नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
नवमोऽध्यायः ३९
गजदन्तोऽवहित्थश्च वर्धमानस्तथैव च।
एते तु संयुता हस्ता मया प्रोक्तास्त्रयोदश ॥ १० ॥
असंयुक्त हस्तमुद्राएं २४ हैं। जिनके नाम हैं—( १ ) पताक, ( २ )
यहाँ केवल उनकी मुद्रा, जाति, वर्ण तथा देवता दिये जा रहे हैं। प्रत्येक मुद्रा की
उत्पत्तिकथा उस मुद्रा के लक्षण के नीचे पाद टिप्पणी में दे दी गई है तथा इसी
कारण इस अध्याय में टिप्पणियाँ भी संक्षिप्त ही रखी हैं।
मुद्रानाम देवता जाति वर्णं
( १ ) पताक ब्रह्मा ब्राह्मण श्वेत
( २ ) त्रिपताक शिव क्षत्रिय रक्त
( ३ ) कतरीमुख चक्रपाणि-विष्णु क्षत्रिय ताम्र
( ४ ) अर्धचन्द्र महादेव वैश्य धूम्र
( ५ ) अराल वासुदेव मिश्र रक्त
( ६ ) शुकतुण्ड मरीचि ब्राह्मण रक्त
( ७ ) मुष्टि चन्द्र शूद्र नील
( ८ ) शिखर कामदेव गान्धर्व धूलियाँ
( ९ ) कपित्थ पद्मगर्भ-विष्णु ऋषि श्वेत
( १० ) कटकामुख रघुराम देव ताम्र
( ११ ) सूचीमुख विश्वकर्मा देव श्वेत
( १२ ) पद्मकोष भार्गव यक्षकिन्नर श्वेत
( १३ ) सर्पशीर्ष शिव देव पीत
( १४ ) मृगशीर्ष महेश्वरशिव ऋषि श्वेत
( १५ ) कंगुल पद्म सिद्ध सुवर्ण
( १६ ) अलपद्म सूर्य गान्धर्व धूलि
( १७ ) चतुर सूर्य मिश्र धूलि
( १८ ) भ्रमर गरुड मिश्र घन (काला)
( १९ ) हंसास्य ब्रह्मा मिश्र श्वेत
( २० ) हंसपक्ष कामदेव अप्सरा नील
( २१ ) सन्दंश वाल्मीकि विद्याधर श्वेत
( २२ ) मुकुल चन्द्र संकीर्ण श्वेत
( २३ ) ऊर्णनाभ इन्द्र देव श्वेत
( २४ ) ताम्रचूड कूर्मावतार क्षत्रिय रक्त
४० नाट्यशास्त्रम्
त्रिपताक, ( ३ ) कर्तरीमुख, ( ४ ) अर्धचन्द्र, ( ५ ) अराल, ( ६ ) शुकतुण्ड,
( ७ ) मुष्टि, ( ८ ) शिखर, ( ९ ) कपित्थ, ( १० ) कटकामुख, ( ११ ) सूच्यास्य,
( सूचीमुख ), ( १२ ) पद्मकोष, ( १३ ) सर्पशीर्ष, ( १४ ) मृगशीर्ष, ( १५ )
कांगुल, ( १६ ) अलपद्म, ( १७ ) चतुर, ( १८ ) भ्रमर, ( १९ ) हंसास्य,
( २० ) हंसपक्ष, ( २१ ) सन्दंश, ( २२ ) मुकुल, ( २३ ) ऊर्णनाभ तथा
( २४ ) ताम्रचूर्ण ।
संयुक्त हस्तमुद्राएं तेरह हैं। जिनके नाम हैं—( १ ) अंजलि, ( २ )
कपोत, ( ३ ) कर्कट, ( ४ ) स्वस्तिक, ( ५ ) कटकावर्धमानक, ( ६ ) उत्संग,
( ७ ) निषध, ( ८ ) दोला, ( ९ ) पुष्पपुट, ( १० ) मकर, ( ११ ) गजदन्त,
( १२ ) अवहित्थ तथा ( १३ ) वर्धमान ॥ ४-१० ॥
नृत्तहस्तानतश्चोध्र्वं गदतो मे निबोधत ।
चतुरस्रौ तथोद्वृत्तौ तथा तलमुखौ स्मृतौ ॥ ११ ॥
स्वस्तिकौ विप्रकीर्णौ चाप्यरालकटकामुखौ ।
आविद्धवक्रौ सूच्यास्यौ रेचितावर्द्धरेचितौ ॥ १२ ॥
उत्तानवञ्चितौ चैव पल्लवौ च तथा करौ ।
नितम्बौवापि विज्ञेयौ केशबन्धौ तथैव च ॥ १३ ॥
लतारख्यौ च तथा प्रोक्तौ करिहस्तौ तथैव च ।
पक्षवञ्चितकौ चैव पक्षप्रद्योतकौ तथा ।
ज्ञेयौ गरुडपक्षौ च दण्डपक्षकावतः परम् ॥ १४ ॥
ऊर्ध्वमण्डलिनौ चैव पार्श्वमण्डलिनौ तथा ।
उरोमण्डलिनौ चैव उरःपार्श्वार्धमण्डलौ ॥ १५ ॥
मुष्टिकस्वस्तिकौ चापि नलिनीपद्मकोशकौ ।
अलंपल्लवोल्बणौ च ललितौ वलितौ तथा ॥ १६ ॥
अब मैं नृत्तहस्त बतलाता हूँ। इन नृत्तहस्तों के ३० प्रकार हैं—
( १ ) चतुरस्र, ( २ ) उद्वृत्त, ( ३ ) तलमुख, ( ४ ) स्वस्तिक, ( ५ )
विप्रकीर्ण, ( ६ ) अरालकटकामुख, ( ७ ) आविद्धवक्र, ( ८ ) सूच्यास्य,
१. प्यारालखटकामुखौ—क०-ख० । २. अविद्धव—ख० ।
३. उत्तानावाञ्चितौ—ख०-ग० । ४. नितम्बौ चापि—ग० ।
५. सम्प्रोक्तौ करिहस्तौ च लतारख्यौ च तथैव च—ग० ।
६. हंसपक्षौ तथैव च—ख०, ग० । ७. मण्डले—ख०, ग० ।
८. मुष्टिकः स्वस्तिकश्चापि—ख० । ९. अलपद्मौल्बणौ चापि—ग० ।
नवमोऽध्यायः ४१
(९) रेचित, (१०) अर्धरेचित, (११) उत्तानवञ्चित, (१२) पल्लव,
(१३) नितम्ब, (१४) केशबन्ध, (१५) लता, (१६) करिहस्त,
(१७) पक्षवंचितक, (१८) पक्षप्रद्योतक, (१९) गरुड़पक्ष, (२०) दण्डपक्ष,
(२१) ऊर्ध्वमण्डलिन्, (२२) पार्श्वमण्डलिन् (२३) उरोमण्डली,
(२४) उरःपार्श्वमण्डली, (२५) मुष्टिकस्वस्तिक, (२६) नलिनीपद्मकोष,
(२७) अलपल्लव, (२८) उल्बण, (२९) ललित, तथा (३०)
वलित ॥ ११-१६ ॥
चतुष्षष्टिकरा ह्येते नामतोऽभिहिता मया ।
यथालक्षणमेतेषां कर्माणि च निबोधत ॥ १७ ॥
इस प्रकार मैंने चौसठ हस्तमुद्राओं के नाम बतलाए । अब मैं इनके
लक्षणों तथा तदनुरूप कर्मों को बतलाता हूँ ॥ १७ ॥
असंयुत—हस्तमुद्राएं ( लक्षण तथा योजना )—
पताक—
प्र²सारिताः समाः सर्वाः यस्याङ्गुल्यो³ भवन्ति हि ।
कुञ्चितश्च तथाङ्गुष्ठः स पताक इति स्मृतः ॥ १८ ॥
सभी उंगलियों को फैलाकर यदि अंगूठे की तिरछा (कुञ्चित) कर दे
और उसे तर्जनी के मूल में लगा दे तो ‘पताक’ हस्त-मुद्रा होती है ॥१८॥
एष प्रहारपाते प्र⁴तापने नोदने प्रहर्षे च ।
गर्वे⁵ऽप्यहमिति तज्ज्ञैर्ललाटदेशोत्थितः कार्यः ॥ १९ ॥
योजना—प्रहार (चोट) करने, (शीतनिवारण हेतु आग)
तापने, प्रेरणा देने, हर्ष तथा गर्व बतलाने में पताकमुद्रायुक्त हाथ को
ललाट प्रदेश से उठाते हुए रखना चाहिए ॥ १९ ॥
१. पताक—(उत्पत्ति कथा)—यह मुद्रा प्राचीन मूर्तियों में अभय मुद्रा के
रूप में दिखाई देती है। शास्त्र में इस मुद्रा के स्रष्टा ब्रह्मा जी हैं। एक बार सृष्टि
के उत्पादक ब्रह्मा परब्रह्म (विष्णु) के समीप गये तथा जय घोष के साथ उनकी
वन्दना की। इस समय उनके हाथ ने सहसा पताक (ध्वज) के आकार को
धारण कर लिया, तभी से इसकी पताक हस्त के रूप में प्रसिद्धि है।
१. अथ लक्षणमेतेषां—ग०। २. प्रसारिताग्राः सहिताः—ख०, ग०।
३. यस्याङ्गुल्यौ—क०। ४. प्रकोपने—क०।
५. गर्वेष्वह—क०।
४२ नाट्यशास्त्रम्
एषोऽग्निवर्षधारानिरूपणे पुष्पवृष्टिपतने च ।
संयुक्तकरणः कार्यः प्रविरलचलिताङ्गुलीर्हस्तः ॥ २० ॥
यदि पताक-मुद्रा-युक्त दोनों हाथों को रखकर अंगुलियों को घुमाए तो
उनके द्वारा वर्षा, पुष्पवृष्टि और (उग्रकम्पन द्वारा) अग्नि की ताप (या
ज्वालाएँ) बतलाई जाती है ॥ २० ॥
स्वस्तिकविच्युतिकरणात् पल्लैवपुष्पोपहारशष्पाणि ।
विरचितमुर्वीसंस्थं यद्द्द्रव्यं तच्च निर्दिश्यम् ॥ २१ ॥
यदि पताक मुद्रा वाले दोनों हाथों से स्वस्तिक करते हुए उसे हटा
लिया जाए तो उसके द्वारा पल्लव एवं पुष्पों का उपहार, लहलहाता घास
तथा पृथ्वी पर स्थित किये हुए (बलि आदि) पदार्थों को बतलाया जाता
है ॥ २१ ॥
स्वस्तिकविच्युतिकरणात् पुनरेवाधोमुखेन कर्तव्यम् ।
संवृतविवृतं पाल्यं छन्नं निबिडञ्च गोप्यञ्च ॥ २२ ॥
यदि हाथों को स्वस्तिक
नवमोऽध्यायः ४३
ऊँचाई (प्रांशु) (मृदङ्ग या) ढोल का पीटना तथा पक्षी का उड़ना (पक्षियों
द्वारा पंखों को फड़फड़ाना या ऊपर उठाना ) बतलाया जाता है ॥ २४ ॥
परिघृष्टतलस्थेन तु धौतं मुदितं प्रमृष्टपिष्टे च ।
पुनरेव शैलधारणमुद्घाटनमेव चाभिनयेत्² ॥ २५ ॥
इसी मुद्रा में यदि दोनों हाथों को परस्पर मसला जाए तो उनके द्वारा
धोना, मसलना, मांजना, गूथना, पीसना, पर्वत को उठाना या उखाड़ना
आदि भाव बतलाया जाता है ॥ २५ ॥
एवमेष³ प्रयोक्तव्यः स्त्रीपुंसाभिनये करः ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि त्रिपताकस्य लक्षणम् ॥ २६ ॥
स्त्री तथा पुरुष पात्र के द्वारा इसी प्रकार इस मुद्रा का प्रयोग किया
जाए । अब मैं 'त्रिपताक' मुद्रा का लक्षण कहता हूँ ॥ २६ ॥
'त्रिपताक—
पताके तु यदा वक्रानामिका त्वङ्गुलिर्भवेत् ।
त्रिपताक
४४ नाट्यशास्त्रम्
प्रवेश, उत्नामन (ऊपर चढ़ाना), प्रणाम, तुलना करना (निदर्शन),
वैकल्पिक-कथन (विविध-वचन) मांगलिक वस्तुओं का स्पर्श तथा मस्तक
पर धारण, पगड़ी या मुकुट का धारण तथा नासिका, मुख एवं कानों का
ढकना बतलाया जाता है ॥ २८-२९ ॥
अस्यैव चाङ्गुलीभ्यामधोमुखप्रस्थितोत्थितचलाभ्याम् ।
लघुखगपतनस्रोतोभुजङ्गभ्रमरादिकान् कुर्यात् ॥ ३० ॥
यदि इसी मुद्रा से युक्त दोनों हाथों को नीचे की ओर जाने तथा ऊपर
उठने वाली अंगुलियों वाला रखे तो इनके द्वारा छोटे पक्षियों का पतन,
स्रोत, सर्प तथा भ्रमर आदि बतलाए जाते हैं ॥ ३० ॥
अश्रुप्रमार्जनं तिलकविरचनं रोचनालभनकञ्च ।
५त्रिपताकानामिकयोः स्पर्शनमलकस्य कर्तव्यम् ॥ ३१ ॥
त्रिपताकमुद्रावाले हाथ में अनामिका के स्पर्श द्वारा आंसुओं का
पोंछना, तिलक करना, गोरोचना का तिलक आदि के लिए ग्रहण करना,
पत्रलेखा रचना (जो कि भुजाओं तथा वक्षःस्थल पर की जाती है) और
अलक स्पर्श बतलाया जाता है ॥ ३१ ॥
स्वस्तिकौ त्रिपताकौ तु गुरूणां पादैर्वन्दने ।
परस्पराग्रसंश्लिष्टौ कार्यावुद्वाहदर्शने ॥ ३२ ॥
यदि त्रिपताक हाथ स्वस्तिक दशा में रहें तो उससे गुरुजन के चरण-
स्पर्श तथा स्वस्तिक दशा युक्त होकर एक दूसरे के कोनों को छूते हों तो
उससे विवाह बतलाया जाता है ॥ ३२ ॥
वियुतौ चलितावस्थौ कर्तव्यौ नृपदर्शने ।
तिर्यक्स्वस्तिकसम्बद्धौ स्यातां तौ ग्रहदर्शने ॥ ३३ ॥
यदि इसी अवस्था वाले हाथ एक दूसरे से हटते हुए तथा धूजते हुए
१. मुखप्रस्थितौ—ग० ।
२. लघुवटपवन—क, लघुमुखपवनस्रोतो—ख० । लघुचटपवन—ग० ।
३. भुजगतभ्रमणादिकान्—ग० ।
४ अश्रुप्रमार्जनतिलकविरोचनलोचनालभनकं च—ग० ।
५. त्रिपताकानामिकया दर्शनमलकस्य कार्यञ्च—ग० ।
६. 'स्वस्तिकौ त्रिपताकावि'त्यारभ्य 'याने नृणां प्रयोक्तभि'रित्यन्तं श्लोकषट्कं
ग—पुस्तके नास्ति । ७. वन्दनम्—ख० ।
नवमोऽध्यायः ४५
रखे जाएँ तो उनके द्वारा राजा का दर्शन बतलाते हैं और यदि ये स्वस्तिक दशा
में तिरछे रखें जाएं तो इनके द्वारा 'ग्रहों' के दर्शन बतलाए जाते हैं ॥३३॥
तपस्विदर्शने कार्यावूर्ध्वौ चापि पराङ्मुखौ ।
परस्पराभिमुखौ च कर्तव्यौ द्वारदर्शने ॥ ३४ ॥
यदि त्रिपताक मुद्रावाले हाथ ऊपर की ओर उठे तथा उनको फिर पीछे
की ओर रखा जाए तो उससे तपस्विजन का दर्शन बतलाया जाता हैं।
और यदि ये ही हाथ एक दूसरे के सम्मुख रखें जाए तो उनसे द्वार का
स्वरूप या दर्शन बतलाया जाता है ॥ ३४ ॥
उत्तानाधोमुखौ कार्यावग्रे वक्त्रस्य संस्थितौ ।
वडवानलसङ्ग्रामे मकराणाञ्च दर्शने ॥ ३५ ॥
यदि ये ही हाथ एक दूसरे के सम्मुख रखकर फिर (उंगुलियों को
हिलाते हुए) नीचे की ओर मुंह वाले (मिलाकर) किये जाएँ तो उससे
बडवानल, संग्राम तथा मकर की अभिव्यक्ति होती है ॥ ३५ ॥
अभिनेयास्त्वनेनैव वानरप्लवनोर्मयः ।
पवनश्च स्त्रियश्चैव नाट्ये नाट्यविचक्षणैः ॥ ३६ ॥
और नाट्यविद् आचार्यों के मत में इसी हस्तमुद्रा के द्वारा वानर का
उछलना, लहरें, पवन तथा स्त्रियों को भी बतलाया जाता है ॥ ३६ ॥
सम्मुखँप्रसृताङ्गुष्ठः कार्यों बालेन्दुदर्शने ।
पराङ्मुखस्तु कर्तव्यो याने नृणां प्रयोक्तृभिः ॥ ३७ ॥
यदि इसी मुद्रावाले हाथ को सम्मुख रखते हुए अँगूठे को फैला दे तो
उससे बालचन्द्र तथा यदि इसी हाथ को पीछे की ओर मोड़ लिया जाए तो
उससे (शत्रु के विरुद्ध) राजा की चढ़ाई (यान) बतलाई जाती है ॥ ३७ ॥
१कर्तरीमुख—
त्रिपताके यदा हस्ते भवेत् पृष्ठावलोकिनी ।
तर्जनी मध्यमायाश्च तदासौ कर्तरीमुखः ॥ ३८ ॥
१. कर्तरीमुख (उत्पत्ति कथा) इस हस्त के सृष्टा शिव हैं। जब भगवान
शिव ने अन्धकासुर का उच्छेद करने के लिए इस हस्तमुद्रा में पृथ्वी पर एक
चक्कर लगाया तभी से इसका प्रचलन हो गया।
१. कार्यों चोर्ध्वौ चापि—ख०। २. चैव—ख०। ३. च कुस्य—ख०।
४. सङ्क्रामे ख०। ५. पततश्च—ख०। ६. तन्मुख—ख०।
४६ नाट्यशास्त्रम्
यदि त्रिपताक मुद्रा वाले हाथ में तर्जनी अंगुली मध्यमा के पीछे फैला-
कर रखी जाए (या झुकायी जाए) तो 'कर्तरीमुख' मुद्रा कहलाती है ॥३८॥
पथि¹ चरणरचनरञ्जनरङ्गणकरणान्यधोमुखेनैव ।
ऊर्ध्वमुखेन तु कुर्याद् दष्टं शृङ्गञ्च लेख्यञ्च ॥ ३९ ॥
योजना—यदि कर्तरीमुख मुद्रावाला हाथ नीचे मुंहवाला रखते हुए
रखा जाए तो उसके द्वारा मार्ग में पैर रखना, पैरों को अलंकृत या रंजित
करना, रांगोली रचना करना (रंगण-रंगवल्ली का निर्माण अथवा बालकों का
रेंगना) बतलाया जाता है। यदि ऊंचे मुंह वाला होकर यही हाथ रहे तो
उससे दंशन, शृङ्ग बजाना तथा चित्र लेखन कर्म बतलाया जाता है ॥३९॥
पतनमरणव्यतिक्रमपरिवृत्तवितर्कितं तथा न्यस्तम् ।
भिन्नवलितेन कुर्यात् कर्त्यास्याङ्गुली²मुखेन ॥ ४० ॥
और यदि इसी मुद्रा को नीचे की ओर झुकाया या रखा जाए तथा
अंगुलियां भिन्न २ दिशाओं में घूमने लगे तथा मध्यमांगुलि पीछे की ओर
झुकी रहे तो इसके द्वारा पतन, मरण, अपराध (व्यतिक्रम), पराङ्मुखी
भवन, तर्क करना तथा धरोहर को रखना बतलाया जाता है ॥ ४० ॥
संयु³क्तकरणो वा स्यादसंयुतो वा प्रयुज्यते तज्ज्ञैः ।
रुरु-चमरमहिषसुरगजवृषगोपुरशैलशिखरेषु ॥ ४१ ॥
और यदि दो कर्तरीमुख हस्तोँ या एक कर्तरीमुख हस्त का प्रयोग किया
जाए तो इनके द्वारा रूरूमृग, चमरी गाय, महिष, ऐरावत हाथी, वृषभ,
गोपुर तथा शैलशिखर (जैसे पदार्थ) का भाव प्रदर्शित किया जाता है ॥४१॥
¹अर्धचन्द्रः—
यस्याङ्गुल्यस्तु विनताः सहाङ्गुष्ठेन चाप⁴वत् ।
सोऽर्धचन्द्र इति ख्यातः करः कर्मास्य वक्ष्यते ॥ ४२ ॥
यदि अंगुलियों को अंगूठे सहित धनुष जैसी झुका कर फैला दी जाए
१. अर्धचन्द्र (उत्पत्ति कथा) नटराज शिव ने अलंकार धारण करने की
इच्छा से अर्धचन्द्र को जब मस्तक पर धारण किया तो इसी धारण करने के
समय से इस मुद्रा का उद्भव हुआ।
१. पथिक—ख० । २. स्याङ्गुलीययुग्मेन—ख०, ग० ।
३. एष श्लोकः खपुस्तके नास्ति । ४. चापरम्—ग० ।
नवमोऽध्यायः ४७
तो 'अर्धचन्द्र' मुद्रा कहलाती है। अब मैं इससे होने वाले कार्य बतलाता
हूँ ॥ ४२ ॥
एतेन बालतरवः शशिलेखा कम्बुकलशवलयानि ।
निर्घाटेन¹मायस्तं मध्यौपम्यञ्च पीनञ्च ॥ ४३ ॥
योजना—इसके द्वारा छोटे वृक्ष, चन्द्रलेखा, शंख, कलश, कंकण
(कटक), बाहर ढकेलना (निर्घाटन), परिश्रम (आयस्त), कृशता
(जो कि कटिप्रदेश की तुलना में निर्देशित की जाती हो) तथा पीनता
(मोटाई) बतलाए जाते हैं ॥४३ ॥
रशना²जघनकटीनामाननतलपत्रकुण्डलादीनाम् ।
कर्तव्यो नारीणामभिनययोगोऽर्धचन्द्रेण ॥ ४४ ॥
इस अर्धचन्द्र हस्त के द्वारा स्त्रियों की करधनी (रशना), जंघा,
कटि, चेहरा (आनन), तलपत्र (अलंकार विशेष जो कि कानों में धारण
किया जाता है) तथा कुण्डल का अभिनय प्रस्तुत करना चाहिए ॥ ४४ ॥
अराल¹—
आद्या धनुर्नता³ कार्या कुञ्चितो⁴ऽङ्गुष्ठकस्तथा ।
शेषा भिन्नोर्ध्ववलिता ह्यराले⁵ऽङ्गुलयः करे ॥ ४५ ॥
यदि तर्जनी अंगुली झुकी हुई, अंगूठा (उसे मिलाने को) सिकुड़ा
हुआ तथा शेष उंगलियां उससे पृथक् तथा ऊपर की ओर खड़ी रखी जाए
तो 'अराल' मुद्रा जानों ॥ ४५ ॥
एतेन सत्त्वशौण्डीर्यवीर्यकान्तिधृतिदिव्यगाम्भीर्यम् ।
आशीर्वादाश्च तथा भावा⁶ हितसंज्ञकाः कार्याः ॥ ४६ ॥
योजना—इसके द्वारा सत्व, (स्थैर्य) गर्व, पराक्रम (वीर्य), शोभा
(कान्ति) धृति, दिव्य-वस्तु, गाम्भीर्य, आशीर्वाद देना तथा इसी प्रकार
के अन्य सुखप्रद भावों को बतलाया जाता है ॥ ४६ ॥
१. अराल (उत्पत्ति कथा) अगस्त ऋषि ने समुद्रपान के समय इसी मुद्रा
का प्रयोग किया था। तभी से इसका प्रचलन हुआ ।
१ निघटनं—ग० । २. रसना—ग० । ३. धनुर्लता—ख० ।
४. कुञ्चिता--ख० । ५. ह्यरालाङ्गुलयः स्मृताः--ग० ।
६. भावाभिनयसंज्ञकाः कार्याः-ग० ।
४८ नाट्यशास्त्रम्
एतेन पुनः स्त्रीणां केशानां सङ्ग्रहंस्तथोत्कर्षः ।
सर्वाङ्गिकं तथैव च २ निर्वर्णनमात्मनः कार्यम् ॥ ४७ ॥
कौतुकविवाहयोगैः प्रदक्षिणेनैव सम्प्रयोगश्च ।
अङ्गुल्यग्रस्वस्तिकयोगान्परिमण्डलेनैव ॥ ४८ ॥
प्रादक्षिणयं परिमण्डलञ्च कुर्यान्महाजनश्चैव ।
यच्च महीतलनिहितं द्रव्यं तच्चाभिनेयं स्यात् ॥ ४९ ॥
तथा स्त्रियों का केश सम्मार्जन और उनका फैलाना (उत्कर्षः विकीर्ण-
तापादनम् अभि० भा०) तथा अपने सम्पूर्ण शरीर को ध्यान पूर्वक देखना
दो अराल हस्तो के अंगुलियों के अग्रभागों के स्पर्श द्वारा बतलाया जाए।
इसी में एक थोल घुमाव देने पर विवाह के पूर्व होने वाले भंवरों का
विधान (कौतुक-विवाह योग) तथा दोनों वर वधू के हाथों का
मिलाप बतलाया जाता है और इसी हस्त के द्वारा प्रदक्षिणा, गोल वस्तु
(परिमण्डल), जन कोलाहल तथा पृथ्वी में स्थित वस्तु (या पृथ्वी
पर सजाई गई वस्तुएं) भी बतलाई जाती है ॥ ४७-४९ ॥
आह्वानञ्च निवारणनिर्माणे चाप्यनेकवचः ।
स्वेदस्य चापनयने गन्धाघ्राणे शुभैः शुभे चैव ॥ ५० ॥
तथा किसी व्यक्ति को बुलाना, रोकना, उदय होना, अनेक बातें
बतलाना, (कहना) पसीने का पोंछना मीठी सुगन्ध लेना तथा शुभावह
कार्य भी इसी मुद्रा के द्वारा बतलाए जाते हैं ॥ ५० ॥
त्रिपताकहस्तजानि तु पूर्वे यान्यभिहितानि कर्माणि ।
तानि त्वरालियोगात् स्त्रीभिः सम्यक् प्रयोज्यानि ॥ ५१ ॥
त्रिपताक मुद्रा द्वारा (जिन कार्यों का पहिले प्रदर्शन बतलाया गया
वे सभी कार्य स्त्रियों के द्वारा अराल मुद्रा से भी प्रदर्शित किये जा
सकते हैं ॥ ५१ ॥
१. सङ्ग्रहोत्कर्षौ--ग० । २. निर्वहण--ग० । ३. योगं--ख० ।
४. प्रदक्षिणे नैव सम्प्रयोगश्च--ख०, ग० । ५. यत्र--क० ।
६. आवाहने निवापे निन्दाद्याक्षेपवचने च-ख०; आवाहननिर्वाहणनिर्माणे-
क०, ख० । ७. शुभा चैव हि--ग० ।
८. त्वरानुयोगात्--ख० ।
नवमोऽध्यायः ४९
शुकतुण्डे¹—
अरालस्य यदा वक्रानामिका त्वङ्गुलिर्भवेत् ।
शुकतुण्डस्तु स करः कर्म चास्य निबोधत ॥ ५२ ॥
यदि अरालमुद्रायुक्त हाथ में अनामिका अंगुली को टेढ़ा कर (झुका)
लिया जाए तो 'शुकतुण्ड' मुद्रा बन जाती है ॥ ५२ ॥
एतेन त्वभिनेयं नाहं न त्वं न कृत्यमिति चार्थे ।
आवाहने विसर्गे धिगिति च वचने सावज्ञम् ॥ ५३ ॥
योजना—इसके द्वारा 'मैं इसे नहीं···तुम इसे नहीं तथा यह किये
जाने योग्य नहीं' इन अर्थों को और, आवाहन, बिदाई ( विसर्ग ) तथा
अवज्ञापूर्वक धिक्कारना ( आदि अर्थ ) बतलाए जाते हैं ॥ ५३ ॥
मुष्टि²—
अङ्गुल्यो यस्य हस्तस्य तलम¹ध्येऽग्रसंस्थिताः ।
तासामुपरि चाङ्गुष्ठः स मुष्टिरिति संज्ञितः ॥ ५४ ॥
यदि सारी अंगुलिय । हथेली में बाँध दी जाएँ और अंगूठे को ऊपर
रख ले तो 'मुष्टि' मुद्रा कहलाती है ॥ ५४ ॥
एष प्रहारे व्यायामे निर्गमे पीडने² तथा ।
संवाहनेऽसियष्टीनां दण्डे³कुन्तग्रहे तथा ॥ ५५ ॥
योजना—इसके द्वारा प्रहार, व्यायाम, निर्गम, पीड़न ( किसी पशु
के थन से दूध निकालने ), मिट्टी तथा डण्डे और भाले को ग्रहण करने
( आदि ) का अभिनय किया आता है ।
१. शुकतुण्ड ( उत्पत्ति कथा ) इस मुद्रा की प्रसू गौरी हैं । शंकर के साथ
प्रणय-कलह के समय इसी हस्त का उनके द्वारा उपयोग किया गया था । तभी
से इसका प्रचलन हो गया ।
२. मुष्टि ( उत्पत्ति कथा ) मधुराक्षस के वध के समय भगवान विष्णु ने
इसी मुद्रा का प्रयोग किया था । तभी से इसका प्रचलन हो गया ।
१. तलमाध्यग्रसंस्थिताः—ख० । २. हस्तपीडने—ख० ग० ।
३. कुन्तदण्ड—ग० ।
४ ना० शा० द्वि०
५० नाट्यशास्त्रम्
शिखरे—
अस्यैव च यदा मुष्टेरूर्ध्वोऽङ्गुष्ठः प्रयुज्यते ।
हस्तः स शिखरो नाम तदा ज्ञेयः प्रयोक्तृभिः ॥ ५६ ॥
यदि मुष्टि हस्त में अंगूठे को ऊपर सीधा उठा लिया जाए तो 'शिखर'
मुद्रा कहलाती है ॥ ५६ ॥
रश्मिकुशाङ्कुशधनुषां तोमरशक्तिप्रमोक्षणे चैव ।
अधरोष्ठपादरञ्जनमलके²भ्योत्क्षेपणे चैव ॥ ५७ ॥
योजना—( धनुष की ) डोरी, दर्भ, अंकुश, धनुष इत्यादि धारण करने,
शक्ति और तोमर अस्त्र को छोड़ने, ओष्ठ ( अधरोष्ठ ) तथा पैरों को रंगने
तथा बालों को झाड़ने ( या कंघा करने ) का इस मुद्रा द्वारा अर्थ सूचित
होता है ॥ ५७ ॥
कपित्थे—
अस्यैव शिखराख्यस्य पृष्ठे³ङ्गुष्ठकनिपीडिता ।
यदा⁴ प्रदेशिनी वक्रा स कपित्थस्तदा स्मृतः ॥ ५८ ॥
यदि शिखर हस्त में तर्जनी अंगुली को झुका कर अंगूठे पर दबा कर
रख दी ( मिला दी ) जाए तो 'कपित्थ' मुद्रा कहलाती है ॥ ५८ ॥
असिचापचक्रतोमरकुन्तगदाशक्तिवज्रबाणानि ।
शस्त्राण्यभिनेयानि तु कार्यं पथ्यञ्च सत्यञ्च ॥ ५९ ॥
योजना—तलवार, धनुष, चक्र, तोमर, कुन्त ( भाला ), गदा, शक्ति,
वज्र तथा बाण को छोड़ने और सत्य तथा हितकर ( पथ्य ) कार्य करने
का अर्थ इस मुद्रा के द्वारा सूचित होता है ॥ ५९ ॥
१. शिखर (उत्पत्ति कथा) चन्द्रशेखर शिव द्वारा सुमेरुपर्वत को समुद्रमन्थन के
लिए उखाड़ने में इसी हस्त का उपयोग किया था तभी से इसका प्रचलन हो गया ।
२. कपित्थ ( उत्पत्ति कथा ) समुद्रमन्थन के अवसर पर विष्णु के द्वारा
मन्दारवृक्ष को खींचकर निकालने में इसी हस्त का उपयोग किया गया था ।
तभी से इसका प्रचलन हुआ ।
१. प्रमोक्षणाञ्चैव--ख० ग० ।
२. अलक्तकोत्पीडने चैव--क० । ३. मुखेऽङ्गुष्ठनिपीडिता--ख० ।
४. प्रदेशिनी च वक्रा स्यादिति हस्तः कपित्थकः--क० ।
नवमोऽध्यायः ५१
कटकामुखः—
उत्क्षिप्तवक्रा तु यदानामिका सकनीयसी ।
अस्यैव तु कपित्थस्य तदासौ क(ख)टकामुखः ॥ ६० ॥
यदि कपित्थ हस्त मुद्रा में अनामिका तथा कनिष्ठिका अंगुलियों को
(ऊपर) उठाकर मोड़ा जाए तो 'कटकामुख' मुद्रा कहलाती है ॥ ६० ॥
होत्रं हव्यं छत्रं प्रग्रहपरिकर्षणं व्यजनञ्च ।
आदर्शधारणं खण्डनं तथा पेषणञ्चैव ॥ ६१ ॥
आयतदण्डग्रहणं मुक्ताप्रालम्बसङ्ग्रहश्चैव ।
²स्रग्दामपुष्पमाल(वस्त्रान्तालम्बनञ्चैव ॥ ६२ ॥
³मन्थनशराकर्षणपुष्पाव⁴चयप्रतोदकार्याणि ।
अङ्कुश-रज्ज्वाकर्षण-स्त्रीदर्शनमेव कार्यञ्च ॥ ६३ ॥
योजना—होत्र (होम) हुतद्रव्य, छत्र, रास का खींचना (प्रग्रह-परि-
कर्षण), पंखा, दर्पण धारण, तोडना (पंखों का), पीसना, लम्बे दण्ड-
काष्ठ का ग्रहण, मौक्तिक माला का (मुक्ताप्रालम्ब) सम्हालना, पुष्पमाला
(तथा अन्य मालाओं) का धारण, वस्त्र का कोना थाम लेना (खींचना-
वस्त्रान्तालम्बनम्), मथनी एवं बाण खींचना, पुष्प तोड़ना, चाबुक लगाना,
अंकुश लगाना, रस्सी खींचना तथा स्त्री-चेष्टाओं का दर्शन इस मुद्रा के
द्वारा सूचित किया जाता है ॥ ६१-६३ ॥
⁵सूचीमुखः—
कटकाँख्ये यदा हस्ते तर्जनी सम्प्रसारिता ।
हस्तस्सूचीमुखो नाम तदा ज्ञेयः प्रयोक्तृभिः ॥ ६४ ॥
१. कटका मुख (उत्पत्तिकथा) गुह (कार्तिकेय) ने भगवान शिव से शस्त्र
विद्या ग्रहण करने के अवसर पर इसी हस्त का प्रयोग किया था। तभी से
इसका प्रचलन हो गया।
२. सूचीमुखः (उत्पत्तिकथा) ब्रह्मा ने 'एकोऽहं' को समझाने के लिए इसी
हस्त का प्रयोग किया था। तभी से इसका प्रचलन हुआ।
१. प्रग्रहपरिकर्षणञ्च व्यञ्जनकम्—ख० ।
२. स्रग्दामधारणं खलु वस्त्रा—ख० । ३. मन्थनशरावकर्षण—क, ग।
४. पुष्पापचय—क० । ५. खटका—क० ख० ।
५२ नाट्यशास्त्रम्
यदि कटकामुख-मुद्रावाले हाथ की तर्जनी अंगुली फैला दी जाए तो
'सूचीमुख' मुद्रा कहलाती है ॥ ६४ ॥
अस्यों विविधान् योगान् वक्ष्यामि समासतः प्रदेशिन्याः ।
ऊर्ध्व-नत-लोल-कम्पित-विजृम्भितोद्वाहित-चलायाः ॥६५॥
अब मैं संक्षेप से प्रदेशिनी ( तर्जनी ) अंगुली के ऊर्ध्व, नत, लोल
( एक ओर झुकने ), कम्पित ( हिलने ), विजृम्भित ( सिकुड़कर फैलने ),
ऊपर तथा नीचे उठने ( उद्वाहित ) तथा ऊपर की ओर घूमने ( चलने )
की दशा के भेद से इस मुद्रा में होने वाले कार्य बतलाता हूँ ॥ ६५ ॥
चक्रं तटित्पताकामञ्जर्यः कर्णचूलिकाश्चैव ।
कुटिलगतयश्च सर्वे निर्देश्यास्साधुवादाश्च ॥ ६६ ॥
बालोरगपल्लवधूपदीपवल्ली-लताशिखण्डाश्च ।
परिपतनवक्रमण्डलमभिनेयोऽन्यूर्ध्वलोलितया ॥ ६७ ॥
इस मुद्रा में यदि तर्जनी को ऊपर की ओर उठाकर घुमाया जाये तो
इससे चक्र, बिजली, पताका, पुष्पमंजरी, कर्णपूर ( कर्णचूलिका ) सभी प्रकार
की तिरछी रेखाएं ( कुटिलगति ), साधुवाद की ध्वनियां, बाल सर्प,
[
नवमोऽध्यायः ५३
तो इससे दाढ़वाले प्राणीजन का, यदि इसी अंगुली को गोल घुमाया जाए
तो उससे ( किसी व्यक्ति द्वारा ) सभी वस्तु का ग्रहण करना, यदि
झुका कर फिर इसी अंगुली को ऊपर उठाली जाए तो इससे दीर्घअभ्यास
तथा दिवस का तथा यदि यही मुंह के समीप ले जाकर मोड़ी तथा ऊपर
नीचे लेजाई जाए तो उससे वाक्यों का अर्थ बोध प्रदर्शित किया जाता
है ॥ ६८-७० ॥
मेति¹ वदेति च योज्या प्रसारितोत्कम्पितोत्ताना ।
कार्या प्रकम्पिता रोषदर्शने स्वेद²रूपणे चैव ॥ ७१ ॥
इसी प्रकार यदि निषेध एवं सम्भाषण का अर्थ प्रदर्शित करना होतो
इस मुद्रा में तर्जनी उंगली को फैलाकर हिलाते हुए ऊपर की ओर उठा
लेना चाहिए ॥ ७१ ॥
कुन्तल³कुण्डलाङ्गदगण्डाश्रयं⁴संश्रयेऽभिनये ।
गर्वेऽहमिति ललाटे रिपुनिर्देशे तथैव च क्रोधे ॥ ७२ ॥
इसी मुद्रा को यदि कम्पित रखा जाए तो उससे क्रोध, स्वेद, केश (कुन्तल),
कुण्डल, अङ्गद तथा गण्डस्थल का सजाना बतलाया जाता है तथा ललाट
पर रखने से गर्व क्रोध तथा शत्रु का निर्देश सूचित होता है ॥ ७२ ॥
कोऽसाविति निर्देशे⁵ च कर्णकण्डूयने चैव ।
संयुक्ता संयोगे कार्या विश्लेषिता वियोगे च ॥ ७३ ॥
कलहे स्वस्तिकयुक्ता परस्परोत्पीडिता बन्धे ।
द्वाभ्यान्तु वाम⁶पार्श्वे दक्षिणतो दिननिशावसानानि ॥ ७४ ॥
अभिमुखपराङ्मुखीभ्यां विश्लिष्टाभ्यां प्रयुञ्जीत ।
इसी मुद्रा से कौन हैं ? इस प्रश्न को करने तथा कानों के खुजलाने
का अर्थ सूचित करना हो तो ललाट प्रदेश के समीप तर्जनी को रखना
चाहिए । दोनों हाथों को सूचीमुख मुद्रा में मिलाने से संयोग तथा हटा
लेने पर वियोग सूचित होता है । यदि दोनों हाथों को 'स्वस्तिक' कर ले
तो उससे पारस्परिक कलह तथा दोनों सूचीमुख हाथ एक दूसरे के सम्मुख
रखकर फिर बायीं ओर ( अलग ) ले जाए तो उससे रात्रि की समाप्ति
( शयन से उठना ) सूचित होती है ॥ ७३-७४ ॥
[
५४ नाट्यशास्त्रम्
द्वाभ्यां प्रदर्शयेन्नित्यं सम्पूर्णं चन्द्रमण्डलम् ।
श्लिष्टा ललाटे शक्रस्य कार्या ह्युत्तानसंश्रया ॥ ७५ ॥
यदि दो सूचीमुख हस्त हों तो उससे सम्पूर्ण चन्द्रमण्डल का तथा
यदि ललाट के समीप खड़ी स्थित हो तो उससे इन्द्र का उत्कर्ष बतलाया
जाता है ॥ ७५ ॥
पुनरपि च भ्रमिताग्रा रूपशिलावर्तयन्त्रशैलेषु ।
परिवेषणे तथैव हि कार्या चाधोमुखी नित्यम् ॥ ७६ ॥
यदि सूचीमुख हस्त को गोल घुमाव दे दिया जाए तो इससे स्वरूप,
शिला, भँवर ( आवर्त्त ), यन्त्र तथा शैल ( शिखर ) बतलाए जाते हैं, यदि
इसी मुद्रा में हाथों को नीचे मुँह किये रखा जाए तो उससे भोजन
परोसना प्रदर्शित होता है ॥ ७७ ॥
श्लिष्टा ललाटपट्टेष्बधोमुखी शम्भु³रूपणे कार्या ।
शक्रस्याप्युत्ताना तज्ज्ञैस्तिर्यक्स्थिता कार्या ॥ ७७ ॥
यदि ललाट के पास नीचा मुँह रखते हुए इसी मुद्रावाले हाथ को रखा
जाए तो उससे 'शिव' का ( त्रिनेत्र- ) स्वरूप तथा यदि ऊपर की ओर मुँह
रखकर तिरछा कर लिया जाए तो 'इन्द्र' का ( सहस्र नेत्रोंवाला ) स्वरूप
प्रदर्शित हो जाता है ॥ ७७ ॥
'पद्मकोषः—
यस्याङ्गुल्यस्तु विरलाः सहाङ्गुष्ठेन कुञ्चिताः ।
ऊर्ध्वा ह्यसङ्गताग्राश्च स भवेत् पद्मकोषकः ॥ ७८ ॥
यदि अंगूठे सहित सभी उंगलियां ऊपर की ओर मुँह वाली अलग-
अलग तथा सिकुड़ी हुई रखी जाए तो 'पद्मकोष' हस्त हो जाता है ॥७८॥
बिल्वकपित्थफलानां ग्रहणं कुचदर्शनञ्च नारीणाम् ।
ग्रहणे ह्यामिषलाभे भवन्ति ताः कुञ्चिताग्रास्तु ॥७९॥
[ बहुजातिबीजपूरकमामिषखण्डञ्च निर्देिश्यम् । ]
१. पद्मकोषः ( उत्पत्ति कथा ) भगवान विष्णु¹ने सुदर्शन चक्र की प्राप्ति के
लिए भगवान शिव की स्तुति तथा पद्म पुष्पों के अर्पण हेतु इसी हस्त का
उपयोग किया । तभी से इसका प्रचलन हुआ ।
१. द्वाभ्यां सन्दश्ये—ख० ग० । २. चाधोमुखी नित्या—ख० ग० ।
३. शम्भुरूपेण—ग० । ४. शक्रस्याभ्युत्थानात्—ख० ग० ।
नवमोऽध्यायः ५५
योजना—इसके द्वारा बिल्व तथा कैथा ( कपित्थ ) फल तथा स्त्रियों
के उरोजों का अर्थ सूचित होता है । यदि इन अंगुलियों के अग्रभाग
सिकुड़े हुए रखे जाए तो ( इससे ) ( किसी वस्तु के ) ग्रहण तथा मांस
की प्राप्ति तथा अनेकविध फल, ( बिल्व तथा कपित्थ के अतिरिक्त )
बीजपूर ( बिजौरा ) तथा मांसखण्ड की सूचना दी जाती है ॥ ७९ ॥
देवार्चनबलिहरणे समुद्गके साग्रपिण्डदाने च ।
कार्यः पुष्पप्रकरश्च पद्मकोशेन हस्तेन ॥ ८० ॥
इस पद्मकोश मुद्रा के द्वारा देवार्चन, बलिप्रदान, डलिया (समुद्गक), प्रथम
पिण्ड प्रदान तथा पुष्पों का विकीर्ण करना प्रदर्शित किया जाता है ॥ ८० ॥
मणिबन्धनश्लिष्टप्रविरलचलिताङ्गुलिकराभ्याम् ।
कार्यो विवर्त्तिताभ्यां विकसितकमलोत्पलाभिनयः ॥८१॥
यदि पद्मकोष मुद्रावाले दोनों हाथों को कलाई से मिलाते हुए
पीछे की ओर ले जाए तथा अंगुलियों की हिलती हुई रखे तो उससे
विकसितकमल तथा कुमुदिनी का अर्थ प्रदर्शित होता है ॥ ८१ ॥
'सर्पशीर्ष—
अङ्गुल्यस्संहतास्सर्वाः सहाङ्गुष्ठेन यस्य तु ।
तथा निम्नतलश्चैव स तु सर्पशिराः करः ॥ ८२ ॥
यदि सभी अंगुलियां अंगूठे सहित एक दूसरे से मिली हुई हों और
हथेली झुकी ( या गहरी ) रखी जाए तो ( सर्प के फन के समान हो
जाने के कारण ) सर्पशीर्ष हस्त बन जाता है ॥ ८२ ॥
एष सलिलप्रदाने भुजगगतौ तोयसेचने चैव ।
आस्फोटने च योज्यः करिकुम्भास्फालनाद्येषु ॥ ८३ ॥
योजना—पितरों को जलांजलि देने, सर्पगति, जल सिंचन, मल्लयुद्ध
१. सर्पशीर्ष ( उत्पत्तिकथा ) भगवान विष्णु ने वामन अवतार में बलि
को बन्धन तथा देवगण की रक्षार्थ वचन देते हुए उन कार्यों का इसी हस्त द्वारा
संकेत किया था । तभी से इस मुद्रा का प्रचलन हुआ ।
१. सङ्ग्रहे चात्र—ग० ।
२. मणिबन्धनश्लिष्टाभ्याम विरलचलिताङ्गुलीयुतकराभ्याम्—ख० ग० ।
३. कार्योपवर्तिताभ्यां—ख-ग० । ४. सहिताः—ग० ।
५. सर्वशिराः—ख० ग० ।
५६ नाट्यशास्त्रम्
में जंघा तथा भुजाओं के ठोकने और हाथी के कुम्भस्थल को थपथपाने
का इस मुद्रा से प्रदर्शन किया जाता है ॥ ८३ ॥
१मृगशीर्ष—
अधोमुखीनां सर्वासामङ्गुलीनां समागमः ।
कनिष्ठाङ्गुष्ठकावूर्ध्वौ स भवेन्मृगशीर्षकः ॥ ८४ ॥
यदि कनिष्ठिका अंगुली तथा अंगूठे को सीधा और शेष अंगुलियाँ
झुके हुए मुंह वाली रखी जाएँ तो 'मृगशीर्ष' हस्त होता है ॥ ८४ ॥
इह साम्प्रतमस्त्यद्य च शक्ते१श्चोल्लासनेऽक्षपाते च ।
स्वेदापमार्जनेषु च कुट्टमिते प्रचलितं२स्तु भवेत् ॥८५॥
योजना—इसके द्वारा यहां, अभी, यह है, आज जैसे अर्थ का सूचन,
शक्ति के उठाने तथा पासों के फेंकने को प्रदर्शित करते हैं । यदि इसी मुद्रा
में हाथ धूजता हुए रखा जाए तो उससे पसीने का पोंछना तथा स्त्रियों
की कुट्टमित चेष्टा को बतलाया जाता है ॥ ८५ ॥
२कंगुल—
त्रेताग्निसंस्थिता मध्यात्तर्जन्यङ्गुष्ठका यदा ।
काँ३ङ्गुलेऽनामिका वक्रा तथा चोर्ध्वा कनीयसी ॥ ८६ ॥
यदि मध्या, तर्जनी तथा अंगूठे पृथक्-पृथक् रहें, अनामिका उंगली
टेढ़ी तथा कनिष्ठिका खड़ी रहे तो 'कंगुल' हस्त मुद्रा होती है ॥ ८६ ॥
एतेन तरुणफलरूपाणानि नानाविधानि च ल४घूनि ।
कार्याणि रोषजानि स्त्रीवचनान्यङ्गुलिक्षेपैः ॥८७॥
१. मृगशीर्ष ( उत्पत्तिकथा ) भगवान शिव की प्राप्ति के लिए पार्वती ने
तपस्या करते हुए अपने ललाट पर तीन चन्दन-रेखाओं का त्रिपुण्ड्र इसी हस्त
द्वारा धारण किया । तभी से इसका प्रचलन हुआ ।
२. कंगुल ( उत्पत्तिकथा ) भगवान शिव ने क्षीरसागरमन्थन के अवसर
पर उसमें से निकले हुए कालकूट विष की गुटिका बनाकर पीने के लिए इसी
हस्त का उपयोग किया था । तभी से इसका प्रचलन हुआ ।
१. शक्यश्चेञ्चालने—ख० ग० । २. प्रचलिते तु—ख० ग० ।
३. अङ्गुले—ख० ग० । ४. लघूनि कार्याणि—ग० ।
५. रोषजातिस्त्री—ग० ।
नवमोऽध्यायः ५७
योजना—इसके द्वारा अनेकविध छोटे-छोटे (सुपारी, बेर इत्यादि)
फलों तथा स्त्रियों के रोषपूर्णवचनों को अंगुली के आक्षेप (घुमाने) के द्वारा
प्रदर्शित किया जाता है ॥ ८७ ॥
[ मरकतवैडूर्यादेः प्रदर्शनं सुमनसाञ्च कर्तव्यम् ।
ग्राह्यं विडालपदमिति तज्ज्ञैरेवं प्रयोगेषु ॥ ]
(प्रक्षिप्त—मरकत वैडूर्य आदि मणि, पुष्पों का ग्रहण तथा बिल्ली का
बैठने आदि का स्थान भी इसी के द्वारा प्रदर्शित किया जाए ।)
१अलपल्लव (अलपद्मक)
आवर्तिताः२ करतले यस्याङ्गुल्यो भवन्ति हि ।
पार्श्वगत-विकीर्णाश्च स भवेदल३पल्लवः ॥ ८८ ॥
यदि सारी अंगुलियां हथेली में गोल आकार में सिकुड़ी हुई तथा
बिखरी हुई रखी जाए तो 'अलपल्लव' मुद्रा कहलाती है ॥ ८८ ॥
प्रतिषेधकृते योज्यः कस्य त्वं नास्ति शून्यवचनेषु ।
पुनरात्मोपन्यासः स्त्रीणामेतेन कर्त्तव्यः ॥८९॥
योजना—इसके द्वारा प्रतिषेध, 'तुम कौन हो' जैसे प्रश्नवाक्य, नहीं
हैं, शून्यवचन (मिथ्याधिक्षेप-जैसे मूर्ख, इत्यादिवचन) तथा स्त्रियों के अहम्
का आपादन (स्थापना) या विस्मय का प्रदर्शन किया जाए ॥ ८९ ॥
२चतुर—
तिस्रः प्रसारिता यत्र तथा चोर्ध्वा कनीयसी ।
तासां मध्ये स्थितो४ऽङ्गुष्ठः स करश्चतुरः स्मृतः ॥ ९० ॥
जिसमें तीनों उंगुलियों को सामने फैलाकर तथा कनिष्ठिका को सीधा
१. अलपल्लव (उत्पत्तिकथा) भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा माखन-चोरी करते
समय इसी हस्त का उपयोग करने पर इसका प्रचलन हो गया ।
२. चतुर (उत्पत्तिकथा) काश्यप ऋषि ने इस हस्त का उपयोग अमृत
लाने के लिए जाने वाले गरुड़ को मार्ग-दर्शन करने के अवसर पर किया था ।
तभी से इसका प्रचलन हुआ ।
१. मरकतवैडूर्यादीनां निदर्शनं कार्यम्—ख० ग० ।
२. आवर्तिन्यः—ख० ग० । ३. दलपद्मकः—ग० ।
४. मध्यस्तथाङ्गुष्ठः—ग० ।
५८ नाट्यशास्त्रम्
उठाया जाय और उनके मूल में अंगूठे को रखे तो ‘चतुर’ हस्त
हो जाता है ॥ ९० ॥
नयं¹विनयनियमसुनिपुणबालातुरसत्त्वकैतवार्थेषु ।
वाक्ये युक्ते पथ्ये सत्ये प्रशमे च विनियोज्यः ॥९१॥
योजना:—नीति, विनय, नियम-चातुर्य ( सुनिपुण ), बाला (कन्या),
रोगी, बल ( सत्त्व ) कैतवयुक्त प्रयोजन या बात एवं पथ्यवचन, सत्य तथा
प्रशम का अर्थ इस हस्तमुद्रा के द्वारा बतलाया जाता है ॥ ९१ ॥
एकेन द्वाभ्यां वा किञ्चिन्मण्डलकृतेन हस्तेन³।
विवृत⁴विचारितचरितं वितर्कितं लज्जितञ्चैव ॥९२॥
एक या दो ‘चतुर’ मुद्रा वाले हस्तों के थोड़े घुमाव द्वारा—प्रकट
करना ( विवृत ), विचारकरना, आचरणकरना ( चलना-हिलना )
आशंका करना तथा लज्जाकरना बतलाया जाता है ।
नयनौपम्यं पद्मदलरूपणं हरिणकर्णनिर्देशः ।
संयुक्तकरणेनैव तु चतुरेणैतानि कुर्वीत ॥ ९३ ॥
दो संयुक्त चतुर-हस्तों द्वारा कमल दलों की नयनों से उपमा देना
तथा हरिणों के कानों को बतलाया जाता है ॥ ६३ ॥
लीला⁸-रती रुचिश्च स्मृतिबुद्धिविभावनाः क्षमा पुष्टिम् ।
संज्ञामात्रां⁹ प्रणयं विचारणं सङ्गतं शौचम् ॥९४॥
चातुर्यं माधुर्यं दाक्षिण्यं मार्दवं सुखं शीलम् ।
प्रश्नं¹⁰ वार्तायुक्तिं वेषं मृदुशाद्वलं¹¹ स्तोकम् ॥ ९६ ॥
विभवाविभवौ सुरतं गुणागुणौ यौवनं गृहं¹² दारान् ।
नानावर्णांश्च तथा चतुरेणैवं प्रयुञ्जीत ॥ ९७ ॥
इसके अतिरिक्त चतुर-हस्त के द्वारा क्रीडा ( लीला ), अनुराग
१. नयननिपुणसमसुनिपुणबालातुरशव्यकैतवार्थेषु—ग० ।
२. प्रथमे—ख० । ३. हस्तदण्डेन—ग० ।
४. विवृतविचारितरचितं ख, विधुतविचरितचरितं—ग० ।
५. विवर्जितं—ग० । ६. कर्णनिर्देशम्—ख० ।
७. संयुक्तकरेणैव च—ख० ग० । ८. लीलां रति—ख० ग० ।
९. संज्ञामाशां—ख० ग० । १०. प्रशमं वार्तायुक्ति—ग० ।
११. शाद्वलं—ख० ग० । १२. गृहान् दारान्—ग० ।