नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः ६३
एक दूसरे से मिली हुई तथा सिकुड़ी रहें तो यह 'मुकुल'हस्त कह-
लाता है ॥ ११५ ॥
देवार्चनबलिकरणे पद्मोत्पलमुकुलरूपणे चैव ।
विटचुम्बने च कार्यो विकुत्सिते विप्रकीर्णश्च ॥ ११६ ॥
भोजनहिरण्यगणनामुखसङ्कोचप्रदानशीघ्रेषु ।
मुकुलितकुसुमेषु तथा तज्ज्ञैरेष प्रयोक्तव्यः ॥ ११७ ॥
योजना—इसके द्वारा देवपूजन, बलिप्रदान, कमल तथा कुमुदिनी
की कलियां, विटचुम्बन, तिरस्कार (विकुत्सित), विविधवस्तु (विप्रकीर्ण)
भोजनग्रहण, सुवर्णमुद्राओं की गणना, मुखसंकोच, (वस्तु) प्रदान, शीघ्रता
तथा पुष्पों की कलियां बतलाई जाती हैं ॥ ११६, ११७ ॥
१ऊर्णनाभ—
पद्मकोशस्य हस्तस्य ह्यङ्गुल्यः कुञ्चिता यदा ।
ऊर्णनाभः स विज्ञेयः केशचौर्यग्रहादिषु ॥ ११८ ॥
यदि 'पद्मकोश' हस्त में सारी उंगलियों को सिकुड़ लिया जाए तो
'ऊर्णनाभ' हस्त हो जाता है ॥ ११८ ॥
शिरःकण्डूयने चैव कुष्ठव्याधिनिरूपणे ।
सिंहव्याघ्रेष्वभिनयः प्रस्तरग्रहणे तथा ॥ ११९ ॥
योजना—केशों तथा चोरी गई वस्तु का ग्रहण, सिर खुजलाना,
कुष्ठव्याधि, सिंह, व्याघ्र तथा इसी प्रकार के अन्य हिंसक प्राणीगण, चोरी
गई वस्तु तथा पत्थर के उठाने का इस मुद्रा के द्वारा अर्थ प्रदर्शन
किया जाता है ॥ ११९ ॥
२ताम्रचूड—
मध्यमाङ्गुष्ठसन्दंशो वक्रा चैव प्रदेशिनी ।
शेषे तलस्थे कर्त्तव्ये ताम्रचूलंकरेऽङ्गुली ॥ १२० ॥
१ ऊर्णनाभः (उत्पत्तिकथा) हिरण्यकशिपु के वध के अवसर पर नृसिंह
भगवान ने इसी हस्त का उपयोग किया था तभी से इसका प्रचलन हो गया ।
२. ताम्रचूड (उत्पत्तिकथा) जब तीनों वेद पूर्ण हो गए तो वे ब्रह्मा के
समक्ष उपस्थित होकर उनसे प्रार्थना करने लगे । इस अवसर पर इसी हस्त
का उपयोग किया गया । तभी से इसका प्रचलन हो गया ।
१. अङ्गुल्यः—ग० । २. व्याघ्राद्यभिनयः—ग० ।
३ ताम्रचूडे कराङ्गुली—ख० ।