सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 668 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 175

६४ नाट्यशास्त्रम्
यदि मध्यमा उंगली तथा अंगूठा मिला हुआ हो, उंगली सिकुड़ी हुई
तथा शेष (दो) उंगलियां हथेली पर हों तो 'ताम्रचूड' हस्त हो
जाता है ॥ १२० ॥
विच्युतंश्च⁴ सशब्दश्च कार्यो निर्भर्त्सनादिषु ।
ताले⁵ विश्वासने चैव शीघ्रार्थे संज्ञितेषु च ॥ १२१ ॥
योजना—झिड़कने के साथ शब्दकर नीचे झुकाते हुए डाँटने
(विच्युति), ताल का अन्त, विश्वास-दान, शीघ्रता तथा इशारा देने
में इस मुद्रा का प्रयोग किया जाए ॥ १२१ ॥
तथा कलासु काष्ठासु निमेषे तु क्षणे तथा ।
एष एव करः कार्यो बालालापानिमन्त्रणे ॥ १२२ ॥
तथा इसी मुद्रा की कालगणना के भागों-जैसे कला, काष्ठा, निमेष
तथा क्षण के बतलाने, युवती बाला से सम्भाषण तथा उसे आमन्त्रण देने
में भी योजना करनी चाहिए ॥ १२२ ॥
ताम्रचूडमुद्रा का अन्यलक्षण:—
अथवा—
अङ्गुल्यस्संयुता¹ वक्रा उपर्यङ्गुष्ठपीडिताः ।
प्रसारिताैककनिष्ठा² च ताम्रचूडकरः³ स्मृतः ॥ १२३ ॥
यदि हाथ की उंगलियां एक दूसरे से मिली हुई हों तथा टेढ़ी रहें,
ये ऊपर अंगूठे से दबाई जाएं तथा कनिष्ठिकाउंगली फैली हो तो भी
'ताम्रचूड़' हस्त कहलाता है ॥ १२३ ॥
शतं सहस्रं लक्षञ्च कनकञ्चापि⁴ दर्शयेत् ।
क्षिप्रमुक्ताङ्गुलीभिस्तु स्फुलिङ्गान् विप्रुषस्तथा ॥ १२४ ॥
इसके द्वारा सौ, हजार तथा लाख की संख्याएं तथा स्वर्णमुद्राएं बतलाई
जाती हैं । यदि इसी मुद्रा में उंगलियों को शीघ्रतापूर्वक कम्पित किया
जाए तो उससे चिनगारियां तथा बूंदें बतलाई जाती हैं ॥ १२४ ॥
असंयुता करा ह्येते मया प्रोक्ता द्विजोत्तमाः ।
अतश्च⁵ संयुतान् हस्तान् गदतो मे निबोधत ॥ १२५ ॥
४. व्युत्पन्नश्च—ग० । ५. तालेष्विध्वसिते चैव--ख० ।
१. अङ्गुल्यः सहिता—ग । २. प्रसारिता कनिष्ठा च—ग० ।
३. ताम्रचूडः करः—ग० । ४. करेणैकेन योजयेत्—ग० ।
५. अधुना—ख० पुनश्च—ग० ।