नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः ७१
सङ्ग्रहपरिग्रहोद्धारणञ्च समयश्च सत्यवचनञ्च ।
¹सङ्क्षेपः सङ्क्षिप्तं निपीडितेनाभिनेतव्यम् ॥ १५३ ॥
अथवा—दो नीचे की ओर हंसपक्ष हस्त रखे जाएं तो 'वर्धमान'
हो जाता है। इस मुद्रा में एक हाथ को दूसरे हाथ से दबाया जाए तो उससे
संग्रह, वस्तु का आदान, उद्धार, प्रतिज्ञा, सत्यवचन तथा संक्षेपकरण अर्थ
बतलाया जाता है ॥ १५३ ॥
उक्ता ह्ये²ते द्विविधास्त्वसंयुताः संयुताश्च सङ्क्षेपात् ।
³अभिनयकरास्तु ये त्विह तेऽन्यत्राप्यर्थतः साध्याः ॥१५४॥
इस प्रकार संक्षेप से असंयुत तथा संयुत ये दोनों हस्त मुद्राएं बतलाई
गईं। इनमें जो अभिनय बतलाए गए वे अन्यत्र भी अर्थों के अनुसार प्रयुक्त
किये जा सकते हैं।
हस्तमुद्राओं की सामान्य विधि—
आकृत्या चेष्टया चिह्नैर्जात्या विज्ञाय तत्पु⁴नः ।
स्वयं वितर्क्य कर्त्तव्यं हस्ताभिनयनं बुधैः ॥ १५५ ॥
अभिनेता के द्वारा हस्तमुद्राओं को उनकी आकृति, गतिविधि, चिन्ह
तथा जाति को स्वयं के अनुभव से देखकर फिर प्रयुक्त करना चाहिए ॥१५५॥
नास्ति कश्चिद्धस्तस्तु नाट्ये⁵ऽर्थोऽभिनयं प्रति ।
यस्य य⁷द् दृश्यते रूपं बहुशस्तन्मयोदितम् ॥ १५६ ॥
संसार में ऐसा कोई हाथों का कार्य ही नहीं जो किसी अर्थ को न
बतलाता हो किन्तु जिस हस्त का जो स्वरूप (या कार्य) अनेक बार देखा
गया है उसे ही मैंने यहाँ बतलाया है ॥ १५६ ॥
अन्ये चाप्यर्थसंयुक्ता लौकिका ये करास्त्विह ।
छन्दतस्ते ⁸प्रयोक्तव्या रसभावविचेष्टितैः ॥ १५७ ॥
इसके अतिरिक्त जो अन्य अर्थों से सम्बद्ध लोक-सामान्य हस्त हों
१. सङ्क्षेपतस्तु संक्षिप्तनिपीडिते—ग० । २. इचेते—ख० ।
३. अभिनयकरा ये त्विह ते ह्यत्राप्यर्थतः साध्याः—ग० ।
४. वस्तुतः—क० ख० ।
५. नास्ति कश्चित्तथा हस्तो नाट्यार्थाभिनयं प्रति—ग० ।
६. नाट्याभिनयनं—ख० । ७. संदृश्यते—ख० ।
८. नियोक्तव्या—ग० ।