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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 668 में से

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पृष्ठ 170

नवमोऽध्यायः ५९
( रति ), प्रभा ( रुचि ), स्मृति, बुद्धि, तर्क (ऊहापोहात्मक-कार्य-विभावन)
क्षमा, पुष्टि, संकेत ( संज्ञामात्र ), प्रणय, विचार, मिलन, पवित्रता,
चातुर्य, माधुर्य, दाक्षिण्य, मार्दव, सुख, चरित्र ( शील ), प्रश्न, वार्ता
( कथा या अर्थशास्त्र ), युक्ति, वेशस्थान या वेशरचना, कोमलघास,
अल्पपरिमाण, समृद्धिशालिता तथा समृद्धिहीनता, सुरतकर्म, गुण तथा
अवगुण, यौवन, गृह पत्नी तथा अनेकविध रंगों को भी बतलाया
जाता है ॥ ९४-९७ ॥
सितमूर्ध्वेन तु कुर्याद्रक्तं पीतञ्च मण्डलैःकृतेन ।
परिमृदितेन तु नीलं वर्णांश्चतुरेण हस्तेन ॥ ९८ ॥
इस चतुरहस्त द्वारा रंगों को बतलाने में—ऊपर की ओर हाथ को
उठाकर श्वेत वर्ण, गोल घुमाव द्वारा रक्त और पीत वर्ण तथा एक हाथ से
दूसरे हाथ को दबाकर ( परिमृदित ) नीलवर्ण बतलाया जाए ॥ ९८ ॥
भ्रमर:१—
मध्यमाङ्गुष्ठसन्दंशे वक्रो२ चैव प्रदेशिनी ।
ऊर्ध्वमन्ये प्रकीर्णे च द्वयङ्गुल्यौ३ भ्रमरे करे ॥ ९९ ॥
यदि मध्यमा उंगली और अंगूठे को एक दूसरे से मिलाकर उंगली को
टेढ़ी कर ले तथा शेष दो उंगलियां उपर की ओर फैला दी जाएँ तो 'भ्रमर'
हस्त कहलाता है ॥ ९९ ॥
पद्मोत्पलकुमुदानामन्येषाञ्चैव दीर्घवृन्तानाम् ।
पुष्पाणां ग्रहणविधिः कर्त्तव्यः कर्णपूरश्च ॥ १००॥
योजना—इसके द्वारा कमल, कुमुदिनी तथा अन्य लम्बे डण्ठल या
टहनी वाले पुष्पों का चयन और कर्णकुण्डल को बतलाया जाता है ॥१००॥
विच्युतश्च४ सशब्दश्च कार्यों निर्भर्त्सनादिषु ।
बलालापे च शीघ्रे च ताले विश्‍वासने तथा ॥ १०१ ॥
इस हस्त-मुद्रा वाले हाथ को कुछ शब्द करते हुए नीचे झुकाया जाए
तो डांटना ( निर्भर्त्सन ) बलशीलता का गर्व ( बलालाप ) बतलाना,
शीघ्रता, ताल देना तथा विश्वास करने का अर्थ प्रकट होता है ॥ १०१ ॥
१. भ्रमर : ( उत्पत्तिकथा ) देवों की माता अदिति के कर्णकुण्डल बनाने के
लिए काश्यपऋषि ने इस मुद्रा का प्रयोग किया था। तभी से इसका प्रचलन हुआ।
१. मण्डलकरेण—ग०। २. वक्रे—ग०।
३. द्वाङ्गुलौ—ग०। ४. विद्युत्तश्च सहजश्च—ग०।