नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः ६९
'दोला—
अंसौ प्रशिथिलौ मुक्तौ पताकौ तु१ प्रलम्बितौ ।
यदा भवेतां करणे स दोल इति संज्ञितः ॥ १४२ ॥
यदि दोनों कन्धों को ढीले रखते हुए दोनों पताक हस्तों को हिलाते
हुए रखे तो करण में प्रयुक्त होने वाली यह हस्तमुद्रा ‘दोला’ जानें ॥१४२॥
सम्भ्रमविषादमूर्च्छितमदाभिघाते तथैव चावेगे ।
व्याधिप्लुते च शस्त्रै२क्षते च कार्योंऽभिनययोगः ॥१४३॥
इससे सम्भ्रम, विषाद, मूर्च्छा, नशे के झटके ( मदाभिघात ), आवेग,
व्याधियुक्तता तथा शस्त्रों से आहतदशा का अर्थ सूचित होता है ॥१४३॥
पुष्पपुट—
यस्तु सर्पशिराः प्रोक्तस्तस्याङ्गुलिनिरन्तरः ।
द्वितीयः पार्श्वसंश्लिष्टः३ स तु पुष्पपुटः स्मृतः ॥ १४४ ॥
दो सर्पशीर्ष हस्तों की अंगुलियों को सटाकर दोनों हाथों को एक
दूसरे से सटा देने पर 'पुष्पपुट' मुद्रा हो जाती है ॥ १४४ ॥
४धान्यफलपुष्पसदृशाम्यनेन नानाविधानि युक्तानि ।
ग्राह्याण्युपनेयानि च तोयानयनापनयने च ॥१४५॥
इससे धान्य, फल तथा पुष्प तथा अन्य इसी के सदृश वस्तुओं का
ग्रहण तथा अर्पण और जल का लाना तथा हटाना सूचित
होता है ॥ १४५ ॥
मकर—
पताकौ तु यदा हस्तौ५वूर्ध्वाङ्गुष्ठावधोमुखौ ।
उपर्युपरि विन्यस्तौ तर्दा६सौ मकरः स्मृतः ॥ १४६ ॥
यदि दो पताक हस्तों को (अंगूठा उठाते हुए) फैला कर एक दूसरे
पर रख दिया जाए तो 'मकर' नामक हस्तमुद्रा हो जाती है ॥ १४६ ॥
सिंहव्यालद्वीपि७प्रदर्शनं नक्रमकरमत्स्यानाम् ।
ये चान्ये क्रव्यादा ८अभिनेयास्तेऽर्थयोगेन ॥ १४७ ॥
१. प्रविलम्बितौ—ग०। २. शत्रुक्षते—ग। ३. सुश्लिष्टः—ग०।
४. धान्यजलपुष्पभक्ष्याण्यनेक नानाविधानि युक्तेन—ग०।
५. हस्तौ मूर्धाङ्गुष्ठा—ग०। ६. तदा स—ग०।
७. सिंहव्यालद्विपददर्श—ग०। ८. ह्यभिनेयास्तेन हस्तेन—ग०।