नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ नाट्यशास्त्रम्
यदि कटकामुख-मुद्रावाले हाथ की तर्जनी अंगुली फैला दी जाए तो
'सूचीमुख' मुद्रा कहलाती है ॥ ६४ ॥
अस्यों विविधान् योगान् वक्ष्यामि समासतः प्रदेशिन्याः ।
ऊर्ध्व-नत-लोल-कम्पित-विजृम्भितोद्वाहित-चलायाः ॥६५॥
अब मैं संक्षेप से प्रदेशिनी ( तर्जनी ) अंगुली के ऊर्ध्व, नत, लोल
( एक ओर झुकने ), कम्पित ( हिलने ), विजृम्भित ( सिकुड़कर फैलने ),
ऊपर तथा नीचे उठने ( उद्वाहित ) तथा ऊपर की ओर घूमने ( चलने )
की दशा के भेद से इस मुद्रा में होने वाले कार्य बतलाता हूँ ॥ ६५ ॥
चक्रं तटित्पताकामञ्जर्यः कर्णचूलिकाश्चैव ।
कुटिलगतयश्च सर्वे निर्देश्यास्साधुवादाश्च ॥ ६६ ॥
बालोरगपल्लवधूपदीपवल्ली-लताशिखण्डाश्च ।
परिपतनवक्रमण्डलमभिनेयोऽन्यूर्ध्वलोलितया ॥ ६७ ॥
इस मुद्रा में यदि तर्जनी को ऊपर की ओर उठाकर घुमाया जाये तो
इससे चक्र, बिजली, पताका, पुष्पमंजरी, कर्णपूर ( कर्णचूलिका ) सभी प्रकार
की तिरछी रेखाएं ( कुटिलगति ), साधुवाद की ध्वनियां, बाल सर्प,
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