नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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इस मुद्रा से सिंह, हाथी, गेंडा, घडिताल, मगर, मत्स्य तथा अन्य
हिंसक जन्तुओं का अर्थ प्रदर्शित किया जाता है ॥ १४७ ॥
गजदन्त—
कूर्परांसोच्छ्रितौ हस्तौ यदास्तां सर्पशीर्षकौ ।
गजदन्तः स तु करः कर्म चास्य निबोधत ॥ १४८ ॥
यदि दो सर्पशीर्ष हस्त स्वस्तिक दशा में एक दूसरे स्कन्धों पर रखे
जाएँ तो 'गजदन्त' हस्तमुद्रा हो जाती है ॥ १४८ ॥
एष च वधूवराणामुद्वाहे चातिभार²योगे च ।
स्तम्भ³ग्रहणे च तथा शैलशिलोत्पाटने चैव ॥ १४९ ॥
इससे वर वधू का पाणिग्रहण, अतिभारवहन, स्तम्भग्रहण तथा शैल
एवं पाषाण का उखाड़ना प्रदर्शित किया जाता है ॥ १४९ ॥
अवहित्थ—
शुकतुण्डौ करौ कृत्वा वक्षस्यभिमुखाञ्चितौ ।
शनैरधोमुखाविद्धौ सोऽवहित्थ इति स्मृतः ॥ १५० ॥
यदि दो शुकतुण्डहस्तों को छाती पर नीचे मुंहवाले और लटकते
हुए रखे तो 'अवहित्थ' हस्तमुद्रा हो जाती है ॥ १५० ॥
दौर्बल्ये निःश्वसिते गात्राणां दर्शने तनुत्वे च ।
उत्कण्ठिते च तज्ज्ञैरभिनययोगस्तु कर्त्तव्यः ॥ १५१ ॥
इससे दुर्बलता, निःश्वास, शरीर का सौन्दर्य प्रदर्शन, शरीर का
पतलापन तथा उत्कण्ठा का भाव प्रदर्शित किया जाए ॥ १५१ ॥
वर्धमान—
मुकुलस्तु यदा हस्तः कपित्थपरिवेष्टितः ।
वर्धमानः स विज्ञेयः कर्म चास्य निबोधत ।
जालवातायनादीनां प्रयोक्तव्यो विघाटने ॥ १५२ ॥
यदि मुकुल हस्त को कपित्थ हस्त से लपेटा जाए तो 'वर्धमान' हस्त
मुद्रा होती है । झरोखा तथा खिड़की के खोलने में इसको विनियोजित करे ।
अथवा —
ज्ञेयो वै वर्धमानस्तु हंसपक्षौ पराङ्मुखौ ।
१. कूर्परासञ्चितौ — स० ग० । २. भारयोगेन — ख० ।
३. स्तम्भे ग्रहणे च — ग० ।