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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 668 में से

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पृष्ठ 171

६० नाट्यशास्त्रम्
१हंसास्य—
तर्जनीमध्यमाङ्गुष्ठास्त्रेताग्निसंस्था निरन्तराः ।
भवेयुर्हंसवक्त्रस्य शेषे द्वे सम्प्रसारिते ॥ १०२ ॥
यदि तर्जनी तथा मध्यमा उंगली अंगूठे के अग्रभाग पर हो तथा
अन्य (दो) उंगलियाँ फैली हुई रहें तो 'हंसास्य' हस्त होता है ॥ १०२ ॥
श्लक्ष्णाल्पशिथिललाघवनिस्सारार्थे मृदुत्वयोगे च ।
कार्योंऽभिनयविशेषः किञ्चित् प्रस्पन्दिताग्रेण ॥१०३॥
योजना—इस (मुद्रा-युक्त) हस्त के अग्रभाग को कुछ धुजाते हुए
रखने पर इसके द्वारा स्निग्ध, अल्प, शिथिल, लाघव, निस्सारवस्तु
(या निष्क्रमण) तथा मृदुत्व का अर्थ प्रकट होता है ॥ १०३ ॥
२हंसपक्ष—
समाः प्रसारितास्तिस्रस्तथा चोर्ध्वा कनीयसी ।
अङ्गुष्ठः कुञ्चितश्चैव हंसपक्ष इति स्मृतः ॥ १०४ ॥
यदि तीन उंगलिया फैली हुई (तथा) कनीयसी उंगली सीधी तथा
ऊपर उठी हुई और अंगूठा सिकुड़ा हुआ हो तो 'हंसपक्ष' हस्त
हो जाता है ॥ १०४ ॥
एषं च सलिलनिवापे दातव्ये गण्डसंश्रये चैव ।
कार्यः प्रतिग्रहाचमनभोजनार्थेषु विप्राणाम् ॥ १०५ ॥
आलिङ्गने महास्तम्भैदर्शने रोमहर्षणे चैव ।
स्पर्शोऽनुलेपनार्थे योज्यः संवाहने चैव ॥ १०६ ॥
पुनरेष च नारीणां स्तनान्तरस्थेन विभ्रमविशेषाः ।
कार्या यथारसं स्युर्दुःखे हनुधारणे चैव ॥ १०७ ॥
१. हंसास्य (उत्पत्तिकथा) दक्षिणामूर्ति शिव ने ऋषिगण को तत्त्वविद्या
को उपदेश करने के अवसर पर न्यग्रोधवृक्ष के नीचे बैठते हुए इसी हस्त का
उपयोग किया । तभी से इस मुद्रा का प्रचलन हुआ ।
२. हंसपक्षः (उत्पत्तिकथा) ताण्डवनृत्य के प्रदर्शन के समय तण्डु द्वारा
इसी मुद्रा का उपयोग हुआ । तभी से इसका प्रचलन हुआ ।
१. प्रस्यन्दिताग्रेण—ग० । २. एष विधिर्निवापसलिले—ग० ।
३. गन्धसंश्रये—ग० । ४. प्रतिग्रहावमान—ग० ।
५. महास्तम्भनिदर्शने—ग० । ६. यथा रसा स्युः-ख, यथारसं स्यात्-ग० ।