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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 668 में से

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नवमोऽध्यायः ५१
कटकामुखः—
उत्क्षिप्तवक्रा तु यदानामिका सकनीयसी ।
अस्यैव तु कपित्थस्य तदासौ क(ख)टकामुखः ॥ ६० ॥
यदि कपित्थ हस्त मुद्रा में अनामिका तथा कनिष्ठिका अंगुलियों को
(ऊपर) उठाकर मोड़ा जाए तो 'कटकामुख' मुद्रा कहलाती है ॥ ६० ॥
होत्रं हव्यं छत्रं प्रग्रहपरिकर्षणं व्यजनञ्च ।
आदर्शधारणं खण्डनं तथा पेषणञ्चैव ॥ ६१ ॥
आयतदण्डग्रहणं मुक्ताप्रालम्बसङ्ग्रहश्चैव ।
²स्रग्दामपुष्पमाल(वस्त्रान्तालम्बनञ्चैव ॥ ६२ ॥
³मन्थनशराकर्षणपुष्पाव⁴चयप्रतोदकार्याणि ।
अङ्कुश-रज्ज्वाकर्षण-स्त्रीदर्शनमेव कार्यञ्च ॥ ६३ ॥
योजना—होत्र (होम) हुतद्रव्य, छत्र, रास का खींचना (प्रग्रह-परि-
कर्षण), पंखा, दर्पण धारण, तोडना (पंखों का), पीसना, लम्बे दण्ड-
काष्ठ का ग्रहण, मौक्तिक माला का (मुक्ताप्रालम्ब) सम्हालना, पुष्पमाला
(तथा अन्य मालाओं) का धारण, वस्त्र का कोना थाम लेना (खींचना-
वस्त्रान्तालम्बनम्), मथनी एवं बाण खींचना, पुष्प तोड़ना, चाबुक लगाना,
अंकुश लगाना, रस्सी खींचना तथा स्त्री-चेष्टाओं का दर्शन इस मुद्रा के
द्वारा सूचित किया जाता है ॥ ६१-६३ ॥
⁵सूचीमुखः—
कटकाँख्ये यदा हस्ते तर्जनी सम्प्रसारिता ।
हस्तस्सूचीमुखो नाम तदा ज्ञेयः प्रयोक्तृभिः ॥ ६४ ॥

१. कटका मुख (उत्पत्तिकथा) गुह (कार्तिकेय) ने भगवान शिव से शस्त्र
विद्या ग्रहण करने के अवसर पर इसी हस्त का प्रयोग किया था। तभी से
इसका प्रचलन हो गया।
२. सूचीमुखः (उत्पत्तिकथा) ब्रह्मा ने 'एकोऽहं' को समझाने के लिए इसी
हस्त का प्रयोग किया था। तभी से इसका प्रचलन हुआ।

१. प्रग्रहपरिकर्षणञ्च व्यञ्जनकम्—ख० ।
२. स्रग्दामधारणं खलु वस्त्रा—ख० । ३. मन्थनशरावकर्षण—क, ग।
४. पुष्पापचय—क० । ५. खटका—क० ख० ।