नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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योजना:—इसे विनम्रता आदि सौजन्यपूर्ण भाव के प्रदर्शन पूज्यजन
को प्रणाम करने तथा उनसे संभाषण में प्रयुक्त किया जाता है । शीत तथा
भय के अर्थ को प्रदर्शन करने में स्त्रियों के द्वारा इस मुद्रा को वक्षस्थल
पर स्थित रखना चाहिए ॥ १३० ॥
अयमेवाङ्गुलिपरिघृष्यमाणमुक्तस्तु खिन्नवाक्येषु ।
एतावदिति च कार्यो १नेदानीं कृत्यमिति चार्थे ॥ १३१ ॥
तथा यही दोनों हाथों की उंगलियों को परस्पर मिलाकर हटा लेने
पर खिन्न वचनों, 'इतना करना' तथा 'यह अभी नहीं करना' के अर्थों को
बतलाता है ॥ १३१ ॥
कर्कट—
अङ्गुल्यो यस्य हस्तस्य ह्यन्योन्यान्तरनिस्सृताः ।
स कर्कट इति ज्ञेयः करः कर्म च वक्ष्यते ॥ १३२ ॥
यदि दोनों हाथों की उंगलियां मिलकर एक दूसरे के बीच से निकली
हुई रहें तो 'कर्कट' मुद्रा होती है। अब इसकी योजना सुनिये ॥ १३२ ॥
एष मदनाङ्गमर्दे सुप्तोत्थिते२ऽजृम्भणे बृहद्देहे ।
हनुधारणे च योज्यः शङ्खग्रहणेऽर्थतँत्वज्ञैः ॥ १३३ ॥
इसके द्वारा काम के मद में अंग मरोड़ना (मर्दनांगमर्दे), सोकर
उठते समय जंभाई लेना, विशाल शरीर, ठुड्डी को हाथ से सहारा देने
(हनुधारणे) तथा शंख का ग्रहण करना बतलाया जाता है ॥ १३३ ॥
स्वस्तिक—
मणिवन्धनविन्यस्तावरालौ स्त्रीप्रयोजितौ ।
उत्तानौ वामपार्श्वस्थौ स्वस्तिकः परिकीर्तित ॥ १३४ ॥
दो अराल हस्तों को कलाई पर सामने की ओर से ऊपर मुँह रखते
हुए बायीं बाजू की ओर रख देने पर 'स्वस्तिक' मुद्रा जानों । इसे स्त्रियाँ
प्रयुक्त करें ॥ १३४ ॥
१. मदनांगमर्दे का यहाँ श्री मन० मो० घोष ने (शहद के छत्ते या मोम
को दिखलाना, bees wax) अर्थ किया है जो असंगत है ।
१. भेदाङ्गीकृत्यमिति चार्थे—ख० ।
२. सुप्तोत्थविजृम्भणे—ग० । ३. अनुधारणे—ख० ।
४. च तत्वज्ञैः—ग० । ५. वर्धमानकौ—ग० ।