हुई तथा सिकुड़ी रहें तो यह 'मुकुल'हस्त कह-
लाता है ॥ ११५ ॥
देवार्चनबलिकरणे पद्मोत्पलमुकुलरूपणे चैव ।
विटचुम्बने च कार्यो विकुत्सिते विप्रकीर्णश्च ॥ ११६ ॥
भोजनहिरण्यगणनामुखसङ्कोचप्रदानशीघ्रेषु ।
मुकुलितकुसुमेषु तथा तज्ज्ञैरेष प्रयोक्तव्यः ॥ ११७ ॥
योजना—इसके द्वारा देवपूजन, बलिप्रदान, कमल तथा कुमुदिनी
की कलियां, विटचुम्बन, तिरस्कार (विकुत्सित), विविधवस्तु (विप्रकीर्ण)
भोजनग्रहण, सुवर्णमुद्राओं की गणना, मुखसंकोच, (वस्तु) प्रदान, शीघ्रता
तथा पुष्पों की कलियां बतलाई जाती हैं ॥ ११६, ११७ ॥
१ऊर्णनाभ—
पद्मकोशस्य हस्तस्य ह्यङ्गुल्यः कुञ्चिता यदा ।
ऊर्णनाभः स विज्ञेयः केशचौर्यग्रहादिषु ॥ ११८ ॥
यदि 'पद्मकोश' हस्त में सारी उंगलियों को सिकुड़ लिया जाए तो
'ऊर्णनाभ' हस्त हो जाता है ॥ ११८ ॥
शिरःकण्डूयने चैव कुष्ठव्याधिनिरूपणे ।
सिंहव्याघ्रेष्वभिनयः प्रस्तरग्रहणे तथा ॥ ११९ ॥
योजना—केशों तथा चोरी गई वस्तु का ग्रहण, सिर खुजलाना,
कुष्ठव्याधि, सिंह, व्याघ्र तथा इसी प्रकार के अन्य हिंसक प्राणीगण, चोरी
गई वस्तु तथा पत्थर के उठाने का इस मुद्रा के द्वारा अर्थ प्रदर्शन
किया जाता है ॥ ११९ ॥
२ताम्रचूड—
मध्यमाङ्गुष्ठसन्दंशो वक्रा चैव प्रदेशिनी ।
शेषे तलस्थे कर्त्तव्ये ताम्रचूलंकरेऽङ्गुली ॥ १२० ॥
१ ऊर्णनाभः (उत्पत्तिकथा) हिरण्यकशिपु के वध के अवसर पर नृसिंह
भगवान ने इसी हस्त का उपयोग किया था तभी से इसका प्रचलन हो गया ।
२. ताम्रचूड (उत्पत्तिकथा) जब तीनों वेद पूर्ण हो गए तो वे ब्रह्मा के
समक्ष उपस्थित होकर उनसे प्रार्थना करने लगे । इस अवसर पर इसी हस्त
का उपयोग किया गया । तभी से इसका प्रचलन हो गया ।
१. अङ्गुल्यः—ग० । २. व्याघ्राद्यभिनयः—ग० ।
३ ताम्रचूडे कराङ्गुली—ख० ।

६४ नाट्यशास्त्रम्
यदि मध्यमा उंगली तथा अंगूठा मिला हुआ हो, उंगली सिकुड़ी हुई
तथा शेष (दो) उंगलियां हथेली पर हों तो 'ताम्रचूड' हस्त हो
जाता है ॥ १२० ॥
विच्युतंश्च⁴ सशब्दश्च कार्यो निर्भर्त्सनादिषु ।
ताले⁵ विश्वासने चैव शीघ्रार्थे संज्ञितेषु च ॥ १२१ ॥
योजना—झिड़कने के साथ शब्दकर नीचे झुकाते हुए डाँटने
(विच्युति), ताल का अन्त, विश्वास-दान, शीघ्रता तथा इशारा देने
में इस मुद्रा का प्रयोग किया जाए ॥ १२१ ॥
तथा कलासु काष्ठासु निमेषे तु क्षणे तथा ।
एष एव करः कार्यो बालालापानिमन्त्रणे ॥ १२२ ॥
तथा इसी मुद्रा की कालगणना के भागों-जैसे कला, काष्ठा, निमेष
तथा क्षण के बतलाने, युवती बाला से सम्भाषण तथा उसे आमन्त्रण देने
में भी योजना करनी चाहिए ॥ १२२ ॥
ताम्रचूडमुद्रा का अन्यलक्षण:—
अथवा—
अङ्गुल्यस्संयुता¹ वक्रा उपर्यङ्गुष्ठपीडिताः ।
प्रसारिताैककनिष्ठा² च ताम्रचूडकरः³ स्मृतः ॥ १२३ ॥
यदि हाथ की उंगलियां एक दूसरे से मिली हुई हों तथा टेढ़ी रहें,
ये ऊपर अंगूठे से दबाई जाएं तथा कनिष्ठिकाउंगली फैली हो तो भी
'ताम्रचूड़' हस्त कहलाता है ॥ १२३ ॥
शतं सहस्रं लक्षञ्च कनकञ्चापि⁴ दर्शयेत् ।
क्षिप्रमुक्ताङ्गुलीभिस्तु स्फुलिङ्गान् विप्रुषस्तथा ॥ १२४ ॥
इसके द्वारा सौ, हजार तथा लाख की संख्याएं तथा स्वर्णमुद्राएं बतलाई
जाती हैं । यदि इसी मुद्रा में उंगलियों को शीघ्रतापूर्वक कम्पित किया
जाए तो उससे चिनगारियां तथा बूंदें बतलाई जाती हैं ॥ १२४ ॥
असंयुता करा ह्येते मया प्रोक्ता द्विजोत्तमाः ।
अतश्च⁵ संयुतान् हस्तान् गदतो मे निबोधत ॥ १२५ ॥
४. व्युत्पन्नश्च—ग० । ५. तालेष्विध्वसिते चैव--ख० ।
१. अङ्गुल्यः सहिता—ग । २. प्रसारिता कनिष्ठा च—ग० ।
३. ताम्रचूडः करः—ग० । ४. करेणैकेन योजयेत्—ग० ।
५. अधुना—ख० पुनश्च—ग० ।

नवमोऽध्यायः ६५
हे मुनियो इस प्रकार मैंने इन असंयुतहस्तों को बतलाया, अब मैं
संयुत हस्तों को बतलाता हूँ जिन्हें आप समझ लीजिए ॥ १२५ ॥
१संयुतहस्तमुद्राएं (लक्षण तथा योजना)
अंजलि—
पताकाभ्यान्तु हस्ताभ्यां संश्लेषादञ्जलिः स्मृतः ।
देवतानां गुरूणाञ्च मित्राणाञ्चाभिवादने ॥ १२६ ॥
दो पताक हस्तों को मिलाने से 'अंजलि' हस्तमुद्रा होजाती है। इसे
देवता, गुरुजन तथा मित्रों के अभिवादन में प्रयुक्त किया जाता है ॥१२६॥
स्थानान्यस्य पुनस्त्रीणि वक्षो वक्त्रं शिरस्तथा ।
देवतानां शिरस्थस्तु गुरूणामास्य संस्थितः ॥ १२७ ॥
वक्षःस्थश्चैव मित्राणां१ शेषे२ त्वनियमो भवेत् । ॥ १२८ ॥
अभिवादन के तीन स्थान हैं—वक्षःस्थल, मुख तथा मस्तक (शिर) ।
इनमें देवताओं को शिरस्थ नमस्कार, गुरुजन को मुख के सम्मुख तथा
मित्रों को वक्षःस्थल के बराबर हाथ रखते हुए नमस्कार करना चाहिए।
शेष व्यक्तियों के अभिवादन के लिए कोई नियत प्रदेश नहीं होते हैं। स्त्रियों
(का बिना नियम के नमस्कार होता है पाठा० से अर्थ) ॥ १२७, १२८ ॥
कपोत—
उभाभ्यामपि हस्ताभ्यामन्योन्यं पार्श्वसङ्ग्रहात् ।
हस्तः कपोतको नाम कर्म चास्य निबोधत ॥ १२९ ॥
दो (सर्पशीर्ष) हस्तों को परस्पर दोनों कोनों से मिलाने पर 'कपोत'
मुद्रा होती है। अब इनकी योजना सुनिये ॥ १२९ ॥
एष३ विनयाभ्युपगमे प्रणामकरणे गुरोश्च सम्भाषे ।
शीते भये च कार्यो वक्षस्थः कम्पितः४ स्त्रीभिः ॥ १३० ॥
१. असंयुत तथा संयुतहस्तमुद्राएं—ये हस्तमुद्राएं सामान्यतः हाथ से
पृथक्-पृथक् उपयोग में आती हैं परन्तु कभी कभी दोनों हाथों द्वारा एक साथ
भी असंयुत हस्तों का प्रदर्शन होता है। (परन्तु ये कहलाएंगे असंयुत-हस्त ही)
जब दोनों हाथों को मिला कर लक्षणानुसार प्रदर्शित किया जाए तभी संयुत
हस्त होगें। इनकी उपयोगिता के विषय में अधिक विवेचन के लिए भूमिका
तथा परिशिष्ट भी देखिये।
१. विप्राणां—क० । २. स्त्रीणामानियतो भवेत्—क० ।
३ द्विषद्धियाभ्युपगमे—ग० । ४. कल्पितः—ग० ।
५ ना० शा० द्वि०

६६ नाट्यशास्त्रम्
योजना:—इसे विनम्रता आदि सौजन्यपूर्ण भाव के प्रदर्शन पूज्यजन
को प्रणाम करने तथा उनसे संभाषण में प्रयुक्त किया जाता है । शीत तथा
भय के अर्थ को प्रदर्शन करने में स्त्रियों के द्वारा इस मुद्रा को वक्षस्थल
पर स्थित रखना चाहिए ॥ १३० ॥
अयमेवाङ्गुलिपरिघृष्यमाणमुक्तस्तु खिन्नवाक्येषु ।
एतावदिति च कार्यो १नेदानीं कृत्यमिति चार्थे ॥ १३१ ॥
तथा यही दोनों हाथों की उंगलियों को परस्पर मिलाकर हटा लेने
पर खिन्न वचनों, 'इतना करना' तथा 'यह अभी नहीं करना' के अर्थों को
बतलाता है ॥ १३१ ॥
कर्कट—
अङ्गुल्यो यस्य हस्तस्य ह्यन्योन्यान्तरनिस्सृताः ।
स कर्कट इति ज्ञेयः करः कर्म च वक्ष्यते ॥ १३२ ॥
यदि दोनों हाथों की उंगलियां मिलकर एक दूसरे के बीच से निकली
हुई रहें तो 'कर्कट' मुद्रा होती है। अब इसकी योजना सुनिये ॥ १३२ ॥
एष मदनाङ्गमर्दे सुप्तोत्थिते२ऽजृम्भणे बृहद्देहे ।
हनुधारणे च योज्यः शङ्खग्रहणेऽर्थतँत्वज्ञैः ॥ १३३ ॥
इसके द्वारा काम के मद में अंग मरोड़ना (मर्दनांगमर्दे), सोकर
उठते समय जंभाई लेना, विशाल शरीर, ठुड्डी को हाथ से सहारा देने
(हनुधारणे) तथा शंख का ग्रहण करना बतलाया जाता है ॥ १३३ ॥
स्वस्तिक—
मणिवन्धनविन्यस्तावरालौ स्त्रीप्रयोजितौ ।
उत्तानौ वामपार्श्वस्थौ स्वस्तिकः परिकीर्तित ॥ १३४ ॥
दो अराल हस्तों को कलाई पर सामने की ओर से ऊपर मुँह रखते
हुए बायीं बाजू की ओर रख देने पर 'स्वस्तिक' मुद्रा जानों । इसे स्त्रियाँ
प्रयुक्त करें ॥ १३४ ॥
१. मदनांगमर्दे का यहाँ श्री मन० मो० घोष ने (शहद के छत्ते या मोम
को दिखलाना, bees wax) अर्थ किया है जो असंगत है ।
१. भेदाङ्गीकृत्यमिति चार्थे—ख० ।
२. सुप्तोत्थविजृम्भणे—ग० । ३. अनुधारणे—ख० ।
४. च तत्वज्ञैः—ग० । ५. वर्धमानकौ—ग० ।

नवमोऽध्यायः ६७
स्वस्तिक विप्रयुतिकरणाद् दिशो घनाः खं वनं समुद्राश्च ।
ऋतवो मही तथौघं१ विस्तीर्णं वाभिनेयं स्यात् ॥१३५॥
'स्वस्तिक' का प्रदर्शन कर दोनों हाथों को हटा लेने पर उससे
दिशाएं, आकाश, वन, समुद्र, ऋतुएँ, पृथ्वी, वेग एवं अन्य विस्तीर्ण पदार्थ
प्रदर्शित होते हैं ॥ १३५ ॥
कटका-( खटका- ) वर्धमानक—
कटकः कटकैर्न्यस्तः कट३कावर्धमानकः ।
शृङ्गारार्थेषु योक्तव्यः प्रणामकरणे तथा ॥ १३६ ॥
[ कुमुदोत्पलवृन्तेषु कर्तव्यश्छत्रधारणे४ । ]
यदि दो कटकामुख हस्तों को स्वस्तिक दशा में ( एक दूसरे की कलाई
के ऊपर ) रखा जाए तो क ( ख ) टकावर्धमानक मुद्रा हो जाती है। इसे
शृङ्गार के भावों तथा प्रणाम करने में प्रयुक्त करना चाहिए ॥ १३६ ॥
[ कुमुद, उत्पल एवं कुन्द पुष्पों के तथा शंख के धारण में इसी की
योजना करनी चाहिए ।— ]
उत्संग—
अरालौ तु विपर्यस्तावृत्तानौ वर्धमानकौ ।
उत्सङ्ग इति विज्ञेयः स्पर्शस्य ग्रहणे करः ॥ १३७ ॥
यदि दो अराल हस्त ऊपर की ओर मुंह वाले एवं स्वस्तिकदशा में दोनों
कन्धों पर रखें जाएँ तो 'उत्संग' मुद्रा होजाती है ॥ १३७ ॥
सनिष्पेषकृ७ते चैव रोषामर्षकृतेऽपि च ।
निष्पीडितः पुनश्चैव स्त्रीणामीर्ष्याकृते भवेत् ॥ १३८ ॥
इसके द्वारा अतिशयप्रयत्न से निष्पन्न होनेवाले कार्य, रोष तथा
ईर्ष्या ( अमर्ष ), किसी पदार्थ को दबाना ( निष्पीडित ) तथा स्त्रियों
की ईर्ष्या का अर्थ बतलाया जाता है ॥ १३८ ॥
१ तथान्यत्—ख—ग० । २. चाभिनेयं—ग० ।
३. कटको वर्धमानकः—ख०, ग० । ४. अयं श्लोकः क—पुस्तकेऽधिकः ।
५. वृत्तानावृर्धमानतौ—ग० । ६. कार्यः सिंहावलोकिते—ख० ।
७. सनिष्पेषकरश्चैव—य० । ८. रोषेऽमर्षेऽपि च स्मृतः—ग० ।

६८ नाट्यशास्त्रम्
निषध—
[ ¹मुकुलन्तु यदा हस्तं कपित्थः परिवेष्टयेत् ।
स मन्तव्यस्तदा हस्तो निषधो नाम नामतः ॥
निषध—यदि मुकुल हस्त को कपित्थ हस्त से वेष्टित कर दिया जाए
तो ‘निषध’ मुद्रा जानें।
संग्रहपरिग्रहौ धारणञ्च समयश्च सत्यवचनञ्च ।
सङ्क्षेपः सङ्क्षिप्तं निपीडितेनाभिनेतव्यम् ॥ ]
इसकी योजना, संग्रह, दान, ग्रहण, प्रतिज्ञा, (समय) सत्यवचन ।
संक्षेप तथा समेटने का भाव इसे दबाकर बतलाया जाता है । ]
गृहीत्वा वामहस्तेन कूर्पराभ्यन्तरे भुजम् ।
दक्षिणञ्चापि वामस्य कूर्पराभ्यन्तरे न्यसेत् ॥ १३९ ॥
स चापि दक्षिणो हस्तः सम्यङ्मुष्टिकृतो भवेत् ।
इत्येष निषधो हस्तः कर्म चास्य निबोधत ॥ १४० ॥
यदि बायांहाथ दाहिनीभुजा पर रखा जाए तथा दाहिना हाथ बायीं
भुजा पर, तथा यह दाहिनाहाथ ‘मुष्टि’ हस्त के लक्षण विधिवत् रखता
हो तो उसे ‘निषध’ हस्त जानें ॥ १३९, १४० ॥
एतेन धैर्यम²दगर्वसौष्ठवोत्सुक्यविक्रमाटोपाः ।
अभिमानावष्टम्भ-स्तम्भस्थैर्यादयः कार्याः ॥ १४१ ॥
अब इसकी योजना बतलाता हूँ।
इस हस्तमुद्रा को धैर्य, मद, गर्व, सौष्ठव, औत्सुक्य, पराक्रम, शौर्य,
उद्दण्डता (आरोप), स्वाभिमान, हठ (अवष्टम्भ), स्तम्भ तथा स्थैर्य
आदि भावोंवाले अर्थों में संयोजित किया जाए ॥ १४१ ॥
[ अथवा—
ज्ञेयो वै निषधो नाम हंसपक्षौ पराङ्मुखौ ।
जालवातायनादीनां प्रयोक्तव्योऽभिघट्टने ॥ ]
[ निषध (लक्षणान्तर)—यदि दो विभिन्न दिशाओं में दो हंसपक्ष हस्तों
को रखा जाए तो ‘निषध’ होता है। इसे झरोखा, खिड़की आदि से टक्कर
लगने में संयोजित किया जाए । ]
१. श्लोकद्वयं ग—पुस्तके नास्ति । २. मदगर्वसौष्ठवो—ख०, ग० ।

नवमोऽध्यायः ६९
'दोला—
अंसौ प्रशिथिलौ मुक्तौ पताकौ तु१ प्रलम्बितौ ।
यदा भवेतां करणे स दोल इति संज्ञितः ॥ १४२ ॥
यदि दोनों कन्धों को ढीले रखते हुए दोनों पताक हस्तों को हिलाते
हुए रखे तो करण में प्रयुक्त होने वाली यह हस्तमुद्रा ‘दोला’ जानें ॥१४२॥
सम्भ्रमविषादमूर्च्छितमदाभिघाते तथैव चावेगे ।
व्याधिप्लुते च शस्त्रै२क्षते च कार्योंऽभिनययोगः ॥१४३॥
इससे सम्भ्रम, विषाद, मूर्च्छा, नशे के झटके ( मदाभिघात ), आवेग,
व्याधियुक्तता तथा शस्त्रों से आहतदशा का अर्थ सूचित होता है ॥१४३॥
पुष्पपुट—
यस्तु सर्पशिराः प्रोक्तस्तस्याङ्गुलिनिरन्तरः ।
द्वितीयः पार्श्वसंश्लिष्टः३ स तु पुष्पपुटः स्मृतः ॥ १४४ ॥
दो सर्पशीर्ष हस्तों की अंगुलियों को सटाकर दोनों हाथों को एक
दूसरे से सटा देने पर 'पुष्पपुट' मुद्रा हो जाती है ॥ १४४ ॥
४धान्यफलपुष्पसदृशाम्यनेन नानाविधानि युक्तानि ।
ग्राह्याण्युपनेयानि च तोयानयनापनयने च ॥१४५॥
इससे धान्य, फल तथा पुष्प तथा अन्य इसी के सदृश वस्तुओं का
ग्रहण तथा अर्पण और जल का लाना तथा हटाना सूचित
होता है ॥ १४५ ॥
मकर—
पताकौ तु यदा हस्तौ५वूर्ध्वाङ्गुष्ठावधोमुखौ ।
उपर्युपरि विन्यस्तौ तर्दा६सौ मकरः स्मृतः ॥ १४६ ॥
यदि दो पताक हस्तों को (अंगूठा उठाते हुए) फैला कर एक दूसरे
पर रख दिया जाए तो 'मकर' नामक हस्तमुद्रा हो जाती है ॥ १४६ ॥
सिंहव्यालद्वीपि७प्रदर्शनं नक्रमकरमत्स्यानाम् ।
ये चान्ये क्रव्यादा ८अभिनेयास्तेऽर्थयोगेन ॥ १४७ ॥
१. प्रविलम्बितौ—ग०। २. शत्रुक्षते—ग। ३. सुश्लिष्टः—ग०।
४. धान्यजलपुष्पभक्ष्याण्यनेक नानाविधानि युक्तेन—ग०।
५. हस्तौ मूर्धाङ्गुष्ठा—ग०। ६. तदा स—ग०।
७. सिंहव्यालद्विपददर्श—ग०। ८. ह्यभिनेयास्तेन हस्तेन—ग०।

२. अध्याय ३१-३२: ताल-विधान, चच्चत्पुट आदि ताल एवं ध्रुवा-गान स्वरूप निरूपण

७० नाट्यशास्त्रम्
इस मुद्रा से सिंह, हाथी, गेंडा, घडिताल, मगर, मत्स्य तथा अन्य
हिंसक जन्तुओं का अर्थ प्रदर्शित किया जाता है ॥ १४७ ॥
गजदन्त—
कूर्परांसोच्छ्रितौ हस्तौ यदास्तां सर्पशीर्षकौ ।
गजदन्तः स तु करः कर्म चास्य निबोधत ॥ १४८ ॥
यदि दो सर्पशीर्ष हस्त स्वस्तिक दशा में एक दूसरे स्कन्धों पर रखे
जाएँ तो 'गजदन्त' हस्तमुद्रा हो जाती है ॥ १४८ ॥
एष च वधूवराणामुद्वाहे चातिभार²योगे च ।
स्तम्भ³ग्रहणे च तथा शैलशिलोत्पाटने चैव ॥ १४९ ॥
इससे वर वधू का पाणिग्रहण, अतिभारवहन, स्तम्भग्रहण तथा शैल
एवं पाषाण का उखाड़ना प्रदर्शित किया जाता है ॥ १४९ ॥
अवहित्थ—
शुकतुण्डौ करौ कृत्वा वक्षस्यभिमुखाञ्चितौ ।
शनैरधोमुखाविद्धौ सोऽवहित्थ इति स्मृतः ॥ १५० ॥
यदि दो शुकतुण्डहस्तों को छाती पर नीचे मुंहवाले और लटकते
हुए रखे तो 'अवहित्थ' हस्तमुद्रा हो जाती है ॥ १५० ॥
दौर्बल्ये निःश्वसिते गात्राणां दर्शने तनुत्वे च ।
उत्कण्ठिते च तज्ज्ञैरभिनययोगस्तु कर्त्तव्यः ॥ १५१ ॥
इससे दुर्बलता, निःश्वास, शरीर का सौन्दर्य प्रदर्शन, शरीर का
पतलापन तथा उत्कण्ठा का भाव प्रदर्शित किया जाए ॥ १५१ ॥
वर्धमान—
मुकुलस्तु यदा हस्तः कपित्थपरिवेष्टितः ।
वर्धमानः स विज्ञेयः कर्म चास्य निबोधत ।
जालवातायनादीनां प्रयोक्तव्यो विघाटने ॥ १५२ ॥
यदि मुकुल हस्त को कपित्थ हस्त से लपेटा जाए तो 'वर्धमान' हस्त
मुद्रा होती है । झरोखा तथा खिड़की के खोलने में इसको विनियोजित करे ।
अथवा —
ज्ञेयो वै वर्धमानस्तु हंसपक्षौ पराङ्मुखौ ।
१. कूर्परासञ्चितौ — स० ग० । २. भारयोगेन — ख० ।
३. स्तम्भे ग्रहणे च — ग० ।

नवमोऽध्यायः ७१
सङ्ग्रहपरिग्रहोद्धारणञ्च समयश्च सत्यवचनञ्च ।
¹सङ्क्षेपः सङ्क्षिप्तं निपीडितेनाभिनेतव्यम् ॥ १५३ ॥
अथवा—दो नीचे की ओर हंसपक्ष हस्त रखे जाएं तो 'वर्धमान'
हो जाता है। इस मुद्रा में एक हाथ को दूसरे हाथ से दबाया जाए तो उससे
संग्रह, वस्तु का आदान, उद्धार, प्रतिज्ञा, सत्यवचन तथा संक्षेपकरण अर्थ
बतलाया जाता है ॥ १५३ ॥
उक्ता ह्ये²ते द्विविधास्त्वसंयुताः संयुताश्च सङ्क्षेपात् ।
³अभिनयकरास्तु ये त्विह तेऽन्यत्राप्यर्थतः साध्याः ॥१५४॥
इस प्रकार संक्षेप से असंयुत तथा संयुत ये दोनों हस्त मुद्राएं बतलाई
गईं। इनमें जो अभिनय बतलाए गए वे अन्यत्र भी अर्थों के अनुसार प्रयुक्त
किये जा सकते हैं।
हस्तमुद्राओं की सामान्य विधि—
आकृत्या चेष्टया चिह्नैर्जात्या विज्ञाय तत्पु⁴नः ।
स्वयं वितर्क्य कर्त्तव्यं हस्ताभिनयनं बुधैः ॥ १५५ ॥
अभिनेता के द्वारा हस्तमुद्राओं को उनकी आकृति, गतिविधि, चिन्ह
तथा जाति को स्वयं के अनुभव से देखकर फिर प्रयुक्त करना चाहिए ॥१५५॥
नास्ति कश्चिद्धस्तस्तु नाट्ये⁵ऽर्थोऽभिनयं प्रति ।
यस्य य⁷द् दृश्यते रूपं बहुशस्तन्मयोदितम् ॥ १५६ ॥
संसार में ऐसा कोई हाथों का कार्य ही नहीं जो किसी अर्थ को न
बतलाता हो किन्तु जिस हस्त का जो स्वरूप (या कार्य) अनेक बार देखा
गया है उसे ही मैंने यहाँ बतलाया है ॥ १५६ ॥
अन्ये चाप्यर्थसंयुक्ता लौकिका ये करास्त्विह ।
छन्दतस्ते ⁸प्रयोक्तव्या रसभावविचेष्टितैः ॥ १५७ ॥
इसके अतिरिक्त जो अन्य अर्थों से सम्बद्ध लोक-सामान्य हस्त हों
१. सङ्क्षेपतस्तु संक्षिप्तनिपीडिते—ग० । २. इचेते—ख० ।
३. अभिनयकरा ये त्विह ते ह्यत्राप्यर्थतः साध्याः—ग० ।
४. वस्तुतः—क० ख० ।
५. नास्ति कश्चित्तथा हस्तो नाट्यार्थाभिनयं प्रति—ग० ।
६. नाट्याभिनयनं—ख० । ७. संदृश्यते—ख० ।
८. नियोक्तव्या—ग० ।

७२ नाट्यशास्त्रम्
उन्हें भी रस तथा भावों की सूचक चेष्टाओं के साथ स्वेच्छानुसार प्रयुक्त
करना चाहिए।
देशं कालं प्रयोगञ्चाप्यर्थयुक्तिमवेक्ष्य च।
हस्ता ह्येते प्रयोक्तव्या नृणां स्त्रीणां विशेषतः ॥ १५८ ॥
ये हस्तमुद्राएं पुरुषों तथा विशेषतः स्त्रियों के द्वारा देश, काल, प्रयोग
तथा योग्यता (अर्थयुक्ति) को देखकर प्रयुक्त की जाएं ॥ १५८ ॥
हस्तमुद्राओं की विविध क्रियाएं—
सर्वेषामेव हस्तानां यानि कर्माणि सन्ति वै।
तान्यहं सम्प्रवक्ष्यामि रसभावकृतानि तु ॥ १५९ ॥
उत्कर्षणं विकर्षणं तथा व्योकर्षणं पुनः।
परिग्रहो निग्रहश्चाह्वानं तोदनमेव च ॥ १६० ॥
संश्लेषश्च वियोगश्च रक्षणं मोक्षणन्तथा।
विक्षेपधूनने चैव विसर्गस्तर्जनन्तथा ॥ १६१ ॥
छेदनं भेदनञ्चैव स्फोटनं मोटनन्तथा।
ताडनञ्चेति विज्ञेयं तज्ज्ञैः कर्म करान् प्रति ॥ १६२ ॥
अब मैं (इन) सभी हस्तों की उन क्रियाओं को जो रस तथा भाव
से युक्त होती हैं—वर्णन करूंगा। ये क्रियाएं हैं—उत्कर्षण, (ऊपर की
ओर उछलना), विकर्षण (खींचना), व्याकर्षण (बाहर छिटकना), परिग्रह
(ग्रहण करना), निग्रह (विनाश करना), आह्वान (बुलाना, संकेत करना),
तोदन (ताड़न करना), संश्लेष (मिलना, मिलाना), वियोग (हटाना,
हटना), रक्षण (रक्षा करना), मोक्षण (फेंकना), विक्षेप (फेंकना, त्याग
करना), धूनन (हिलाना कंपाना); विसर्ग (ससम्मान अर्पण या त्याग
करना), छेदन (तोड़ना), भेदन (काटना), स्फोटन (विकसित करना), मोटन
(संकोच करना) तथा ताडन (पीटना) ॥ १५९–१६२ ॥
उत्तानः पार्श्वगश्चैव तथाधोमुख एव च।
हस्तप्रचारस्त्रिविधो नाट्यतत्त्वसमाश्रयः ॥ १६३ ॥
१. अर्थयुक्तिम्—ग०। २. सन्ति हि—ग०।
३. चैवापकर्षणम्—ग०। ४. परिग्रहश्चाप्याह्वानं ताडनं तर्जनं तथा—ख०।
५. नोदनं तथा—ग०। ६. विसर्गस्तदनन्तरम्—ग०।
७. मोहनं तथा—ग०।

नवमोऽध्यायः ७३
नाट्यतत्वों के (सिद्धान्त के) अनुसार हस्तप्रचार तीन प्रकार से किया
जाता है । यथा—(१) उत्तान (ऊपर की ओर मुंह करके), (२) पार्श्वग
(दायी या बांयी ओर मुंह करके) तथा (३) अधोमुख (नीचे की ओर
मुंह करके......) ॥ १६३ ॥
सर्वे हस्तप्रचाराश्च प्रयोगेषु यथाविधि ।
नेत्रभ्रूमुखरा^१गैद्यैः कर्तव्या व्यञ्जिता बुधैः ॥ १६४ ॥
इन हस्तप्रचारों को प्रयोग के समय शास्त्र निदर्शित विधि के साथ नेत्र,
भौंहे, मुखराग आदि के द्वारा बुद्धिमान प्रयोक्ताजन व्यक्त करें ॥ १६४ ॥
हस्तमुद्राओं का कार्य—
करणं कर्म स्थानं प्रचारयुक्तिं क्रियाञ्च ^२समवेक्ष्य ।
हस्ताभिनयः कार्यस्तज्ज्ञैर्लोकोपचारेण ॥ १६५ ॥
बुद्धिमान (प्रयोक्ता) जन इन हस्तों (हस्ताभिनयों) का लोक व्यवहार
के अनुसार प्रयोग करें तथा उसी समय इनके करण, (अध्याय ४ में वर्णित)
कर्म, (पताक आदि) स्थान, (ललाट आदि प्रदेश) प्रचार, (अल्प, मध्य
आदि) युक्ति (मुख्य या गौण बनाने का कारण) तथा क्रिया को
देख कर प्रयोग निश्चित कर लें ॥ १६५ ॥
उत्तमानां कराः कार्या ललाटक्षेत्रचारिणः ।
वक्षःस्थाश्चैव मध्यमानामधमानामधोगताः ॥ १६६ ॥
उत्तम पात्रों के हस्तों को ललाट प्रदेश के समीप, मध्यम पात्रों के
वक्षःस्थल के समीप तथा अधमपात्रों के इससे नीचे शरीर के भाग के समीप
क्रियाशील रखना चाहिए ॥ १६६ ॥
हस्तमुद्राओं का प्रचार—
ज्येष्ठे स्वल्पप्रचाराः स्युर्मध्ये^४ कुर्वीत मध्यमैः ।
अधमेषु प्रकीर्णाश्च हस्ताः कार्याः प्रयोक्तृभिः ॥ १६७ ॥
ज्येष्ठ अभिनय में इन हस्तमुद्राओं का प्रचार अल्प रहना चाहिए
मध्य में मध्यमप्रचार तथा अधम अभिनय में हस्त मुद्राओं का विपुलता
से प्रचार रहना चाहिए ॥ १६७ ॥
लक्षणव्यञ्जिता हस्ताः कार्यास्तूत्तममध्यमैः ।
लोकक्रियास्वभावेन नीचैरप्यर्थसंश्रयाः ॥ १६८ ॥
१. रागैश्च—ग० । २. सम्प्रेक्ष्य—ग० । ३. तज्ज्ञैः कार्यो—ग० ।
४. मध्ये मध्यविचारिणः—ख—ग० । ५. प्रकीर्णास्तु—ग० ।

७४ नाट्यशास्त्रम्
उत्तम तथा मध्यम पात्रों के द्वारा इन हस्तमुद्राओं का प्रयोग शास्त्रीय
लक्षणों के अनुसार अर्थाभिव्यक्ति करे परन्तु अधमपात्रों के द्वारा
लोकक्रियाओं का हस्ताभिनय में अनुसरण किया जाय ॥ १६८ ॥
अथवान्यादृशं प्राप्य प्रयोगं कालमेव च ।
विपरीताश्रया हस्ताः प्रयोक्तव्या बुधैर्न१ वा ॥ १६९ ॥
परन्तु जब कोई असम्मान्यप्रयोग या समय हो तो बुद्धिमान इन
हस्तमुद्राओं के प्रयोग को वर्णित लक्षण से भिन्न स्वरूप में संयोजित करे
या न भी करे ॥ १६९ ॥
विषण्णे मूर्च्छिते २ह्रीते जुगुप्सा-शोकपीडिते ।
ग्लाने ३स्वप्ने विहस्ते च निश्चेष्टे तन्द्रिते जडे ॥ १७० ॥
व्याधिग्रस्ते जरार्त्ते च भयार्त्ते शीतविप्लुते ।
मत्ते प्रमत्ते चोन्मत्ते चिन्तायां तपसि स्थिते ॥ १७१ ॥
हिमवर्षहते बद्धे ५वारिणि प्लवसंश्रिते ।
स्वप्नायिते च सम्भ्रान्ते ६नर्तनसंस्फोटने तथा ॥ १७२ ॥
न हस्ताभिनयः कार्यः कार्यः सत्त्वसमाश्रयः ।
तथा ७काकुविशेषश्च नानार्थ८रसभावकः ॥ १७३ ॥
जब कोई पात्र, खिन्न, मूर्च्छित, लज्जित, घृणा तथा शोक से प्रपीडित,
मलिन (ग्लान) सोया हुआ, लूला (विहस्त) बेहोश, तन्द्रिल, जड़,
बीमार, बुढ़ापे से त्रस्त, भय पीड़ित, ठंड से ठिठुरता हुआ या त्रस्त,
मदमत्त, पागल, चिन्तित, तप करते हुए, बर्फ या वर्षा के कारण त्रस्त
(आहत), कैद, जल या डोंगें में संचारशील, स्वप्न में बकते हुए, भ्रान्तियुक्त,
तथा नखों से कुरेदने या पटकनेवाला रहे तो ऐसी दशा में हस्त की
योजना न की जाए किन्तु अनेक अर्थ रस तथा भावों को अभिव्यक्त करने
वाला तथा विभिन्न स्वरों से अभिव्यक्त होने वाला रसाभिनय प्रारम्भ करना
चाहिए (या उसका ग्रहण करना चाहिए) ॥ १७०-१७३ ॥
१. बुधैर्नरैः—ग। २. भीते—ख०, ग०। ३. सुप्ते—ख०, ग०।
४. हिमवर्षगते—ख०, ग०। ५. बन्धे हरिणप्लवसंश्रिते—ख०, ग०।
६. नखसंस्फो—ख०, ग०। ७ तथाकारविशेषश्च—ख०, ग०।
८. नानाभावरसान्वितः—ख०, ग०।

नवमोऽध्यायः ७५
यत्र व्यग्रावुभौ हस्तौ तत्तैर्दृष्टिविलोकनैः ।
वाचिकाभिनयं कुर्याद् विरामैरर्थदर्शकः ॥ १७४ ॥
वाचिकाभिनय के समय विभिन्न ( तथा वर्णित उन सभी ) दृष्टियों
तथा अवलोकन क्रियाओं को हस्त क्रियाओं के अनुसार इस प्रकार दक्षता-
पूर्वक निदर्शित करना चाहिए जिससे कि उनके द्वारा प्रदर्शित वाचिक
अभिनय के विराम आदि नियमानुसार प्रस्तुत करने पर अर्थों की
( स्पष्टतः ) अभिव्यक्ति हो ॥ १७४ ॥
उत्तानः पार्श्वगश्चैव तथाऽधोमुख एव च ।
प्रचारस्त्रिविधोऽङ्गानां नाट्यनृत्तसमाश्रयः ॥ १७५ ॥
नाट्य तथा नृत्त में प्रयोग ( के समय प्रदर्शित ) किया जाने वाला
हस्त प्रचार त्रिविध है—यथा ( १ ) उत्तान, ( २ ) पार्श्वग तथा ( ३ )
अधोमुख ॥ १७५ ॥
उत्तानो वर्त्तुलस्त्र्यश्रः स्थितोऽधोमुख एव च ।
पञ्च प्रचारा हस्तस्य नाट्यनृत्तसमाश्रयाः ॥ १७६ ॥
अभिनय तथा नृत्य में हस्त प्रचार की पांच विधायें हैं । यथा ( १ )
उत्तान ( उपर की ओर हथेली का रहना ), ( २ ) वर्तुल ( गोल घुमाव
लेना ), ( ३ ) त्र्यस्त्र ( तिरछे या मोड़ कर घुमाना ), ( ४ ) स्थित
(स्थिर रहना) तथा ( ५ ) अधोमुख (हथेली को उल्टी करना) ॥ १७६ ॥
एवं ज्ञेयाः करा ह्येते नानाभिनयसंश्रयाः ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि करान् नृत्तसमाश्रयान् ॥ १७७ ॥
इस प्रकार अनेक रसों तथा भावों से सम्बद्ध अनेक हस्त मुद्राओं को
मैंने बतलाया अब मैं नृत्त हस्तों को बतलाता हूँ ॥ १७७ ॥
नृत्तहस्त—
वक्षसोऽष्टाङ्गुलस्थौ तु प्राङ्मुखौ कँटकामुखौ ।
समानकूर्परांसौ च चतुरस्रौ प्रकीर्तितौ ॥ १७८ ॥
१. नृत्तहस्त—नृत्त के अन्तर्गत होनेवाले विभिन्न प्रचार (चाल) शारीरिक
मुद्राओं तथा स्थितियों में शोभा, सौन्दर्य तथा आकर्षण उत्पन्न करने के लिए ही
१. तत्र दृष्टि—ख; यत्र दृष्टि—ग० ।
२. उत्तालोऽधस्तलस्तिर्यगूर्ध्वाऽधोमुख एव च । हस्तप्रचारा विज्ञेया नाट्ये
नृत्ते च पञ्चधा—ग० ।
३. पद्यमेतत् ग—पुस्तके नास्ति । ४. संश्रिताः—ग० ।
५ वक्षःस्थोऽष्टाङ्गुल—ग०। ६. खटका—क-ख०।

७६ नाट्यशास्त्रम्
चतुरस्र—छाती से आठ अंगुल के अन्तर पर सामने की ओर दोनों
हाथों को कटकामुखमुद्रा में तथा दोनों कन्धों तथा कोहनी को समान
ऊंचाई पर रखना 'चतुरस्र' कहलाता है ॥ १७८ ॥
हंसपक्षकृतौ हस्तौ व्यावृतौ तालवृन्तवत् ।
उद्वृत्ताविति विज्ञेयावथवा तालवृन्तकौ ॥ १७९ ॥
उद्वृत्तः—दो हंसपक्ष हस्तों को पंखे के समान हिलाना । इसका अन्य
नाम 'तालवृन्तक' भी है ॥ १७९ ॥
चतुरस्रस्थितौ हस्तौ हंसपक्षकृतौ तथा ।
तिर्यक्स्थितौ चाभिमुखौ ज्ञेयौ तलमुखाविति ॥ १८० ॥
तलमुख—चतुरस्त्र दशा में हंसपक्ष हस्तों को तिरछे तथा एक दूसरे
के सम्मुख रखना ॥ १८० ॥
तावेव मणिबन्धान्ते स्वस्तिकाकृतिसंस्थितौ ।
स्वस्तिकाविति विख्यातौ वियुतौ विप्रकीर्णकौ ॥ १८१ ॥
स्वस्तिक—यदि तलमुख नृत्त-हस्त कलाई पर से स्वस्तिक किये जाएं ।
विप्रकीर्ण—( तथा ) स्वस्तिक नृत्तहस्त के प्रदर्शन के पश्चात् उन्हें
हटा लेना ॥ १८१ ॥
नृत्त-हस्तों की सर्जना की गई । वस्तुतः ये नृत्तहस्त हाथ की विभिन्न अवस्थाएं
ही हैं क्योंकि इनसे किसी अर्थविशेष की प्रतीति नहीं होती; फिर भी अंग-भंगों
से जो लावण्य निखरता है उसमें नृतहस्तों का बड़ा हाथरहता है । ये समतोलपन
( Balance ) के सिद्धान्त पर निर्मित किये गये ( प्रतीत होते ) हैं, क्योंकि
समतलपन ( चतुरस्रता ) भी शरीर के सौन्दर्य में समाविष्ट माना जाता है ।
नृत्तहस्त हाथ, पैर तथा शरीर के सामंजस्य द्वारा सौन्दर्य उत्पन्न करते हैं और
नृत्यप्रदर्शन को शोभा शाली बनाते हैं । इसीलिए ये नृत्य के अलंकार माने गये ।
नृतहस्तों की उत्पत्ति संयुत तथा असंयुत हस्तमुद्राओं से हुई है परन्तु कुछ
नृत्तहस्तों में मिश्रमुद्राओं ( के भिन्न मुद्राओं में संयोजन ) की भी योजना रहती
है । नृतहस्त हाथ के चालन से निर्मित होने के कारण उनका रेखांकन संभव
नहीं; यही कारण है कि संयुत तथा असंयुतहस्तों के सभी रेखाचित्र दिये गए पर
नृत्तहस्तों के नहीं दिये जा सके ।

नवमोऽध्यायः ७७

अलपल्लव-संस्थानावूर्ध्वास्यौ पद्मकोशकौ ।
अरालकटकाख्यौ चाप्येरालखटकामुखौ ॥ १८२ ॥
अराल खटकामुख—दोनों अलपल्लव हस्तोँ को ऊपर हथेली रखते हुए
पद्मकोश हस्तोँ में परिवर्तित कर देना । इसका अन्य नाम 'अरालखटका'
भी है ॥ १८२ ॥
[ तथैव मणिबन्धान्ते हारलौ विच्युतावुभौ ।
ज्ञेयौ प्रयोक्तृभिर्नित्यम् अरालखटकाविति ॥ ]
(प्रक्षिप्तः—यदि दो अराल हस्तोँ को कलाई को नोक से स्वस्तिक के
बाद विच्युत कर दिया जाए तो उसे प्रयोक्तागण अरालखटकामुख जानें ।)
भुजांसकूर्पराग्रैस्तु कुटिलावर्तितौ करौ ।
पराङ्मुखतलौविद्धौ ज्ञेयावाविद्धवक्रकौ ॥ १८३ ॥
आविद्धवक्र—विपरीत बाहु, कंधा तथा कोहनी के कोनों को कुटिल
(तिरछी) गति से दोनों हाथों से स्पर्श करते हुए दोनों अराल मुद्रा की
हथेलियों को ऊपर तथा नीचे की ओर कंपित करते हुए बदलना ।
हस्तौ तु सर्पशिरसौ मध्यमाङ्गुष्ठकौ यदा ।
तिर्यक्प्रसारितास्यौ च तदा सूचीमुखौ स्मृतौ ॥ १८४ ॥
सूचीमुख—दो सर्पशीर्ष हस्तोँ को अपने अंगूठों के साथ तिरछे फैलाकर
हथेली के मध्य का (मध्यमांगुली का) स्पर्श करते हुए रखना ॥ १८४ ॥
[ संर्पशीर्षौ यदा हस्तौ भवेतां स्वस्तिकस्थितौ ।
मध्यप्रसारिताङ्गुष्ठौ ज्ञेयौ सूचीमुखौ तदा ]
अथवा स्वस्तिक के पश्चात् (यदि) दो सर्पशीर्ष हस्तोँ को मध्यमां-
गुली के पास हथेली में अंगूठों का स्पर्श करते हुए रखना सूचीमुख है।
रेचितौ वापि विज्ञेयौ हंसपक्षौ द्रुतभ्रमौ ।
प्रसारितोत्तानतलौ रेचिताविति संज्ञितौ ॥ १८५ ॥
रेचित—दो हंसपक्ष हस्तोँ को तेजी से घुमाकर हथेली को ऊपर की
ओर मुंह कराते हुए फैला देना ॥ १८५ ॥
१. खटका—क-ख० । २. वाप्य-ख; वा—ग० ।
३. पद्यमेतत्—ग-पुस्तके नास्ति । ४. हारालविच्युता—ख० ।
५ मुखतया—ख० । ६. मध्यस्था—ख० ।
७ पद्यमेतत् ग—पुस्तके नास्ति । ८. हंसपक्षोद्धृतभ्रमौ—ख० ।
९. संस्थितौ—ख० ।

चतुरश्रो भवेद्वामः सव्यहस्तश्च रेचितः ।
विज्ञेयौ नृत्ततत्त्वज्ञैरर्धरेचितसंज्ञितौ ॥ १८६ ॥
अर्धरेचित—बाएं हाथ को चतुरस्र तथा दाहिने हाथ को रेचित
करना नृत्त के विद्वानों के मत में 'अर्धरेचित' है ॥ १८६ ॥
अञ्चितौ कूर्परांसौ तु त्रिपताकौ करौ कृतौ ।
किञ्चित्तिर्यग्गतावेतौ स्मृतावुत्तानवञ्चितौ ॥ १८७ ॥
उत्तानवंचित—दो त्रिपताक हस्तों को कुछ तिरछे और कुछ नमाते
हुए रखना तथा कन्धों और केहुनियों को हिलाना ॥ १८७ ॥
मणिबन्धनमुक्तौ तु पताकौ पल्लवौ स्मृतौ ।
बाहुशीर्षाद्विनिष्क्रान्तौ नितम्बाविति कीर्तितौ ॥ १८८ ॥
पल्लव—कलाई से दो पताक हस्तों को मिलाना (तथा हाथों को
कन्धे के बराबर रखना)
नितम्ब—(पल्लव हस्त को या) दो पताक हस्तों को कन्धे से ऊपर
निकाल कर ले जाना ॥ १८८ ॥
केशदेशाद्विनिष्क्रान्तौ परिपार्श्वोत्थितौ तथा ।
विज्ञेयौ केशबन्धौ तु करावाचार्यसम्मतौ ॥ १८९ ॥
केशबन्ध—केश प्रदेश या शिखा पर से ऊपर घुमाकर दोनों (पताक-)
हस्तों को दोनों बाजुओं में (सीधा) रखना ॥ १८६ ॥
तिर्यक् प्रसारितौ चैव पार्श्वसंस्थौ तथैव च ।
लताख्यौ च करौ ज्ञेयौ नृत्ताभिनयने प्रति ॥ १९० ॥
लता—(बन्ध)—दोनों हाथों को तिरछे फैलाकर बाद में दोनों
बाजुओं में फैलाकर रखना ॥ १९० ॥
समुन्नतो लताहस्तः पार्श्वात् पार्श्वं विलोलितः ।
त्रिपताकोऽपरः कर्णे करिहस्तैः प्रकीर्तितः ॥ १९१ ॥
करिहस्त—लता हस्त करने के बाद उसे ऊंचा करते हुए एक बाजू से
दूसरी बाजू की ओर झुलाना (विलोळित) तथा बाद में एक हाथ का
त्रिपताक मुद्रा में कर्ण के समीप रखना ॥ १९१ ॥
१. त्रिपताकाकृतौ करौ—ख-ग०। २. परिपार्श्वस्थितौ—ख०।
३. केशबन्धाख्यौ—ख-ग०। ४. करिहस्तौ प्रकीर्तितौ—ग०।

नवमोऽध्यायः ७९
कटिशीर्षनिवि¹ष्टौ द्वौ त्रिपताकौ यदा करौ ।
पक्षवञ्चितकौ हस्तौ तदा ज्ञेयौ प्रयोक्तृभिः ॥ १९२ ॥
पक्षवंचितक—एक त्रिपताक हस्त कटि प्रदेश पर तथा दूसरा शीर्ष
स्थान (के बराबर—) पर रखना ॥ १९२ ॥
तावेव तु परावृत्तौ पक्षप्रद्योतकौ स्मृतौ ।
अधोमुखतलाविद्धौ ज्ञेयौ गरुडपक्षको ॥ १९३ ॥
पक्षप्रद्योतक—पक्षवंचितक हस्तोँ को उलटे कर देना ।
गरुडपक्ष—पक्षवंचित हस्त को औंधी हथेली करते हुए रखना ॥१९३॥
हंसपक्षकृतौ हस्तौ व्यावृत्तपरिवर्तितौ ।
तथो² प्रसारितभुजौ दण्डपक्षाविति स्मृतौ ॥ १९४ ॥
दण्डपक्ष :—दोनों हंसपक्ष हस्तोँ को क्रमशः उलटे सीधे घुमाकर
(तथा) बाद में कोहनी से कंधे तक बाहुओं को सीधे फैलाकर रखना ॥१९४॥
ऊर्ध्वमण्डलिनौ हस्तौ ऊर्ध्वदेशविवर्तनात् ।
तावेव पार्श्वविन्यस्तौ पार्श्वमण्डलिनौ स्मृतौ ॥ १९५ ॥
ऊर्ध्वमण्डली—दण्डपक्ष हस्त को ऊपर की ओर गोल (चक्कर)
घुमाना ।
पार्श्वमण्डली—एक बाजू में ऊर्ध्वमण्डली हस्तोँ को रखना ॥ १९५ ॥
उद्वेष्टितो भवेदेको द्वितीय³श्चापवेष्टितः ।
भ्र⁴मितावुरसः स्थाने ह्युरोमण्डलिनौ स्मृतौ ॥ १९६ ॥
उरोमण्डली—एक उद्वेष्टित (ऊपर की ओर उठाए हुए) तथा दूसरे
अपवेष्टित (नीचे की ओर झुके हुए) हस्त को वक्षःस्थल के समीप घुमाते
हुए रखना ॥ १९६ ॥
अलपल्लवकारालावुरोऽर्धभ्रमणक्रमात् ।
पार्श्वार्वतश्च विज्ञेयावुरःपार्श्वार्धमण्डलौ ॥ १९७ ॥
उरःपार्श्वमण्डल—अलपल्लव तथा अराल हस्तोँ को आधा घुमाव
देकर एक को बाजू में व दूसरे को ऊपर (वक्षःस्थल के समीप) रखना ॥१९७॥
१. शीर्षनिविष्टाग्रौ—ग० । २. यथा—ग० ।
३. द्वितीयश्च विवेष्टितः—ग० । ४. भ्रामिता—ख ।
५. अरालपल्लवकरावुरो—ख० ।

हस्तौ तु मणिबन्धान्ते कुञ्चितावञ्चितौ यदा ।
खटकाख्यौ कृतौ स्यातां मुष्टिकस्वस्तिकौ तदा ॥ १९८ ॥
मुष्टिकस्वस्तिक—दो खटकामुख हस्तों की कलाई के कोनो पर झुकाते
हुए तथा गोल घुमाव देते हुए उद्वेष्टित करण में रखना ॥ १९८ ॥
पद्मकोशौ यदा हस्तौ व्योवृत्तपरिवर्तितौ ।
नलिनीपद्मकोशौ तु तदा ज्ञेयौ प्रयोक्तृभिः ॥ १९९ ॥
नलिनीपद्मकोश—पद्मकोश हस्तों को औंधे सीधे (घुमाव देना या)
पलटना ॥ १९९ ॥
करावुद्वेष्टिताग्रौ च प्रविधायालपल्लवौ ।
ऊर्ध्वप्रसारिताविद्धौ कर्त्तव्यावुल्बणाविति ॥ २०० ॥
अलपल्लव—दोनों हाथों को ऊपर की ओर घुमाव देते हुए उद्वेष्टित
करण में रखना ।
उल्बण—अलपल्लव हस्तों को ऊपर की ओर फैलाकर (कन्धे के बराबर)
घुमाया जाना ॥ २०० ॥
पल्लवौ च शिरोदेशं⁴ सम्प्राप्तौ ललितौ स्मृतौ ।
कूर्परस्वस्तिकगतौ लताख्यौ वलिताविति ॥ २०१ ॥
ललित—दो पल्लव हस्तों को सिर पर (घुमाव देना) ले जाना ।
वलित—दो लता हस्तों को कलाई पर स्वस्तिक कर देना ॥ २०१ ॥
करणे तु प्रयोक्तव्या नृत्तहस्ता विशेषतः ।
तथार्थाभिनये चैव पताकाद्याः प्रयोक्तृभिः ॥ २०२ ॥
नृत्तहस्तों का विशेष रूप से प्रयोग करणों के निर्माणार्थ करना चाहिए
तथा अर्थाभिनय के प्रदर्शन में भी करना चाहिए जैसा कि पताक आदि
हस्तमुद्राओं का अर्थ प्रदर्शन हेतु प्रयोग किया जाता है ॥ २०२ ॥
सङ्करोऽपि भवेत्तेषां प्रयोगोऽर्थवशात् पुनः ।
प्राधान्येन पुनस्सञ्ज्ञा नाट्ये नृत्ते करेष्विह ॥ २०३ ॥
१. कटकाख्यौ तु तौ—ग० । २. व्यावत्तै—ग०
३. विज्ञेयावुल्वणावपि—ख; विज्ञेयौ उल्बणाविति—ग० ।
४. एतत् पद्यत्रयं ख-पुस्तके नास्ति । ५. शिरोदेशे—ग० ।
६. ललिताविति—ग० ।