नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः ६७
स्वस्तिक विप्रयुतिकरणाद् दिशो घनाः खं वनं समुद्राश्च ।
ऋतवो मही तथौघं१ विस्तीर्णं वाभिनेयं स्यात् ॥१३५॥
'स्वस्तिक' का प्रदर्शन कर दोनों हाथों को हटा लेने पर उससे
दिशाएं, आकाश, वन, समुद्र, ऋतुएँ, पृथ्वी, वेग एवं अन्य विस्तीर्ण पदार्थ
प्रदर्शित होते हैं ॥ १३५ ॥
कटका-( खटका- ) वर्धमानक—
कटकः कटकैर्न्यस्तः कट३कावर्धमानकः ।
शृङ्गारार्थेषु योक्तव्यः प्रणामकरणे तथा ॥ १३६ ॥
[ कुमुदोत्पलवृन्तेषु कर्तव्यश्छत्रधारणे४ । ]
यदि दो कटकामुख हस्तों को स्वस्तिक दशा में ( एक दूसरे की कलाई
के ऊपर ) रखा जाए तो क ( ख ) टकावर्धमानक मुद्रा हो जाती है। इसे
शृङ्गार के भावों तथा प्रणाम करने में प्रयुक्त करना चाहिए ॥ १३६ ॥
[ कुमुद, उत्पल एवं कुन्द पुष्पों के तथा शंख के धारण में इसी की
योजना करनी चाहिए ।— ]
उत्संग—
अरालौ तु विपर्यस्तावृत्तानौ वर्धमानकौ ।
उत्सङ्ग इति विज्ञेयः स्पर्शस्य ग्रहणे करः ॥ १३७ ॥
यदि दो अराल हस्त ऊपर की ओर मुंह वाले एवं स्वस्तिकदशा में दोनों
कन्धों पर रखें जाएँ तो 'उत्संग' मुद्रा होजाती है ॥ १३७ ॥
सनिष्पेषकृ७ते चैव रोषामर्षकृतेऽपि च ।
निष्पीडितः पुनश्चैव स्त्रीणामीर्ष्याकृते भवेत् ॥ १३८ ॥
इसके द्वारा अतिशयप्रयत्न से निष्पन्न होनेवाले कार्य, रोष तथा
ईर्ष्या ( अमर्ष ), किसी पदार्थ को दबाना ( निष्पीडित ) तथा स्त्रियों
की ईर्ष्या का अर्थ बतलाया जाता है ॥ १३८ ॥
१ तथान्यत्—ख—ग० । २. चाभिनेयं—ग० ।
३. कटको वर्धमानकः—ख०, ग० । ४. अयं श्लोकः क—पुस्तकेऽधिकः ।
५. वृत्तानावृर्धमानतौ—ग० । ६. कार्यः सिंहावलोकिते—ख० ।
७. सनिष्पेषकरश्चैव—य० । ८. रोषेऽमर्षेऽपि च स्मृतः—ग० ।