नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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यदि मध्यमा उंगली तथा अंगूठा मिला हुआ हो, उंगली सिकुड़ी हुई
तथा शेष (दो) उंगलियां हथेली पर हों तो 'ताम्रचूड' हस्त हो
जाता है ॥ १२० ॥
विच्युतंश्च⁴ सशब्दश्च कार्यो निर्भर्त्सनादिषु ।
ताले⁵ विश्वासने चैव शीघ्रार्थे संज्ञितेषु च ॥ १२१ ॥
योजना—झिड़कने के साथ शब्दकर नीचे झुकाते हुए डाँटने
(विच्युति), ताल का अन्त, विश्वास-दान, शीघ्रता तथा इशारा देने
में इस मुद्रा का प्रयोग किया जाए ॥ १२१ ॥
तथा कलासु काष्ठासु निमेषे तु क्षणे तथा ।
एष एव करः कार्यो बालालापानिमन्त्रणे ॥ १२२ ॥
तथा इसी मुद्रा की कालगणना के भागों-जैसे कला, काष्ठा, निमेष
तथा क्षण के बतलाने, युवती बाला से सम्भाषण तथा उसे आमन्त्रण देने
में भी योजना करनी चाहिए ॥ १२२ ॥
ताम्रचूडमुद्रा का अन्यलक्षण:—
अथवा—
अङ्गुल्यस्संयुता¹ वक्रा उपर्यङ्गुष्ठपीडिताः ।
प्रसारिताैककनिष्ठा² च ताम्रचूडकरः³ स्मृतः ॥ १२३ ॥
यदि हाथ की उंगलियां एक दूसरे से मिली हुई हों तथा टेढ़ी रहें,
ये ऊपर अंगूठे से दबाई जाएं तथा कनिष्ठिकाउंगली फैली हो तो भी
'ताम्रचूड़' हस्त कहलाता है ॥ १२३ ॥
शतं सहस्रं लक्षञ्च कनकञ्चापि⁴ दर्शयेत् ।
क्षिप्रमुक्ताङ्गुलीभिस्तु स्फुलिङ्गान् विप्रुषस्तथा ॥ १२४ ॥
इसके द्वारा सौ, हजार तथा लाख की संख्याएं तथा स्वर्णमुद्राएं बतलाई
जाती हैं । यदि इसी मुद्रा में उंगलियों को शीघ्रतापूर्वक कम्पित किया
जाए तो उससे चिनगारियां तथा बूंदें बतलाई जाती हैं ॥ १२४ ॥
असंयुता करा ह्येते मया प्रोक्ता द्विजोत्तमाः ।
अतश्च⁵ संयुतान् हस्तान् गदतो मे निबोधत ॥ १२५ ॥
४. व्युत्पन्नश्च—ग० । ५. तालेष्विध्वसिते चैव--ख० ।
१. अङ्गुल्यः सहिता—ग । २. प्रसारिता कनिष्ठा च—ग० ।
३. ताम्रचूडः करः—ग० । ४. करेणैकेन योजयेत्—ग० ।
५. अधुना—ख० पुनश्च—ग० ।