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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

५० नाट्यशास्त्रम्
शिखरे—
अस्यैव च यदा मुष्टेरूर्ध्वोऽङ्गुष्ठः प्रयुज्यते ।
हस्तः स शिखरो नाम तदा ज्ञेयः प्रयोक्तृभिः ॥ ५६ ॥
यदि मुष्टि हस्त में अंगूठे को ऊपर सीधा उठा लिया जाए तो 'शिखर'
मुद्रा कहलाती है ॥ ५६ ॥
रश्मिकुशाङ्कुशधनुषां तोमरशक्तिप्रमोक्षणे चैव ।
अधरोष्ठपादरञ्जनमलके²भ्योत्क्षेपणे चैव ॥ ५७ ॥
योजना—( धनुष की ) डोरी, दर्भ, अंकुश, धनुष इत्यादि धारण करने,
शक्ति और तोमर अस्त्र को छोड़ने, ओष्ठ ( अधरोष्ठ ) तथा पैरों को रंगने
तथा बालों को झाड़ने ( या कंघा करने ) का इस मुद्रा द्वारा अर्थ सूचित
होता है ॥ ५७ ॥
कपित्थे—
अस्यैव शिखराख्यस्य पृष्ठे³ङ्गुष्ठकनिपीडिता ।
यदा⁴ प्रदेशिनी वक्रा स कपित्थस्तदा स्मृतः ॥ ५८ ॥
यदि शिखर हस्त में तर्जनी अंगुली को झुका कर अंगूठे पर दबा कर
रख दी ( मिला दी ) जाए तो 'कपित्थ' मुद्रा कहलाती है ॥ ५८ ॥
असिचापचक्रतोमरकुन्तगदाशक्तिवज्रबाणानि ।
शस्त्राण्यभिनेयानि तु कार्यं पथ्यञ्च सत्यञ्च ॥ ५९ ॥
योजना—तलवार, धनुष, चक्र, तोमर, कुन्त ( भाला ), गदा, शक्ति,
वज्र तथा बाण को छोड़ने और सत्य तथा हितकर ( पथ्य ) कार्य करने
का अर्थ इस मुद्रा के द्वारा सूचित होता है ॥ ५९ ॥

१. शिखर (उत्पत्ति कथा) चन्द्रशेखर शिव द्वारा सुमेरुपर्वत को समुद्रमन्थन के
लिए उखाड़ने में इसी हस्त का उपयोग किया था तभी से इसका प्रचलन हो गया ।
२. कपित्थ ( उत्पत्ति कथा ) समुद्रमन्थन के अवसर पर विष्णु के द्वारा
मन्दारवृक्ष को खींचकर निकालने में इसी हस्त का उपयोग किया गया था ।
तभी से इसका प्रचलन हुआ ।

१. प्रमोक्षणाञ्चैव--ख० ग० ।
२. अलक्तकोत्पीडने चैव--क० । ३. मुखेऽङ्गुष्ठनिपीडिता--ख० ।
४. प्रदेशिनी च वक्रा स्यादिति हस्तः कपित्थकः--क० ।

नवमोऽध्यायः ५१
कटकामुखः—
उत्क्षिप्तवक्रा तु यदानामिका सकनीयसी ।
अस्यैव तु कपित्थस्य तदासौ क(ख)टकामुखः ॥ ६० ॥
यदि कपित्थ हस्त मुद्रा में अनामिका तथा कनिष्ठिका अंगुलियों को
(ऊपर) उठाकर मोड़ा जाए तो 'कटकामुख' मुद्रा कहलाती है ॥ ६० ॥
होत्रं हव्यं छत्रं प्रग्रहपरिकर्षणं व्यजनञ्च ।
आदर्शधारणं खण्डनं तथा पेषणञ्चैव ॥ ६१ ॥
आयतदण्डग्रहणं मुक्ताप्रालम्बसङ्ग्रहश्चैव ।
²स्रग्दामपुष्पमाल(वस्त्रान्तालम्बनञ्चैव ॥ ६२ ॥
³मन्थनशराकर्षणपुष्पाव⁴चयप्रतोदकार्याणि ।
अङ्कुश-रज्ज्वाकर्षण-स्त्रीदर्शनमेव कार्यञ्च ॥ ६३ ॥
योजना—होत्र (होम) हुतद्रव्य, छत्र, रास का खींचना (प्रग्रह-परि-
कर्षण), पंखा, दर्पण धारण, तोडना (पंखों का), पीसना, लम्बे दण्ड-
काष्ठ का ग्रहण, मौक्तिक माला का (मुक्ताप्रालम्ब) सम्हालना, पुष्पमाला
(तथा अन्य मालाओं) का धारण, वस्त्र का कोना थाम लेना (खींचना-
वस्त्रान्तालम्बनम्), मथनी एवं बाण खींचना, पुष्प तोड़ना, चाबुक लगाना,
अंकुश लगाना, रस्सी खींचना तथा स्त्री-चेष्टाओं का दर्शन इस मुद्रा के
द्वारा सूचित किया जाता है ॥ ६१-६३ ॥
⁵सूचीमुखः—
कटकाँख्ये यदा हस्ते तर्जनी सम्प्रसारिता ।
हस्तस्सूचीमुखो नाम तदा ज्ञेयः प्रयोक्तृभिः ॥ ६४ ॥

१. कटका मुख (उत्पत्तिकथा) गुह (कार्तिकेय) ने भगवान शिव से शस्त्र
विद्या ग्रहण करने के अवसर पर इसी हस्त का प्रयोग किया था। तभी से
इसका प्रचलन हो गया।
२. सूचीमुखः (उत्पत्तिकथा) ब्रह्मा ने 'एकोऽहं' को समझाने के लिए इसी
हस्त का प्रयोग किया था। तभी से इसका प्रचलन हुआ।

१. प्रग्रहपरिकर्षणञ्च व्यञ्जनकम्—ख० ।
२. स्रग्दामधारणं खलु वस्त्रा—ख० । ३. मन्थनशरावकर्षण—क, ग।
४. पुष्पापचय—क० । ५. खटका—क० ख० ।

५२ नाट्यशास्त्रम्
यदि कटकामुख-मुद्रावाले हाथ की तर्जनी अंगुली फैला दी जाए तो
'सूचीमुख' मुद्रा कहलाती है ॥ ६४ ॥
अस्यों विविधान् योगान् वक्ष्यामि समासतः प्रदेशिन्याः ।
ऊर्ध्व-नत-लोल-कम्पित-विजृम्भितोद्वाहित-चलायाः ॥६५॥
अब मैं संक्षेप से प्रदेशिनी ( तर्जनी ) अंगुली के ऊर्ध्व, नत, लोल
( एक ओर झुकने ), कम्पित ( हिलने ), विजृम्भित ( सिकुड़कर फैलने ),
ऊपर तथा नीचे उठने ( उद्वाहित ) तथा ऊपर की ओर घूमने ( चलने )
की दशा के भेद से इस मुद्रा में होने वाले कार्य बतलाता हूँ ॥ ६५ ॥
चक्रं तटित्पताकामञ्जर्यः कर्णचूलिकाश्चैव ।
कुटिलगतयश्च सर्वे निर्देश्यास्साधुवादाश्च ॥ ६६ ॥
बालोरगपल्लवधूपदीपवल्ली-लताशिखण्डाश्च ।
परिपतनवक्रमण्डलमभिनेयोऽन्यूर्ध्वलोलितया ॥ ६७ ॥
इस मुद्रा में यदि तर्जनी को ऊपर की ओर उठाकर घुमाया जाये तो
इससे चक्र, बिजली, पताका, पुष्पमंजरी, कर्णपूर ( कर्णचूलिका ) सभी प्रकार
की तिरछी रेखाएं ( कुटिलगति ), साधुवाद की ध्वनियां, बाल सर्प,
[

नवमोऽध्यायः ५३
तो इससे दाढ़वाले प्राणीजन का, यदि इसी अंगुली को गोल घुमाया जाए
तो उससे ( किसी व्यक्ति द्वारा ) सभी वस्तु का ग्रहण करना, यदि
झुका कर फिर इसी अंगुली को ऊपर उठाली जाए तो इससे दीर्घअभ्यास
तथा दिवस का तथा यदि यही मुंह के समीप ले जाकर मोड़ी तथा ऊपर
नीचे लेजाई जाए तो उससे वाक्यों का अर्थ बोध प्रदर्शित किया जाता
है ॥ ६८-७० ॥
मेति¹ वदेति च योज्या प्रसारितोत्कम्पितोत्ताना ।
कार्या प्रकम्पिता रोषदर्शने स्वेद²रूपणे चैव ॥ ७१ ॥
इसी प्रकार यदि निषेध एवं सम्भाषण का अर्थ प्रदर्शित करना होतो
इस मुद्रा में तर्जनी उंगली को फैलाकर हिलाते हुए ऊपर की ओर उठा
लेना चाहिए ॥ ७१ ॥
कुन्तल³कुण्डलाङ्गदगण्डाश्रयं⁴संश्रयेऽभिनये ।
गर्वेऽहमिति ललाटे रिपुनिर्देशे तथैव च क्रोधे ॥ ७२ ॥
इसी मुद्रा को यदि कम्पित रखा जाए तो उससे क्रोध, स्वेद, केश (कुन्तल),
कुण्डल, अङ्गद तथा गण्डस्थल का सजाना बतलाया जाता है तथा ललाट
पर रखने से गर्व क्रोध तथा शत्रु का निर्देश सूचित होता है ॥ ७२ ॥
कोऽसाविति निर्देशे⁵ च कर्णकण्डूयने चैव ।
संयुक्ता संयोगे कार्या विश्लेषिता वियोगे च ॥ ७३ ॥
कलहे स्वस्तिकयुक्ता परस्परोत्पीडिता बन्धे ।
द्वाभ्यान्तु वाम⁶पार्श्वे दक्षिणतो दिननिशावसानानि ॥ ७४ ॥
अभिमुखपराङ्मुखीभ्यां विश्लिष्टाभ्यां प्रयुञ्जीत ।
इसी मुद्रा से कौन हैं ? इस प्रश्न को करने तथा कानों के खुजलाने
का अर्थ सूचित करना हो तो ललाट प्रदेश के समीप तर्जनी को रखना
चाहिए । दोनों हाथों को सूचीमुख मुद्रा में मिलाने से संयोग तथा हटा
लेने पर वियोग सूचित होता है । यदि दोनों हाथों को 'स्वस्तिक' कर ले
तो उससे पारस्परिक कलह तथा दोनों सूचीमुख हाथ एक दूसरे के सम्मुख
रखकर फिर बायीं ओर ( अलग ) ले जाए तो उससे रात्रि की समाप्ति
( शयन से उठना ) सूचित होती है ॥ ७३-७४ ॥
[

५४ नाट्यशास्त्रम्
द्वाभ्यां प्रदर्शयेन्नित्यं सम्पूर्णं चन्द्रमण्डलम् ।
श्लिष्टा ललाटे शक्रस्य कार्या ह्युत्तानसंश्रया ॥ ७५ ॥
यदि दो सूचीमुख हस्त हों तो उससे सम्पूर्ण चन्द्रमण्डल का तथा
यदि ललाट के समीप खड़ी स्थित हो तो उससे इन्द्र का उत्कर्ष बतलाया
जाता है ॥ ७५ ॥
पुनरपि च भ्रमिताग्रा रूपशिलावर्तयन्त्रशैलेषु ।
परिवेषणे तथैव हि कार्या चाधोमुखी नित्यम् ॥ ७६ ॥
यदि सूचीमुख हस्त को गोल घुमाव दे दिया जाए तो इससे स्वरूप,
शिला, भँवर ( आवर्त्त ), यन्त्र तथा शैल ( शिखर ) बतलाए जाते हैं, यदि
इसी मुद्रा में हाथों को नीचे मुँह किये रखा जाए तो उससे भोजन
परोसना प्रदर्शित होता है ॥ ७७ ॥
श्लिष्टा ललाटपट्टेष्बधोमुखी शम्भु³रूपणे कार्या ।
शक्रस्याप्युत्ताना तज्ज्ञैस्तिर्यक्स्थिता कार्या ॥ ७७ ॥
यदि ललाट के पास नीचा मुँह रखते हुए इसी मुद्रावाले हाथ को रखा
जाए तो उससे 'शिव' का ( त्रिनेत्र- ) स्वरूप तथा यदि ऊपर की ओर मुँह
रखकर तिरछा कर लिया जाए तो 'इन्द्र' का ( सहस्र नेत्रोंवाला ) स्वरूप
प्रदर्शित हो जाता है ॥ ७७ ॥
'पद्मकोषः—
यस्याङ्गुल्यस्तु विरलाः सहाङ्गुष्ठेन कुञ्चिताः ।
ऊर्ध्वा ह्यसङ्गताग्राश्च स भवेत् पद्मकोषकः ॥ ७८ ॥
यदि अंगूठे सहित सभी उंगलियां ऊपर की ओर मुँह वाली अलग-
अलग तथा सिकुड़ी हुई रखी जाए तो 'पद्मकोष' हस्त हो जाता है ॥७८॥
बिल्वकपित्थफलानां ग्रहणं कुचदर्शनञ्च नारीणाम् ।
ग्रहणे ह्यामिषलाभे भवन्ति ताः कुञ्चिताग्रास्तु ॥७९॥
[ बहुजातिबीजपूरकमामिषखण्डञ्च निर्देिश्यम् । ]
१. पद्मकोषः ( उत्पत्ति कथा ) भगवान विष्णु¹ने सुदर्शन चक्र की प्राप्ति के
लिए भगवान शिव की स्तुति तथा पद्म पुष्पों के अर्पण हेतु इसी हस्त का
उपयोग किया । तभी से इसका प्रचलन हुआ ।
१. द्वाभ्यां सन्दश्ये—ख० ग० । २. चाधोमुखी नित्या—ख० ग० ।
३. शम्भुरूपेण—ग० । ४. शक्रस्याभ्युत्थानात्—ख० ग० ।

नवमोऽध्यायः ५५
योजना—इसके द्वारा बिल्व तथा कैथा ( कपित्थ ) फल तथा स्त्रियों
के उरोजों का अर्थ सूचित होता है । यदि इन अंगुलियों के अग्रभाग
सिकुड़े हुए रखे जाए तो ( इससे ) ( किसी वस्तु के ) ग्रहण तथा मांस
की प्राप्ति तथा अनेकविध फल, ( बिल्व तथा कपित्थ के अतिरिक्त )
बीजपूर ( बिजौरा ) तथा मांसखण्ड की सूचना दी जाती है ॥ ७९ ॥
देवार्चनबलिहरणे समुद्गके साग्रपिण्डदाने च ।
कार्यः पुष्पप्रकरश्च पद्मकोशेन हस्तेन ॥ ८० ॥
इस पद्मकोश मुद्रा के द्वारा देवार्चन, बलिप्रदान, डलिया (समुद्गक), प्रथम
पिण्ड प्रदान तथा पुष्पों का विकीर्ण करना प्रदर्शित किया जाता है ॥ ८० ॥
मणिबन्धनश्लिष्टप्रविरलचलिताङ्गुलिकराभ्याम् ।
कार्यो विवर्त्तिताभ्यां विकसितकमलोत्पलाभिनयः ॥८१॥
यदि पद्मकोष मुद्रावाले दोनों हाथों को कलाई से मिलाते हुए
पीछे की ओर ले जाए तथा अंगुलियों की हिलती हुई रखे तो उससे
विकसितकमल तथा कुमुदिनी का अर्थ प्रदर्शित होता है ॥ ८१ ॥
'सर्पशीर्ष—
अङ्गुल्यस्संहतास्सर्वाः सहाङ्गुष्ठेन यस्य तु ।
तथा निम्नतलश्चैव स तु सर्पशिराः करः ॥ ८२ ॥
यदि सभी अंगुलियां अंगूठे सहित एक दूसरे से मिली हुई हों और
हथेली झुकी ( या गहरी ) रखी जाए तो ( सर्प के फन के समान हो
जाने के कारण ) सर्पशीर्ष हस्त बन जाता है ॥ ८२ ॥
एष सलिलप्रदाने भुजगगतौ तोयसेचने चैव ।
आस्फोटने च योज्यः करिकुम्भास्फालनाद्येषु ॥ ८३ ॥
योजना—पितरों को जलांजलि देने, सर्पगति, जल सिंचन, मल्लयुद्ध
१. सर्पशीर्ष ( उत्पत्तिकथा ) भगवान विष्णु ने वामन अवतार में बलि
को बन्धन तथा देवगण की रक्षार्थ वचन देते हुए उन कार्यों का इसी हस्त द्वारा
संकेत किया था । तभी से इस मुद्रा का प्रचलन हुआ ।
१. सङ्ग्रहे चात्र—ग० ।
२. मणिबन्धनश्लिष्टाभ्याम विरलचलिताङ्गुलीयुतकराभ्याम्—ख० ग० ।
३. कार्योपवर्तिताभ्यां—ख-ग० । ४. सहिताः—ग० ।
५. सर्वशिराः—ख० ग० ।

५६ नाट्यशास्त्रम्
में जंघा तथा भुजाओं के ठोकने और हाथी के कुम्भस्थल को थपथपाने
का इस मुद्रा से प्रदर्शन किया जाता है ॥ ८३ ॥
१मृगशीर्ष—
अधोमुखीनां सर्वासामङ्गुलीनां समागमः ।
कनिष्ठाङ्गुष्ठकावूर्ध्वौ स भवेन्मृगशीर्षकः ॥ ८४ ॥
यदि कनिष्ठिका अंगुली तथा अंगूठे को सीधा और शेष अंगुलियाँ
झुके हुए मुंह वाली रखी जाएँ तो 'मृगशीर्ष' हस्त होता है ॥ ८४ ॥
इह साम्प्रतमस्त्यद्य च शक्ते१श्चोल्लासनेऽक्षपाते च ।
स्वेदापमार्जनेषु च कुट्टमिते प्रचलितं२स्तु भवेत् ॥८५॥
योजना—इसके द्वारा यहां, अभी, यह है, आज जैसे अर्थ का सूचन,
शक्ति के उठाने तथा पासों के फेंकने को प्रदर्शित करते हैं । यदि इसी मुद्रा
में हाथ धूजता हुए रखा जाए तो उससे पसीने का पोंछना तथा स्त्रियों
की कुट्टमित चेष्टा को बतलाया जाता है ॥ ८५ ॥
२कंगुल—
त्रेताग्निसंस्थिता मध्यात्तर्जन्यङ्गुष्ठका यदा ।
काँ३ङ्गुलेऽनामिका वक्रा तथा चोर्ध्वा कनीयसी ॥ ८६ ॥
यदि मध्या, तर्जनी तथा अंगूठे पृथक्-पृथक् रहें, अनामिका उंगली
टेढ़ी तथा कनिष्ठिका खड़ी रहे तो 'कंगुल' हस्त मुद्रा होती है ॥ ८६ ॥
एतेन तरुणफलरूपाणानि नानाविधानि च ल४घूनि ।
कार्याणि रोषजानि स्त्रीवचनान्यङ्गुलिक्षेपैः ॥८७॥
१. मृगशीर्ष ( उत्पत्तिकथा ) भगवान शिव की प्राप्ति के लिए पार्वती ने
तपस्या करते हुए अपने ललाट पर तीन चन्दन-रेखाओं का त्रिपुण्ड्र इसी हस्त
द्वारा धारण किया । तभी से इसका प्रचलन हुआ ।
२. कंगुल ( उत्पत्तिकथा ) भगवान शिव ने क्षीरसागरमन्थन के अवसर
पर उसमें से निकले हुए कालकूट विष की गुटिका बनाकर पीने के लिए इसी
हस्त का उपयोग किया था । तभी से इसका प्रचलन हुआ ।
१. शक्यश्चेञ्चालने—ख० ग० । २. प्रचलिते तु—ख० ग० ।
३. अङ्गुले—ख० ग० । ४. लघूनि कार्याणि—ग० ।
५. रोषजातिस्त्री—ग० ।

नवमोऽध्यायः ५७
योजना—इसके द्वारा अनेकविध छोटे-छोटे (सुपारी, बेर इत्यादि)
फलों तथा स्त्रियों के रोषपूर्णवचनों को अंगुली के आक्षेप (घुमाने) के द्वारा
प्रदर्शित किया जाता है ॥ ८७ ॥
[ मरकतवैडूर्यादेः प्रदर्शनं सुमनसाञ्च कर्तव्यम् ।
ग्राह्यं विडालपदमिति तज्ज्ञैरेवं प्रयोगेषु ॥ ]
(प्रक्षिप्त—मरकत वैडूर्य आदि मणि, पुष्पों का ग्रहण तथा बिल्ली का
बैठने आदि का स्थान भी इसी के द्वारा प्रदर्शित किया जाए ।)
१अलपल्लव (अलपद्मक)
आवर्तिताः२ करतले यस्याङ्गुल्यो भवन्ति हि ।
पार्श्वगत-विकीर्णाश्च स भवेदल३पल्लवः ॥ ८८ ॥
यदि सारी अंगुलियां हथेली में गोल आकार में सिकुड़ी हुई तथा
बिखरी हुई रखी जाए तो 'अलपल्लव' मुद्रा कहलाती है ॥ ८८ ॥
प्रतिषेधकृते योज्यः कस्य त्वं नास्ति शून्यवचनेषु ।
पुनरात्मोपन्यासः स्त्रीणामेतेन कर्त्तव्यः ॥८९॥
योजना—इसके द्वारा प्रतिषेध, 'तुम कौन हो' जैसे प्रश्नवाक्य, नहीं
हैं, शून्यवचन (मिथ्याधिक्षेप-जैसे मूर्ख, इत्यादिवचन) तथा स्त्रियों के अहम्
का आपादन (स्थापना) या विस्मय का प्रदर्शन किया जाए ॥ ८९ ॥
२चतुर—
तिस्रः प्रसारिता यत्र तथा चोर्ध्वा कनीयसी ।
तासां मध्ये स्थितो४ऽङ्गुष्ठः स करश्चतुरः स्मृतः ॥ ९० ॥
जिसमें तीनों उंगुलियों को सामने फैलाकर तथा कनिष्ठिका को सीधा
१. अलपल्लव (उत्पत्तिकथा) भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा माखन-चोरी करते
समय इसी हस्त का उपयोग करने पर इसका प्रचलन हो गया ।
२. चतुर (उत्पत्तिकथा) काश्यप ऋषि ने इस हस्त का उपयोग अमृत
लाने के लिए जाने वाले गरुड़ को मार्ग-दर्शन करने के अवसर पर किया था ।
तभी से इसका प्रचलन हुआ ।
१. मरकतवैडूर्यादीनां निदर्शनं कार्यम्—ख० ग० ।
२. आवर्तिन्यः—ख० ग० । ३. दलपद्मकः—ग० ।
४. मध्यस्तथाङ्गुष्ठः—ग० ।

५८ नाट्यशास्त्रम्
उठाया जाय और उनके मूल में अंगूठे को रखे तो ‘चतुर’ हस्त
हो जाता है ॥ ९० ॥
नयं¹विनयनियमसुनिपुणबालातुरसत्त्वकैतवार्थेषु ।
वाक्ये युक्ते पथ्ये सत्ये प्रशमे च विनियोज्यः ॥९१॥
योजना:—नीति, विनय, नियम-चातुर्य ( सुनिपुण ), बाला (कन्या),
रोगी, बल ( सत्त्व ) कैतवयुक्त प्रयोजन या बात एवं पथ्यवचन, सत्य तथा
प्रशम का अर्थ इस हस्तमुद्रा के द्वारा बतलाया जाता है ॥ ९१ ॥
एकेन द्वाभ्यां वा किञ्चिन्मण्डलकृतेन हस्तेन³।
विवृत⁴विचारितचरितं वितर्कितं लज्जितञ्चैव ॥९२॥
एक या दो ‘चतुर’ मुद्रा वाले हस्तों के थोड़े घुमाव द्वारा—प्रकट
करना ( विवृत ), विचारकरना, आचरणकरना ( चलना-हिलना )
आशंका करना तथा लज्जाकरना बतलाया जाता है ।
नयनौपम्यं पद्मदलरूपणं हरिणकर्णनिर्देशः ।
संयुक्तकरणेनैव तु चतुरेणैतानि कुर्वीत ॥ ९३ ॥
दो संयुक्त चतुर-हस्तों द्वारा कमल दलों की नयनों से उपमा देना
तथा हरिणों के कानों को बतलाया जाता है ॥ ६३ ॥
लीला⁸-रती रुचिश्च स्मृतिबुद्धिविभावनाः क्षमा पुष्टिम् ।
संज्ञामात्रां⁹ प्रणयं विचारणं सङ्गतं शौचम् ॥९४॥
चातुर्यं माधुर्यं दाक्षिण्यं मार्दवं सुखं शीलम् ।
प्रश्नं¹⁰ वार्तायुक्तिं वेषं मृदुशाद्वलं¹¹ स्तोकम् ॥ ९६ ॥
विभवाविभवौ सुरतं गुणागुणौ यौवनं गृहं¹² दारान् ।
नानावर्णांश्च तथा चतुरेणैवं प्रयुञ्जीत ॥ ९७ ॥
इसके अतिरिक्त चतुर-हस्त के द्वारा क्रीडा ( लीला ), अनुराग
१. नयननिपुणसमसुनिपुणबालातुरशव्यकैतवार्थेषु—ग० ।
२. प्रथमे—ख० । ३. हस्तदण्डेन—ग० ।
४. विवृतविचारितरचितं ख, विधुतविचरितचरितं—ग० ।
५. विवर्जितं—ग० । ६. कर्णनिर्देशम्—ख० ।
७. संयुक्तकरेणैव च—ख० ग० । ८. लीलां रति—ख० ग० ।
९. संज्ञामाशां—ख० ग० । १०. प्रशमं वार्तायुक्ति—ग० ।
११. शाद्वलं—ख० ग० । १२. गृहान् दारान्—ग० ।

नवमोऽध्यायः ५९
( रति ), प्रभा ( रुचि ), स्मृति, बुद्धि, तर्क (ऊहापोहात्मक-कार्य-विभावन)
क्षमा, पुष्टि, संकेत ( संज्ञामात्र ), प्रणय, विचार, मिलन, पवित्रता,
चातुर्य, माधुर्य, दाक्षिण्य, मार्दव, सुख, चरित्र ( शील ), प्रश्न, वार्ता
( कथा या अर्थशास्त्र ), युक्ति, वेशस्थान या वेशरचना, कोमलघास,
अल्पपरिमाण, समृद्धिशालिता तथा समृद्धिहीनता, सुरतकर्म, गुण तथा
अवगुण, यौवन, गृह पत्नी तथा अनेकविध रंगों को भी बतलाया
जाता है ॥ ९४-९७ ॥
सितमूर्ध्वेन तु कुर्याद्रक्तं पीतञ्च मण्डलैःकृतेन ।
परिमृदितेन तु नीलं वर्णांश्चतुरेण हस्तेन ॥ ९८ ॥
इस चतुरहस्त द्वारा रंगों को बतलाने में—ऊपर की ओर हाथ को
उठाकर श्वेत वर्ण, गोल घुमाव द्वारा रक्त और पीत वर्ण तथा एक हाथ से
दूसरे हाथ को दबाकर ( परिमृदित ) नीलवर्ण बतलाया जाए ॥ ९८ ॥
भ्रमर:१—
मध्यमाङ्गुष्ठसन्दंशे वक्रो२ चैव प्रदेशिनी ।
ऊर्ध्वमन्ये प्रकीर्णे च द्वयङ्गुल्यौ३ भ्रमरे करे ॥ ९९ ॥
यदि मध्यमा उंगली और अंगूठे को एक दूसरे से मिलाकर उंगली को
टेढ़ी कर ले तथा शेष दो उंगलियां उपर की ओर फैला दी जाएँ तो 'भ्रमर'
हस्त कहलाता है ॥ ९९ ॥
पद्मोत्पलकुमुदानामन्येषाञ्चैव दीर्घवृन्तानाम् ।
पुष्पाणां ग्रहणविधिः कर्त्तव्यः कर्णपूरश्च ॥ १००॥
योजना—इसके द्वारा कमल, कुमुदिनी तथा अन्य लम्बे डण्ठल या
टहनी वाले पुष्पों का चयन और कर्णकुण्डल को बतलाया जाता है ॥१००॥
विच्युतश्च४ सशब्दश्च कार्यों निर्भर्त्सनादिषु ।
बलालापे च शीघ्रे च ताले विश्‍वासने तथा ॥ १०१ ॥
इस हस्त-मुद्रा वाले हाथ को कुछ शब्द करते हुए नीचे झुकाया जाए
तो डांटना ( निर्भर्त्सन ) बलशीलता का गर्व ( बलालाप ) बतलाना,
शीघ्रता, ताल देना तथा विश्वास करने का अर्थ प्रकट होता है ॥ १०१ ॥
१. भ्रमर : ( उत्पत्तिकथा ) देवों की माता अदिति के कर्णकुण्डल बनाने के
लिए काश्यपऋषि ने इस मुद्रा का प्रयोग किया था। तभी से इसका प्रचलन हुआ।
१. मण्डलकरेण—ग०। २. वक्रे—ग०।
३. द्वाङ्गुलौ—ग०। ४. विद्युत्तश्च सहजश्च—ग०।

६० नाट्यशास्त्रम्
१हंसास्य—
तर्जनीमध्यमाङ्गुष्ठास्त्रेताग्निसंस्था निरन्तराः ।
भवेयुर्हंसवक्त्रस्य शेषे द्वे सम्प्रसारिते ॥ १०२ ॥
यदि तर्जनी तथा मध्यमा उंगली अंगूठे के अग्रभाग पर हो तथा
अन्य (दो) उंगलियाँ फैली हुई रहें तो 'हंसास्य' हस्त होता है ॥ १०२ ॥
श्लक्ष्णाल्पशिथिललाघवनिस्सारार्थे मृदुत्वयोगे च ।
कार्योंऽभिनयविशेषः किञ्चित् प्रस्पन्दिताग्रेण ॥१०३॥
योजना—इस (मुद्रा-युक्त) हस्त के अग्रभाग को कुछ धुजाते हुए
रखने पर इसके द्वारा स्निग्ध, अल्प, शिथिल, लाघव, निस्सारवस्तु
(या निष्क्रमण) तथा मृदुत्व का अर्थ प्रकट होता है ॥ १०३ ॥
२हंसपक्ष—
समाः प्रसारितास्तिस्रस्तथा चोर्ध्वा कनीयसी ।
अङ्गुष्ठः कुञ्चितश्चैव हंसपक्ष इति स्मृतः ॥ १०४ ॥
यदि तीन उंगलिया फैली हुई (तथा) कनीयसी उंगली सीधी तथा
ऊपर उठी हुई और अंगूठा सिकुड़ा हुआ हो तो 'हंसपक्ष' हस्त
हो जाता है ॥ १०४ ॥
एषं च सलिलनिवापे दातव्ये गण्डसंश्रये चैव ।
कार्यः प्रतिग्रहाचमनभोजनार्थेषु विप्राणाम् ॥ १०५ ॥
आलिङ्गने महास्तम्भैदर्शने रोमहर्षणे चैव ।
स्पर्शोऽनुलेपनार्थे योज्यः संवाहने चैव ॥ १०६ ॥
पुनरेष च नारीणां स्तनान्तरस्थेन विभ्रमविशेषाः ।
कार्या यथारसं स्युर्दुःखे हनुधारणे चैव ॥ १०७ ॥
१. हंसास्य (उत्पत्तिकथा) दक्षिणामूर्ति शिव ने ऋषिगण को तत्त्वविद्या
को उपदेश करने के अवसर पर न्यग्रोधवृक्ष के नीचे बैठते हुए इसी हस्त का
उपयोग किया । तभी से इस मुद्रा का प्रचलन हुआ ।
२. हंसपक्षः (उत्पत्तिकथा) ताण्डवनृत्य के प्रदर्शन के समय तण्डु द्वारा
इसी मुद्रा का उपयोग हुआ । तभी से इसका प्रचलन हुआ ।
१. प्रस्यन्दिताग्रेण—ग० । २. एष विधिर्निवापसलिले—ग० ।
३. गन्धसंश्रये—ग० । ४. प्रतिग्रहावमान—ग० ।
५. महास्तम्भनिदर्शने—ग० । ६. यथा रसा स्युः-ख, यथारसं स्यात्-ग० ।

नवमोऽध्यायः ६१
योजना—इस के द्वारा पितरों को जल-प्रदान ( तर्पण ) तथा कपोल
के समीप ले जाने पर किसी दान का ग्रहण करना प्रकट होता है, तथा
( भोजन के समय किया जाने वाला ) ब्राह्मणों का आचमन तथा भोजन,
आलिंगन, बड़े स्तम्भ के दर्शन, रोमांच, स्पर्श, चन्दन-लेपन, संवाहन
( पैर या शरीर दबाने ) का अर्थ प्रकट होता है। इस मुद्रा का रसों के
अनुसार तथा स्त्रियों के रागात्मक अभिनय में उनके दुःख, (ठुड्डी के स्पर्श )
तथा उरोज प्रदेश के विशेष विभ्रमों के अर्थ प्रकाशनार्थ प्रयोग करना
चाहिए ॥ १०५-१०७ ॥
१सन्दंश—
तर्जन्यङ्गुष्ठसन्दष्टैस्त्व१रालस्य यदा भवेत् ।
आभुग्नतलमध्यस्थः स सन्दंश इति स्मृतः ॥ १०८ ॥
यदि अरालहस्त में तर्जनी तथा अंगूठे का अग्रभाग मिला कर हथेली
को थोड़ी नमा दी जाए तो 'सन्दंश' हस्त हो जाता है ॥ १०८ ॥
सन्दंशस्त्रिविधो ज्ञेयस्त्व३ग्रजो मुखजस्तथा ।
तथा पार्श्वगतश्चैव रसभावोपबृंहितः ॥ १०६ ॥
रस तथा भावों से विस्तार प्राप्तकरनेवाला सन्दंश-हस्त तीन प्रकार
का होता है—( १ ) अग्रज, ( सामने की ओर रहने वाला ) ( २ )
मुखज ( मुंह के समीप रहने वाला ) तथा ( ३ ) पार्श्वगत ( एक ओर
रहने ( या होने ) वाला ॥ १०९ ॥
पुष्पापचयग्रथने ग्रहणे तृणपर्णकेशसूत्राणाम् ।
शल्यावयवग्रहणे प्रकर्षणे चाग्रसन्दंशः ॥ ११० ॥
योजना—अग्रज-सन्दंश के द्वारा पुष्पों का एकत्र करना तथा माला
का गूँथना, तृण, पर्ण, केश तथा सूत्र का ग्रहण, कण्टक की नोक के
ग्रहण करने ( शल्यावयवग्रहणे ) तथा बाण के खींचने का अर्थ प्रकट
होता है । ॥ ११० ।
१. सन्दंश (उत्पत्तिकथा) इस मुद्रा का प्रयोग भगवती वीणापाणी सरस्वती
द्वारा किया गया था। यह हस्त ज्ञानमुद्रा के रूप में अनेक प्राचीनमूर्तिशिल्पों में
दृष्टिगत होता है ।
१. सन्दंशो ह्यरालस्य—ख ग० । २. तलमध्यश्च—ख० ग० ।
३. ज्ञेयो अग्रजो—ग० । ४. शल्याकर्षणग्रहणापकर्षणे—ख० ग० ।

६२ नाट्यशास्त्रम्
वृन्तात् पुष्पोद्धरणं वर्तिशलाकादिपूरणञ्चैव ।
धिगिति च वचनं रोषे मुखसन्दंशस्य कर्माणि ॥ १११ ॥
मुखसन्दंश से टहनी से पुष्पों को तोड़ने, दीपक में बाती को रखने
या उसे शलाका से ठीक करने, किसी वस्तु की पूर्ति करने, धिक्कार के
शब्द तथा क्रोध करने अर्थ प्रकाशित होता है ॥ १११ ॥
यज्ञोपवीतधारण-वेधन-गुणसूक्ष्मबाणलक्ष्येषु ।
योगे² ध्याने स्तोके संयुक्तकैररणस्तु कर्त्तव्यः ॥ ११२ ॥
दो मुखसन्दंश हस्तों को मिलाने से यज्ञोपवीत धारण, (रत्न आदि
का) वेधन, प्रत्यंचा, बारीकी, बाण, लक्ष्य, योग, ध्यान तथा छोटी वस्तु
को बतलाया जाता है ॥ ११२ ॥
पेलॅवकुत्सासूया-सदोषवचने च वामहस्तेन ।
किञ्चिद्विवर्त्तिताग्रः प्रयुज्यते पार्श्वसन्दंशः ॥११३॥
पार्श्वसन्दंश—यदि बाँयी ओर सन्दंशहस्त के अग्रभाग को थोड़ा
(धीरे-धीरे) मोड़ते हुए रखा जाए तो इसपार्श्वसन्दंश से कोमलता (पेलव),
असूया तथा दोषपूर्ण शब्दों की अभिव्यक्ति होती है ॥ ११३ ॥
आलेख्यनेत्ररञ्जन-वितर्कवृन्तप्रवालरर्चनञ्च ।
निष्पीडनं तथालक्तकस्य कार्यञ्च नारीभिः ॥ ११४ ॥
इस मुद्रा का स्त्रियों के द्वारा प्रयोग करने पर उससे चित्रलेखन, नेत्रों
में अंजन धारण, वितर्क (शंका), टहनी तथा पत्तों की चित्रकारी (प्रवाल-
रचना) करना (जो कि शरीर पर की जाती है) तथा महावर का लगाना
बतलाया जाता है ॥ ११४ ॥
मुकुल¹—
समागताग्राँस्सहिता यस्याङ्गुल्यो भवन्ति हि ।
ऊर्ध्वा हंसमुखस्यैव स भवेन्मुकुलः करः ॥ ११५ ॥
यदि हंसास्यहस्त में ऊपर की ओर मुंह किये हुए सभी उंगलियाँ


१. मुकुलः (उत्पत्तिकथा) वायुपुत्र हनुमान द्वारा सूर्य को झड़पने के लिए
इसी हस्त का उपयोग किया गया था तभी से इसका प्रचलन हो गया ।


१. यज्ञोपवीतनिधन—ग० । २. योगेऽध्ययने—ग० ।
३. संयुक्तकरस्तु—ख० ग० । ४. पेशल—ग० ।
५. किञ्चिद्विवर्त्तितकराग्रः—ग० । ६. रचनेषु—ग० ।
७. समा नताग्राः सहिताः—ख ग० ।

नवमोऽध्यायः ६३
एक दूसरे से मिली हुई तथा सिकुड़ी रहें तो यह 'मुकुल'हस्त कह-
लाता है ॥ ११५ ॥
देवार्चनबलिकरणे पद्मोत्पलमुकुलरूपणे चैव ।
विटचुम्बने च कार्यो विकुत्सिते विप्रकीर्णश्च ॥ ११६ ॥
भोजनहिरण्यगणनामुखसङ्कोचप्रदानशीघ्रेषु ।
मुकुलितकुसुमेषु तथा तज्ज्ञैरेष प्रयोक्तव्यः ॥ ११७ ॥
योजना—इसके द्वारा देवपूजन, बलिप्रदान, कमल तथा कुमुदिनी
की कलियां, विटचुम्बन, तिरस्कार (विकुत्सित), विविधवस्तु (विप्रकीर्ण)
भोजनग्रहण, सुवर्णमुद्राओं की गणना, मुखसंकोच, (वस्तु) प्रदान, शीघ्रता
तथा पुष्पों की कलियां बतलाई जाती हैं ॥ ११६, ११७ ॥
१ऊर्णनाभ—
पद्मकोशस्य हस्तस्य ह्यङ्गुल्यः कुञ्चिता यदा ।
ऊर्णनाभः स विज्ञेयः केशचौर्यग्रहादिषु ॥ ११८ ॥
यदि 'पद्मकोश' हस्त में सारी उंगलियों को सिकुड़ लिया जाए तो
'ऊर्णनाभ' हस्त हो जाता है ॥ ११८ ॥
शिरःकण्डूयने चैव कुष्ठव्याधिनिरूपणे ।
सिंहव्याघ्रेष्वभिनयः प्रस्तरग्रहणे तथा ॥ ११९ ॥
योजना—केशों तथा चोरी गई वस्तु का ग्रहण, सिर खुजलाना,
कुष्ठव्याधि, सिंह, व्याघ्र तथा इसी प्रकार के अन्य हिंसक प्राणीगण, चोरी
गई वस्तु तथा पत्थर के उठाने का इस मुद्रा के द्वारा अर्थ प्रदर्शन
किया जाता है ॥ ११९ ॥
२ताम्रचूड—
मध्यमाङ्गुष्ठसन्दंशो वक्रा चैव प्रदेशिनी ।
शेषे तलस्थे कर्त्तव्ये ताम्रचूलंकरेऽङ्गुली ॥ १२० ॥
१ ऊर्णनाभः (उत्पत्तिकथा) हिरण्यकशिपु के वध के अवसर पर नृसिंह
भगवान ने इसी हस्त का उपयोग किया था तभी से इसका प्रचलन हो गया ।
२. ताम्रचूड (उत्पत्तिकथा) जब तीनों वेद पूर्ण हो गए तो वे ब्रह्मा के
समक्ष उपस्थित होकर उनसे प्रार्थना करने लगे । इस अवसर पर इसी हस्त
का उपयोग किया गया । तभी से इसका प्रचलन हो गया ।
१. अङ्गुल्यः—ग० । २. व्याघ्राद्यभिनयः—ग० ।
३ ताम्रचूडे कराङ्गुली—ख० ।

६४ नाट्यशास्त्रम्
यदि मध्यमा उंगली तथा अंगूठा मिला हुआ हो, उंगली सिकुड़ी हुई
तथा शेष (दो) उंगलियां हथेली पर हों तो 'ताम्रचूड' हस्त हो
जाता है ॥ १२० ॥
विच्युतंश्च⁴ सशब्दश्च कार्यो निर्भर्त्सनादिषु ।
ताले⁵ विश्वासने चैव शीघ्रार्थे संज्ञितेषु च ॥ १२१ ॥
योजना—झिड़कने के साथ शब्दकर नीचे झुकाते हुए डाँटने
(विच्युति), ताल का अन्त, विश्वास-दान, शीघ्रता तथा इशारा देने
में इस मुद्रा का प्रयोग किया जाए ॥ १२१ ॥
तथा कलासु काष्ठासु निमेषे तु क्षणे तथा ।
एष एव करः कार्यो बालालापानिमन्त्रणे ॥ १२२ ॥
तथा इसी मुद्रा की कालगणना के भागों-जैसे कला, काष्ठा, निमेष
तथा क्षण के बतलाने, युवती बाला से सम्भाषण तथा उसे आमन्त्रण देने
में भी योजना करनी चाहिए ॥ १२२ ॥
ताम्रचूडमुद्रा का अन्यलक्षण:—
अथवा—
अङ्गुल्यस्संयुता¹ वक्रा उपर्यङ्गुष्ठपीडिताः ।
प्रसारिताैककनिष्ठा² च ताम्रचूडकरः³ स्मृतः ॥ १२३ ॥
यदि हाथ की उंगलियां एक दूसरे से मिली हुई हों तथा टेढ़ी रहें,
ये ऊपर अंगूठे से दबाई जाएं तथा कनिष्ठिकाउंगली फैली हो तो भी
'ताम्रचूड़' हस्त कहलाता है ॥ १२३ ॥
शतं सहस्रं लक्षञ्च कनकञ्चापि⁴ दर्शयेत् ।
क्षिप्रमुक्ताङ्गुलीभिस्तु स्फुलिङ्गान् विप्रुषस्तथा ॥ १२४ ॥
इसके द्वारा सौ, हजार तथा लाख की संख्याएं तथा स्वर्णमुद्राएं बतलाई
जाती हैं । यदि इसी मुद्रा में उंगलियों को शीघ्रतापूर्वक कम्पित किया
जाए तो उससे चिनगारियां तथा बूंदें बतलाई जाती हैं ॥ १२४ ॥
असंयुता करा ह्येते मया प्रोक्ता द्विजोत्तमाः ।
अतश्च⁵ संयुतान् हस्तान् गदतो मे निबोधत ॥ १२५ ॥
४. व्युत्पन्नश्च—ग० । ५. तालेष्विध्वसिते चैव--ख० ।
१. अङ्गुल्यः सहिता—ग । २. प्रसारिता कनिष्ठा च—ग० ।
३. ताम्रचूडः करः—ग० । ४. करेणैकेन योजयेत्—ग० ।
५. अधुना—ख० पुनश्च—ग० ।

नवमोऽध्यायः ६५
हे मुनियो इस प्रकार मैंने इन असंयुतहस्तों को बतलाया, अब मैं
संयुत हस्तों को बतलाता हूँ जिन्हें आप समझ लीजिए ॥ १२५ ॥
१संयुतहस्तमुद्राएं (लक्षण तथा योजना)
अंजलि—
पताकाभ्यान्तु हस्ताभ्यां संश्लेषादञ्जलिः स्मृतः ।
देवतानां गुरूणाञ्च मित्राणाञ्चाभिवादने ॥ १२६ ॥
दो पताक हस्तों को मिलाने से 'अंजलि' हस्तमुद्रा होजाती है। इसे
देवता, गुरुजन तथा मित्रों के अभिवादन में प्रयुक्त किया जाता है ॥१२६॥
स्थानान्यस्य पुनस्त्रीणि वक्षो वक्त्रं शिरस्तथा ।
देवतानां शिरस्थस्तु गुरूणामास्य संस्थितः ॥ १२७ ॥
वक्षःस्थश्चैव मित्राणां१ शेषे२ त्वनियमो भवेत् । ॥ १२८ ॥
अभिवादन के तीन स्थान हैं—वक्षःस्थल, मुख तथा मस्तक (शिर) ।
इनमें देवताओं को शिरस्थ नमस्कार, गुरुजन को मुख के सम्मुख तथा
मित्रों को वक्षःस्थल के बराबर हाथ रखते हुए नमस्कार करना चाहिए।
शेष व्यक्तियों के अभिवादन के लिए कोई नियत प्रदेश नहीं होते हैं। स्त्रियों
(का बिना नियम के नमस्कार होता है पाठा० से अर्थ) ॥ १२७, १२८ ॥
कपोत—
उभाभ्यामपि हस्ताभ्यामन्योन्यं पार्श्वसङ्ग्रहात् ।
हस्तः कपोतको नाम कर्म चास्य निबोधत ॥ १२९ ॥
दो (सर्पशीर्ष) हस्तों को परस्पर दोनों कोनों से मिलाने पर 'कपोत'
मुद्रा होती है। अब इनकी योजना सुनिये ॥ १२९ ॥
एष३ विनयाभ्युपगमे प्रणामकरणे गुरोश्च सम्भाषे ।
शीते भये च कार्यो वक्षस्थः कम्पितः४ स्त्रीभिः ॥ १३० ॥
१. असंयुत तथा संयुतहस्तमुद्राएं—ये हस्तमुद्राएं सामान्यतः हाथ से
पृथक्-पृथक् उपयोग में आती हैं परन्तु कभी कभी दोनों हाथों द्वारा एक साथ
भी असंयुत हस्तों का प्रदर्शन होता है। (परन्तु ये कहलाएंगे असंयुत-हस्त ही)
जब दोनों हाथों को मिला कर लक्षणानुसार प्रदर्शित किया जाए तभी संयुत
हस्त होगें। इनकी उपयोगिता के विषय में अधिक विवेचन के लिए भूमिका
तथा परिशिष्ट भी देखिये।
१. विप्राणां—क० । २. स्त्रीणामानियतो भवेत्—क० ।
३ द्विषद्धियाभ्युपगमे—ग० । ४. कल्पितः—ग० ।
५ ना० शा० द्वि०

६६ नाट्यशास्त्रम्
योजना:—इसे विनम्रता आदि सौजन्यपूर्ण भाव के प्रदर्शन पूज्यजन
को प्रणाम करने तथा उनसे संभाषण में प्रयुक्त किया जाता है । शीत तथा
भय के अर्थ को प्रदर्शन करने में स्त्रियों के द्वारा इस मुद्रा को वक्षस्थल
पर स्थित रखना चाहिए ॥ १३० ॥
अयमेवाङ्गुलिपरिघृष्यमाणमुक्तस्तु खिन्नवाक्येषु ।
एतावदिति च कार्यो १नेदानीं कृत्यमिति चार्थे ॥ १३१ ॥
तथा यही दोनों हाथों की उंगलियों को परस्पर मिलाकर हटा लेने
पर खिन्न वचनों, 'इतना करना' तथा 'यह अभी नहीं करना' के अर्थों को
बतलाता है ॥ १३१ ॥
कर्कट—
अङ्गुल्यो यस्य हस्तस्य ह्यन्योन्यान्तरनिस्सृताः ।
स कर्कट इति ज्ञेयः करः कर्म च वक्ष्यते ॥ १३२ ॥
यदि दोनों हाथों की उंगलियां मिलकर एक दूसरे के बीच से निकली
हुई रहें तो 'कर्कट' मुद्रा होती है। अब इसकी योजना सुनिये ॥ १३२ ॥
एष मदनाङ्गमर्दे सुप्तोत्थिते२ऽजृम्भणे बृहद्देहे ।
हनुधारणे च योज्यः शङ्खग्रहणेऽर्थतँत्वज्ञैः ॥ १३३ ॥
इसके द्वारा काम के मद में अंग मरोड़ना (मर्दनांगमर्दे), सोकर
उठते समय जंभाई लेना, विशाल शरीर, ठुड्डी को हाथ से सहारा देने
(हनुधारणे) तथा शंख का ग्रहण करना बतलाया जाता है ॥ १३३ ॥
स्वस्तिक—
मणिवन्धनविन्यस्तावरालौ स्त्रीप्रयोजितौ ।
उत्तानौ वामपार्श्वस्थौ स्वस्तिकः परिकीर्तित ॥ १३४ ॥
दो अराल हस्तों को कलाई पर सामने की ओर से ऊपर मुँह रखते
हुए बायीं बाजू की ओर रख देने पर 'स्वस्तिक' मुद्रा जानों । इसे स्त्रियाँ
प्रयुक्त करें ॥ १३४ ॥
१. मदनांगमर्दे का यहाँ श्री मन० मो० घोष ने (शहद के छत्ते या मोम
को दिखलाना, bees wax) अर्थ किया है जो असंगत है ।
१. भेदाङ्गीकृत्यमिति चार्थे—ख० ।
२. सुप्तोत्थविजृम्भणे—ग० । ३. अनुधारणे—ख० ।
४. च तत्वज्ञैः—ग० । ५. वर्धमानकौ—ग० ।

नवमोऽध्यायः ६७
स्वस्तिक विप्रयुतिकरणाद् दिशो घनाः खं वनं समुद्राश्च ।
ऋतवो मही तथौघं१ विस्तीर्णं वाभिनेयं स्यात् ॥१३५॥
'स्वस्तिक' का प्रदर्शन कर दोनों हाथों को हटा लेने पर उससे
दिशाएं, आकाश, वन, समुद्र, ऋतुएँ, पृथ्वी, वेग एवं अन्य विस्तीर्ण पदार्थ
प्रदर्शित होते हैं ॥ १३५ ॥
कटका-( खटका- ) वर्धमानक—
कटकः कटकैर्न्यस्तः कट३कावर्धमानकः ।
शृङ्गारार्थेषु योक्तव्यः प्रणामकरणे तथा ॥ १३६ ॥
[ कुमुदोत्पलवृन्तेषु कर्तव्यश्छत्रधारणे४ । ]
यदि दो कटकामुख हस्तों को स्वस्तिक दशा में ( एक दूसरे की कलाई
के ऊपर ) रखा जाए तो क ( ख ) टकावर्धमानक मुद्रा हो जाती है। इसे
शृङ्गार के भावों तथा प्रणाम करने में प्रयुक्त करना चाहिए ॥ १३६ ॥
[ कुमुद, उत्पल एवं कुन्द पुष्पों के तथा शंख के धारण में इसी की
योजना करनी चाहिए ।— ]
उत्संग—
अरालौ तु विपर्यस्तावृत्तानौ वर्धमानकौ ।
उत्सङ्ग इति विज्ञेयः स्पर्शस्य ग्रहणे करः ॥ १३७ ॥
यदि दो अराल हस्त ऊपर की ओर मुंह वाले एवं स्वस्तिकदशा में दोनों
कन्धों पर रखें जाएँ तो 'उत्संग' मुद्रा होजाती है ॥ १३७ ॥
सनिष्पेषकृ७ते चैव रोषामर्षकृतेऽपि च ।
निष्पीडितः पुनश्चैव स्त्रीणामीर्ष्याकृते भवेत् ॥ १३८ ॥
इसके द्वारा अतिशयप्रयत्न से निष्पन्न होनेवाले कार्य, रोष तथा
ईर्ष्या ( अमर्ष ), किसी पदार्थ को दबाना ( निष्पीडित ) तथा स्त्रियों
की ईर्ष्या का अर्थ बतलाया जाता है ॥ १३८ ॥
१ तथान्यत्—ख—ग० । २. चाभिनेयं—ग० ।
३. कटको वर्धमानकः—ख०, ग० । ४. अयं श्लोकः क—पुस्तकेऽधिकः ।
५. वृत्तानावृर्धमानतौ—ग० । ६. कार्यः सिंहावलोकिते—ख० ।
७. सनिष्पेषकरश्चैव—य० । ८. रोषेऽमर्षेऽपि च स्मृतः—ग० ।

६८ नाट्यशास्त्रम्
निषध—
[ ¹मुकुलन्तु यदा हस्तं कपित्थः परिवेष्टयेत् ।
स मन्तव्यस्तदा हस्तो निषधो नाम नामतः ॥
निषध—यदि मुकुल हस्त को कपित्थ हस्त से वेष्टित कर दिया जाए
तो ‘निषध’ मुद्रा जानें।
संग्रहपरिग्रहौ धारणञ्च समयश्च सत्यवचनञ्च ।
सङ्क्षेपः सङ्क्षिप्तं निपीडितेनाभिनेतव्यम् ॥ ]
इसकी योजना, संग्रह, दान, ग्रहण, प्रतिज्ञा, (समय) सत्यवचन ।
संक्षेप तथा समेटने का भाव इसे दबाकर बतलाया जाता है । ]
गृहीत्वा वामहस्तेन कूर्पराभ्यन्तरे भुजम् ।
दक्षिणञ्चापि वामस्य कूर्पराभ्यन्तरे न्यसेत् ॥ १३९ ॥
स चापि दक्षिणो हस्तः सम्यङ्मुष्टिकृतो भवेत् ।
इत्येष निषधो हस्तः कर्म चास्य निबोधत ॥ १४० ॥
यदि बायांहाथ दाहिनीभुजा पर रखा जाए तथा दाहिना हाथ बायीं
भुजा पर, तथा यह दाहिनाहाथ ‘मुष्टि’ हस्त के लक्षण विधिवत् रखता
हो तो उसे ‘निषध’ हस्त जानें ॥ १३९, १४० ॥
एतेन धैर्यम²दगर्वसौष्ठवोत्सुक्यविक्रमाटोपाः ।
अभिमानावष्टम्भ-स्तम्भस्थैर्यादयः कार्याः ॥ १४१ ॥
अब इसकी योजना बतलाता हूँ।
इस हस्तमुद्रा को धैर्य, मद, गर्व, सौष्ठव, औत्सुक्य, पराक्रम, शौर्य,
उद्दण्डता (आरोप), स्वाभिमान, हठ (अवष्टम्भ), स्तम्भ तथा स्थैर्य
आदि भावोंवाले अर्थों में संयोजित किया जाए ॥ १४१ ॥
[ अथवा—
ज्ञेयो वै निषधो नाम हंसपक्षौ पराङ्मुखौ ।
जालवातायनादीनां प्रयोक्तव्योऽभिघट्टने ॥ ]
[ निषध (लक्षणान्तर)—यदि दो विभिन्न दिशाओं में दो हंसपक्ष हस्तों
को रखा जाए तो ‘निषध’ होता है। इसे झरोखा, खिड़की आदि से टक्कर
लगने में संयोजित किया जाए । ]
१. श्लोकद्वयं ग—पुस्तके नास्ति । २. मदगर्वसौष्ठवो—ख०, ग० ।

नवमोऽध्यायः ६९
'दोला—
अंसौ प्रशिथिलौ मुक्तौ पताकौ तु१ प्रलम्बितौ ।
यदा भवेतां करणे स दोल इति संज्ञितः ॥ १४२ ॥
यदि दोनों कन्धों को ढीले रखते हुए दोनों पताक हस्तों को हिलाते
हुए रखे तो करण में प्रयुक्त होने वाली यह हस्तमुद्रा ‘दोला’ जानें ॥१४२॥
सम्भ्रमविषादमूर्च्छितमदाभिघाते तथैव चावेगे ।
व्याधिप्लुते च शस्त्रै२क्षते च कार्योंऽभिनययोगः ॥१४३॥
इससे सम्भ्रम, विषाद, मूर्च्छा, नशे के झटके ( मदाभिघात ), आवेग,
व्याधियुक्तता तथा शस्त्रों से आहतदशा का अर्थ सूचित होता है ॥१४३॥
पुष्पपुट—
यस्तु सर्पशिराः प्रोक्तस्तस्याङ्गुलिनिरन्तरः ।
द्वितीयः पार्श्वसंश्लिष्टः३ स तु पुष्पपुटः स्मृतः ॥ १४४ ॥
दो सर्पशीर्ष हस्तों की अंगुलियों को सटाकर दोनों हाथों को एक
दूसरे से सटा देने पर 'पुष्पपुट' मुद्रा हो जाती है ॥ १४४ ॥
४धान्यफलपुष्पसदृशाम्यनेन नानाविधानि युक्तानि ।
ग्राह्याण्युपनेयानि च तोयानयनापनयने च ॥१४५॥
इससे धान्य, फल तथा पुष्प तथा अन्य इसी के सदृश वस्तुओं का
ग्रहण तथा अर्पण और जल का लाना तथा हटाना सूचित
होता है ॥ १४५ ॥
मकर—
पताकौ तु यदा हस्तौ५वूर्ध्वाङ्गुष्ठावधोमुखौ ।
उपर्युपरि विन्यस्तौ तर्दा६सौ मकरः स्मृतः ॥ १४६ ॥
यदि दो पताक हस्तों को (अंगूठा उठाते हुए) फैला कर एक दूसरे
पर रख दिया जाए तो 'मकर' नामक हस्तमुद्रा हो जाती है ॥ १४६ ॥
सिंहव्यालद्वीपि७प्रदर्शनं नक्रमकरमत्स्यानाम् ।
ये चान्ये क्रव्यादा ८अभिनेयास्तेऽर्थयोगेन ॥ १४७ ॥
१. प्रविलम्बितौ—ग०। २. शत्रुक्षते—ग। ३. सुश्लिष्टः—ग०।
४. धान्यजलपुष्पभक्ष्याण्यनेक नानाविधानि युक्तेन—ग०।
५. हस्तौ मूर्धाङ्गुष्ठा—ग०। ६. तदा स—ग०।
७. सिंहव्यालद्विपददर्श—ग०। ८. ह्यभिनेयास्तेन हस्तेन—ग०।