नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः ५७
योजना—इसके द्वारा अनेकविध छोटे-छोटे (सुपारी, बेर इत्यादि)
फलों तथा स्त्रियों के रोषपूर्णवचनों को अंगुली के आक्षेप (घुमाने) के द्वारा
प्रदर्शित किया जाता है ॥ ८७ ॥
[ मरकतवैडूर्यादेः प्रदर्शनं सुमनसाञ्च कर्तव्यम् ।
ग्राह्यं विडालपदमिति तज्ज्ञैरेवं प्रयोगेषु ॥ ]
(प्रक्षिप्त—मरकत वैडूर्य आदि मणि, पुष्पों का ग्रहण तथा बिल्ली का
बैठने आदि का स्थान भी इसी के द्वारा प्रदर्शित किया जाए ।)
१अलपल्लव (अलपद्मक)
आवर्तिताः२ करतले यस्याङ्गुल्यो भवन्ति हि ।
पार्श्वगत-विकीर्णाश्च स भवेदल३पल्लवः ॥ ८८ ॥
यदि सारी अंगुलियां हथेली में गोल आकार में सिकुड़ी हुई तथा
बिखरी हुई रखी जाए तो 'अलपल्लव' मुद्रा कहलाती है ॥ ८८ ॥
प्रतिषेधकृते योज्यः कस्य त्वं नास्ति शून्यवचनेषु ।
पुनरात्मोपन्यासः स्त्रीणामेतेन कर्त्तव्यः ॥८९॥
योजना—इसके द्वारा प्रतिषेध, 'तुम कौन हो' जैसे प्रश्नवाक्य, नहीं
हैं, शून्यवचन (मिथ्याधिक्षेप-जैसे मूर्ख, इत्यादिवचन) तथा स्त्रियों के अहम्
का आपादन (स्थापना) या विस्मय का प्रदर्शन किया जाए ॥ ८९ ॥
२चतुर—
तिस्रः प्रसारिता यत्र तथा चोर्ध्वा कनीयसी ।
तासां मध्ये स्थितो४ऽङ्गुष्ठः स करश्चतुरः स्मृतः ॥ ९० ॥
जिसमें तीनों उंगुलियों को सामने फैलाकर तथा कनिष्ठिका को सीधा
१. अलपल्लव (उत्पत्तिकथा) भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा माखन-चोरी करते
समय इसी हस्त का उपयोग करने पर इसका प्रचलन हो गया ।
२. चतुर (उत्पत्तिकथा) काश्यप ऋषि ने इस हस्त का उपयोग अमृत
लाने के लिए जाने वाले गरुड़ को मार्ग-दर्शन करने के अवसर पर किया था ।
तभी से इसका प्रचलन हुआ ।
१. मरकतवैडूर्यादीनां निदर्शनं कार्यम्—ख० ग० ।
२. आवर्तिन्यः—ख० ग० । ३. दलपद्मकः—ग० ।
४. मध्यस्तथाङ्गुष्ठः—ग० ।