सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 668 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 172

नवमोऽध्यायः ६१
योजना—इस के द्वारा पितरों को जल-प्रदान ( तर्पण ) तथा कपोल
के समीप ले जाने पर किसी दान का ग्रहण करना प्रकट होता है, तथा
( भोजन के समय किया जाने वाला ) ब्राह्मणों का आचमन तथा भोजन,
आलिंगन, बड़े स्तम्भ के दर्शन, रोमांच, स्पर्श, चन्दन-लेपन, संवाहन
( पैर या शरीर दबाने ) का अर्थ प्रकट होता है। इस मुद्रा का रसों के
अनुसार तथा स्त्रियों के रागात्मक अभिनय में उनके दुःख, (ठुड्डी के स्पर्श )
तथा उरोज प्रदेश के विशेष विभ्रमों के अर्थ प्रकाशनार्थ प्रयोग करना
चाहिए ॥ १०५-१०७ ॥
१सन्दंश—
तर्जन्यङ्गुष्ठसन्दष्टैस्त्व१रालस्य यदा भवेत् ।
आभुग्नतलमध्यस्थः स सन्दंश इति स्मृतः ॥ १०८ ॥
यदि अरालहस्त में तर्जनी तथा अंगूठे का अग्रभाग मिला कर हथेली
को थोड़ी नमा दी जाए तो 'सन्दंश' हस्त हो जाता है ॥ १०८ ॥
सन्दंशस्त्रिविधो ज्ञेयस्त्व३ग्रजो मुखजस्तथा ।
तथा पार्श्वगतश्चैव रसभावोपबृंहितः ॥ १०६ ॥
रस तथा भावों से विस्तार प्राप्तकरनेवाला सन्दंश-हस्त तीन प्रकार
का होता है—( १ ) अग्रज, ( सामने की ओर रहने वाला ) ( २ )
मुखज ( मुंह के समीप रहने वाला ) तथा ( ३ ) पार्श्वगत ( एक ओर
रहने ( या होने ) वाला ॥ १०९ ॥
पुष्पापचयग्रथने ग्रहणे तृणपर्णकेशसूत्राणाम् ।
शल्यावयवग्रहणे प्रकर्षणे चाग्रसन्दंशः ॥ ११० ॥
योजना—अग्रज-सन्दंश के द्वारा पुष्पों का एकत्र करना तथा माला
का गूँथना, तृण, पर्ण, केश तथा सूत्र का ग्रहण, कण्टक की नोक के
ग्रहण करने ( शल्यावयवग्रहणे ) तथा बाण के खींचने का अर्थ प्रकट
होता है । ॥ ११० ।
१. सन्दंश (उत्पत्तिकथा) इस मुद्रा का प्रयोग भगवती वीणापाणी सरस्वती
द्वारा किया गया था। यह हस्त ज्ञानमुद्रा के रूप में अनेक प्राचीनमूर्तिशिल्पों में
दृष्टिगत होता है ।
१. सन्दंशो ह्यरालस्य—ख ग० । २. तलमध्यश्च—ख० ग० ।
३. ज्ञेयो अग्रजो—ग० । ४. शल्याकर्षणग्रहणापकर्षणे—ख० ग० ।