नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः ५५
योजना—इसके द्वारा बिल्व तथा कैथा ( कपित्थ ) फल तथा स्त्रियों
के उरोजों का अर्थ सूचित होता है । यदि इन अंगुलियों के अग्रभाग
सिकुड़े हुए रखे जाए तो ( इससे ) ( किसी वस्तु के ) ग्रहण तथा मांस
की प्राप्ति तथा अनेकविध फल, ( बिल्व तथा कपित्थ के अतिरिक्त )
बीजपूर ( बिजौरा ) तथा मांसखण्ड की सूचना दी जाती है ॥ ७९ ॥
देवार्चनबलिहरणे समुद्गके साग्रपिण्डदाने च ।
कार्यः पुष्पप्रकरश्च पद्मकोशेन हस्तेन ॥ ८० ॥
इस पद्मकोश मुद्रा के द्वारा देवार्चन, बलिप्रदान, डलिया (समुद्गक), प्रथम
पिण्ड प्रदान तथा पुष्पों का विकीर्ण करना प्रदर्शित किया जाता है ॥ ८० ॥
मणिबन्धनश्लिष्टप्रविरलचलिताङ्गुलिकराभ्याम् ।
कार्यो विवर्त्तिताभ्यां विकसितकमलोत्पलाभिनयः ॥८१॥
यदि पद्मकोष मुद्रावाले दोनों हाथों को कलाई से मिलाते हुए
पीछे की ओर ले जाए तथा अंगुलियों की हिलती हुई रखे तो उससे
विकसितकमल तथा कुमुदिनी का अर्थ प्रदर्शित होता है ॥ ८१ ॥
'सर्पशीर्ष—
अङ्गुल्यस्संहतास्सर्वाः सहाङ्गुष्ठेन यस्य तु ।
तथा निम्नतलश्चैव स तु सर्पशिराः करः ॥ ८२ ॥
यदि सभी अंगुलियां अंगूठे सहित एक दूसरे से मिली हुई हों और
हथेली झुकी ( या गहरी ) रखी जाए तो ( सर्प के फन के समान हो
जाने के कारण ) सर्पशीर्ष हस्त बन जाता है ॥ ८२ ॥
एष सलिलप्रदाने भुजगगतौ तोयसेचने चैव ।
आस्फोटने च योज्यः करिकुम्भास्फालनाद्येषु ॥ ८३ ॥
योजना—पितरों को जलांजलि देने, सर्पगति, जल सिंचन, मल्लयुद्ध
१. सर्पशीर्ष ( उत्पत्तिकथा ) भगवान विष्णु ने वामन अवतार में बलि
को बन्धन तथा देवगण की रक्षार्थ वचन देते हुए उन कार्यों का इसी हस्त द्वारा
संकेत किया था । तभी से इस मुद्रा का प्रचलन हुआ ।
१. सङ्ग्रहे चात्र—ग० ।
२. मणिबन्धनश्लिष्टाभ्याम विरलचलिताङ्गुलीयुतकराभ्याम्—ख० ग० ।
३. कार्योपवर्तिताभ्यां—ख-ग० । ४. सहिताः—ग० ।
५. सर्वशिराः—ख० ग० ।