नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 173, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ें६२ नाट्यशास्त्रम्
वृन्तात् पुष्पोद्धरणं वर्तिशलाकादिपूरणञ्चैव ।
धिगिति च वचनं रोषे मुखसन्दंशस्य कर्माणि ॥ १११ ॥
मुखसन्दंश से टहनी से पुष्पों को तोड़ने, दीपक में बाती को रखने
या उसे शलाका से ठीक करने, किसी वस्तु की पूर्ति करने, धिक्कार के
शब्द तथा क्रोध करने अर्थ प्रकाशित होता है ॥ १११ ॥
यज्ञोपवीतधारण-वेधन-गुणसूक्ष्मबाणलक्ष्येषु ।
योगे² ध्याने स्तोके संयुक्तकैररणस्तु कर्त्तव्यः ॥ ११२ ॥
दो मुखसन्दंश हस्तों को मिलाने से यज्ञोपवीत धारण, (रत्न आदि
का) वेधन, प्रत्यंचा, बारीकी, बाण, लक्ष्य, योग, ध्यान तथा छोटी वस्तु
को बतलाया जाता है ॥ ११२ ॥
पेलॅवकुत्सासूया-सदोषवचने च वामहस्तेन ।
किञ्चिद्विवर्त्तिताग्रः प्रयुज्यते पार्श्वसन्दंशः ॥११३॥
पार्श्वसन्दंश—यदि बाँयी ओर सन्दंशहस्त के अग्रभाग को थोड़ा
(धीरे-धीरे) मोड़ते हुए रखा जाए तो इसपार्श्वसन्दंश से कोमलता (पेलव),
असूया तथा दोषपूर्ण शब्दों की अभिव्यक्ति होती है ॥ ११३ ॥
आलेख्यनेत्ररञ्जन-वितर्कवृन्तप्रवालरर्चनञ्च ।
निष्पीडनं तथालक्तकस्य कार्यञ्च नारीभिः ॥ ११४ ॥
इस मुद्रा का स्त्रियों के द्वारा प्रयोग करने पर उससे चित्रलेखन, नेत्रों
में अंजन धारण, वितर्क (शंका), टहनी तथा पत्तों की चित्रकारी (प्रवाल-
रचना) करना (जो कि शरीर पर की जाती है) तथा महावर का लगाना
बतलाया जाता है ॥ ११४ ॥
मुकुल¹—
समागताग्राँस्सहिता यस्याङ्गुल्यो भवन्ति हि ।
ऊर्ध्वा हंसमुखस्यैव स भवेन्मुकुलः करः ॥ ११५ ॥
यदि हंसास्यहस्त में ऊपर की ओर मुंह किये हुए सभी उंगलियाँ
१. मुकुलः (उत्पत्तिकथा) वायुपुत्र हनुमान द्वारा सूर्य को झड़पने के लिए
इसी हस्त का उपयोग किया गया था तभी से इसका प्रचलन हो गया ।
१. यज्ञोपवीतनिधन—ग० । २. योगेऽध्ययने—ग० ।
३. संयुक्तकरस्तु—ख० ग० । ४. पेशल—ग० ।
५. किञ्चिद्विवर्त्तितकराग्रः—ग० । ६. रचनेषु—ग० ।
७. समा नताग्राः सहिताः—ख ग० ।