नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ नाट्यशास्त्रम्
द्वाभ्यां प्रदर्शयेन्नित्यं सम्पूर्णं चन्द्रमण्डलम् ।
श्लिष्टा ललाटे शक्रस्य कार्या ह्युत्तानसंश्रया ॥ ७५ ॥
यदि दो सूचीमुख हस्त हों तो उससे सम्पूर्ण चन्द्रमण्डल का तथा
यदि ललाट के समीप खड़ी स्थित हो तो उससे इन्द्र का उत्कर्ष बतलाया
जाता है ॥ ७५ ॥
पुनरपि च भ्रमिताग्रा रूपशिलावर्तयन्त्रशैलेषु ।
परिवेषणे तथैव हि कार्या चाधोमुखी नित्यम् ॥ ७६ ॥
यदि सूचीमुख हस्त को गोल घुमाव दे दिया जाए तो इससे स्वरूप,
शिला, भँवर ( आवर्त्त ), यन्त्र तथा शैल ( शिखर ) बतलाए जाते हैं, यदि
इसी मुद्रा में हाथों को नीचे मुँह किये रखा जाए तो उससे भोजन
परोसना प्रदर्शित होता है ॥ ७७ ॥
श्लिष्टा ललाटपट्टेष्बधोमुखी शम्भु³रूपणे कार्या ।
शक्रस्याप्युत्ताना तज्ज्ञैस्तिर्यक्स्थिता कार्या ॥ ७७ ॥
यदि ललाट के पास नीचा मुँह रखते हुए इसी मुद्रावाले हाथ को रखा
जाए तो उससे 'शिव' का ( त्रिनेत्र- ) स्वरूप तथा यदि ऊपर की ओर मुँह
रखकर तिरछा कर लिया जाए तो 'इन्द्र' का ( सहस्र नेत्रोंवाला ) स्वरूप
प्रदर्शित हो जाता है ॥ ७७ ॥
'पद्मकोषः—
यस्याङ्गुल्यस्तु विरलाः सहाङ्गुष्ठेन कुञ्चिताः ।
ऊर्ध्वा ह्यसङ्गताग्राश्च स भवेत् पद्मकोषकः ॥ ७८ ॥
यदि अंगूठे सहित सभी उंगलियां ऊपर की ओर मुँह वाली अलग-
अलग तथा सिकुड़ी हुई रखी जाए तो 'पद्मकोष' हस्त हो जाता है ॥७८॥
बिल्वकपित्थफलानां ग्रहणं कुचदर्शनञ्च नारीणाम् ।
ग्रहणे ह्यामिषलाभे भवन्ति ताः कुञ्चिताग्रास्तु ॥७९॥
[ बहुजातिबीजपूरकमामिषखण्डञ्च निर्देिश्यम् । ]
१. पद्मकोषः ( उत्पत्ति कथा ) भगवान विष्णु¹ने सुदर्शन चक्र की प्राप्ति के
लिए भगवान शिव की स्तुति तथा पद्म पुष्पों के अर्पण हेतु इसी हस्त का
उपयोग किया । तभी से इसका प्रचलन हुआ ।
१. द्वाभ्यां सन्दश्ये—ख० ग० । २. चाधोमुखी नित्या—ख० ग० ।
३. शम्भुरूपेण—ग० । ४. शक्रस्याभ्युत्थानात्—ख० ग० ।