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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 668 में से

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पृष्ठ 176

नवमोऽध्यायः ६५
हे मुनियो इस प्रकार मैंने इन असंयुतहस्तों को बतलाया, अब मैं
संयुत हस्तों को बतलाता हूँ जिन्हें आप समझ लीजिए ॥ १२५ ॥
१संयुतहस्तमुद्राएं (लक्षण तथा योजना)
अंजलि—
पताकाभ्यान्तु हस्ताभ्यां संश्लेषादञ्जलिः स्मृतः ।
देवतानां गुरूणाञ्च मित्राणाञ्चाभिवादने ॥ १२६ ॥
दो पताक हस्तों को मिलाने से 'अंजलि' हस्तमुद्रा होजाती है। इसे
देवता, गुरुजन तथा मित्रों के अभिवादन में प्रयुक्त किया जाता है ॥१२६॥
स्थानान्यस्य पुनस्त्रीणि वक्षो वक्त्रं शिरस्तथा ।
देवतानां शिरस्थस्तु गुरूणामास्य संस्थितः ॥ १२७ ॥
वक्षःस्थश्चैव मित्राणां१ शेषे२ त्वनियमो भवेत् । ॥ १२८ ॥
अभिवादन के तीन स्थान हैं—वक्षःस्थल, मुख तथा मस्तक (शिर) ।
इनमें देवताओं को शिरस्थ नमस्कार, गुरुजन को मुख के सम्मुख तथा
मित्रों को वक्षःस्थल के बराबर हाथ रखते हुए नमस्कार करना चाहिए।
शेष व्यक्तियों के अभिवादन के लिए कोई नियत प्रदेश नहीं होते हैं। स्त्रियों
(का बिना नियम के नमस्कार होता है पाठा० से अर्थ) ॥ १२७, १२८ ॥
कपोत—
उभाभ्यामपि हस्ताभ्यामन्योन्यं पार्श्वसङ्ग्रहात् ।
हस्तः कपोतको नाम कर्म चास्य निबोधत ॥ १२९ ॥
दो (सर्पशीर्ष) हस्तों को परस्पर दोनों कोनों से मिलाने पर 'कपोत'
मुद्रा होती है। अब इनकी योजना सुनिये ॥ १२९ ॥
एष३ विनयाभ्युपगमे प्रणामकरणे गुरोश्च सम्भाषे ।
शीते भये च कार्यो वक्षस्थः कम्पितः४ स्त्रीभिः ॥ १३० ॥
१. असंयुत तथा संयुतहस्तमुद्राएं—ये हस्तमुद्राएं सामान्यतः हाथ से
पृथक्-पृथक् उपयोग में आती हैं परन्तु कभी कभी दोनों हाथों द्वारा एक साथ
भी असंयुत हस्तों का प्रदर्शन होता है। (परन्तु ये कहलाएंगे असंयुत-हस्त ही)
जब दोनों हाथों को मिला कर लक्षणानुसार प्रदर्शित किया जाए तभी संयुत
हस्त होगें। इनकी उपयोगिता के विषय में अधिक विवेचन के लिए भूमिका
तथा परिशिष्ट भी देखिये।
१. विप्राणां—क० । २. स्त्रीणामानियतो भवेत्—क० ।
३ द्विषद्धियाभ्युपगमे—ग० । ४. कल्पितः—ग० ।
५ ना० शा० द्वि०