नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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में जंघा तथा भुजाओं के ठोकने और हाथी के कुम्भस्थल को थपथपाने
का इस मुद्रा से प्रदर्शन किया जाता है ॥ ८३ ॥
१मृगशीर्ष—
अधोमुखीनां सर्वासामङ्गुलीनां समागमः ।
कनिष्ठाङ्गुष्ठकावूर्ध्वौ स भवेन्मृगशीर्षकः ॥ ८४ ॥
यदि कनिष्ठिका अंगुली तथा अंगूठे को सीधा और शेष अंगुलियाँ
झुके हुए मुंह वाली रखी जाएँ तो 'मृगशीर्ष' हस्त होता है ॥ ८४ ॥
इह साम्प्रतमस्त्यद्य च शक्ते१श्चोल्लासनेऽक्षपाते च ।
स्वेदापमार्जनेषु च कुट्टमिते प्रचलितं२स्तु भवेत् ॥८५॥
योजना—इसके द्वारा यहां, अभी, यह है, आज जैसे अर्थ का सूचन,
शक्ति के उठाने तथा पासों के फेंकने को प्रदर्शित करते हैं । यदि इसी मुद्रा
में हाथ धूजता हुए रखा जाए तो उससे पसीने का पोंछना तथा स्त्रियों
की कुट्टमित चेष्टा को बतलाया जाता है ॥ ८५ ॥
२कंगुल—
त्रेताग्निसंस्थिता मध्यात्तर्जन्यङ्गुष्ठका यदा ।
काँ३ङ्गुलेऽनामिका वक्रा तथा चोर्ध्वा कनीयसी ॥ ८६ ॥
यदि मध्या, तर्जनी तथा अंगूठे पृथक्-पृथक् रहें, अनामिका उंगली
टेढ़ी तथा कनिष्ठिका खड़ी रहे तो 'कंगुल' हस्त मुद्रा होती है ॥ ८६ ॥
एतेन तरुणफलरूपाणानि नानाविधानि च ल४घूनि ।
कार्याणि रोषजानि स्त्रीवचनान्यङ्गुलिक्षेपैः ॥८७॥
१. मृगशीर्ष ( उत्पत्तिकथा ) भगवान शिव की प्राप्ति के लिए पार्वती ने
तपस्या करते हुए अपने ललाट पर तीन चन्दन-रेखाओं का त्रिपुण्ड्र इसी हस्त
द्वारा धारण किया । तभी से इसका प्रचलन हुआ ।
२. कंगुल ( उत्पत्तिकथा ) भगवान शिव ने क्षीरसागरमन्थन के अवसर
पर उसमें से निकले हुए कालकूट विष की गुटिका बनाकर पीने के लिए इसी
हस्त का उपयोग किया था । तभी से इसका प्रचलन हुआ ।
१. शक्यश्चेञ्चालने—ख० ग० । २. प्रचलिते तु—ख० ग० ।
३. अङ्गुले—ख० ग० । ४. लघूनि कार्याणि—ग० ।
५. रोषजातिस्त्री—ग० ।