नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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निषध—
[ ¹मुकुलन्तु यदा हस्तं कपित्थः परिवेष्टयेत् ।
स मन्तव्यस्तदा हस्तो निषधो नाम नामतः ॥
निषध—यदि मुकुल हस्त को कपित्थ हस्त से वेष्टित कर दिया जाए
तो ‘निषध’ मुद्रा जानें।
संग्रहपरिग्रहौ धारणञ्च समयश्च सत्यवचनञ्च ।
सङ्क्षेपः सङ्क्षिप्तं निपीडितेनाभिनेतव्यम् ॥ ]
इसकी योजना, संग्रह, दान, ग्रहण, प्रतिज्ञा, (समय) सत्यवचन ।
संक्षेप तथा समेटने का भाव इसे दबाकर बतलाया जाता है । ]
गृहीत्वा वामहस्तेन कूर्पराभ्यन्तरे भुजम् ।
दक्षिणञ्चापि वामस्य कूर्पराभ्यन्तरे न्यसेत् ॥ १३९ ॥
स चापि दक्षिणो हस्तः सम्यङ्मुष्टिकृतो भवेत् ।
इत्येष निषधो हस्तः कर्म चास्य निबोधत ॥ १४० ॥
यदि बायांहाथ दाहिनीभुजा पर रखा जाए तथा दाहिना हाथ बायीं
भुजा पर, तथा यह दाहिनाहाथ ‘मुष्टि’ हस्त के लक्षण विधिवत् रखता
हो तो उसे ‘निषध’ हस्त जानें ॥ १३९, १४० ॥
एतेन धैर्यम²दगर्वसौष्ठवोत्सुक्यविक्रमाटोपाः ।
अभिमानावष्टम्भ-स्तम्भस्थैर्यादयः कार्याः ॥ १४१ ॥
अब इसकी योजना बतलाता हूँ।
इस हस्तमुद्रा को धैर्य, मद, गर्व, सौष्ठव, औत्सुक्य, पराक्रम, शौर्य,
उद्दण्डता (आरोप), स्वाभिमान, हठ (अवष्टम्भ), स्तम्भ तथा स्थैर्य
आदि भावोंवाले अर्थों में संयोजित किया जाए ॥ १४१ ॥
[ अथवा—
ज्ञेयो वै निषधो नाम हंसपक्षौ पराङ्मुखौ ।
जालवातायनादीनां प्रयोक्तव्योऽभिघट्टने ॥ ]
[ निषध (लक्षणान्तर)—यदि दो विभिन्न दिशाओं में दो हंसपक्ष हस्तों
को रखा जाए तो ‘निषध’ होता है। इसे झरोखा, खिड़की आदि से टक्कर
लगने में संयोजित किया जाए । ]
१. श्लोकद्वयं ग—पुस्तके नास्ति । २. मदगर्वसौष्ठवो—ख०, ग० ।