नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः ५३
तो इससे दाढ़वाले प्राणीजन का, यदि इसी अंगुली को गोल घुमाया जाए
तो उससे ( किसी व्यक्ति द्वारा ) सभी वस्तु का ग्रहण करना, यदि
झुका कर फिर इसी अंगुली को ऊपर उठाली जाए तो इससे दीर्घअभ्यास
तथा दिवस का तथा यदि यही मुंह के समीप ले जाकर मोड़ी तथा ऊपर
नीचे लेजाई जाए तो उससे वाक्यों का अर्थ बोध प्रदर्शित किया जाता
है ॥ ६८-७० ॥
मेति¹ वदेति च योज्या प्रसारितोत्कम्पितोत्ताना ।
कार्या प्रकम्पिता रोषदर्शने स्वेद²रूपणे चैव ॥ ७१ ॥
इसी प्रकार यदि निषेध एवं सम्भाषण का अर्थ प्रदर्शित करना होतो
इस मुद्रा में तर्जनी उंगली को फैलाकर हिलाते हुए ऊपर की ओर उठा
लेना चाहिए ॥ ७१ ॥
कुन्तल³कुण्डलाङ्गदगण्डाश्रयं⁴संश्रयेऽभिनये ।
गर्वेऽहमिति ललाटे रिपुनिर्देशे तथैव च क्रोधे ॥ ७२ ॥
इसी मुद्रा को यदि कम्पित रखा जाए तो उससे क्रोध, स्वेद, केश (कुन्तल),
कुण्डल, अङ्गद तथा गण्डस्थल का सजाना बतलाया जाता है तथा ललाट
पर रखने से गर्व क्रोध तथा शत्रु का निर्देश सूचित होता है ॥ ७२ ॥
कोऽसाविति निर्देशे⁵ च कर्णकण्डूयने चैव ।
संयुक्ता संयोगे कार्या विश्लेषिता वियोगे च ॥ ७३ ॥
कलहे स्वस्तिकयुक्ता परस्परोत्पीडिता बन्धे ।
द्वाभ्यान्तु वाम⁶पार्श्वे दक्षिणतो दिननिशावसानानि ॥ ७४ ॥
अभिमुखपराङ्मुखीभ्यां विश्लिष्टाभ्यां प्रयुञ्जीत ।
इसी मुद्रा से कौन हैं ? इस प्रश्न को करने तथा कानों के खुजलाने
का अर्थ सूचित करना हो तो ललाट प्रदेश के समीप तर्जनी को रखना
चाहिए । दोनों हाथों को सूचीमुख मुद्रा में मिलाने से संयोग तथा हटा
लेने पर वियोग सूचित होता है । यदि दोनों हाथों को 'स्वस्तिक' कर ले
तो उससे पारस्परिक कलह तथा दोनों सूचीमुख हाथ एक दूसरे के सम्मुख
रखकर फिर बायीं ओर ( अलग ) ले जाए तो उससे रात्रि की समाप्ति
( शयन से उठना ) सूचित होती है ॥ ७३-७४ ॥
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