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मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा

DevanagariHindipublished100 पृष्ठ

४२ मत्तविलास-प्रहसन
(देवसोमा कपालिने सुरां प्रयच्छति)
कपाली-(पीत्वा) प्रिये ! त्वयापि श्रमापनोदः कर्तव्यः ।
देवसोमा-भअवं ! तह । [भगवन् ! तथा ।] (पिबति)
कपाली-अयमस्माकमपकारी । संविभागप्रधानः स्व-
सिद्धान्तः ।४५ शेषमाचार्याय प्रदीयताम् ।
देवसोमा-जं भअवं आणवेदि । गह्र्,णदु भअवं । [यद्
भगवानाज्ञापयति । गृह्,णातु भगवान्४६ ।]
शाक्यभिक्षुः-(आत्मगतम्) अहो सुहोवणदो अब्भुदओ ।
एत्तओ दोसो-महाजणो पेक्खिस्सदि । (प्रकाशम्) भोदि ! मा मा
एवं । ण वड्ढेदि अम्हाणं । [अहो सुखोपनतोऽभ्युदयः । एतावान्४७
दोषः-महाजनो द्रक्ष्यति । भवति ! मा मैवम् । न वर्धतेऽस्माकम्।]
(सृक्वणी लेढि)
देवसोमा-धंस । कुदो दे एत्तिआणि भाअधेआणि ।
[ध्वंसस्व४८ । कुतस्ते एतावन्ति भागधेयानि ।]
कपाली-प्रिये ! इयमस्येच्छाविरोधिनी वाग् मुखप्रसेकेन
स्खल(य?)ति ।
शाक्यभिक्षुः-इदाणिं वि णत्थि दे करुणा । [इदानीमपि
नास्ति ते करुणा ।]
कपाली-यद्यस्ति करुणा, कथं वीतरागो भविष्यामि ।
शाक्यभिक्षुः-एवं वीदरागिणा वीदरोसेण विहोदव्वं [एवं
वीतरागिणा वीतरोषेणापि भवितव्यम् ।]
कपालो-वीतरोषो भविष्यामि, यदि मे स्वकं दास्यति ।
शाक्यभिक्षुः-किं दे सअं । [किं ते स्वकम् ।]
कपाली-कपालम् ।
शाक्यभिक्षुः-कहं कवालं । [कथं ४६कपालम् ।]

४५. -न्तः प्रमाणयितव्यः । ४६. भवान् । ४७. अत्र खलु एष दो- ।
४८. दुष्ट ! कुतस्ते एतानि भा- । ४६. कस्मिन् क- ।

हिन्दी अनुवाद ४३
(देवसोमा कपाली को मदिरा देती है )
कपाली—(पीकर) प्रिये ! तुम्हें भी थकान दूर करनी चाहिए ।
देवसोमा—भगवन् ! अच्छा । (पीती है )
कपाली—यह हमारा अपकार करने वाला है । (लेकिन) हमारा
सिद्धान्त बराबर बांटने पर ज़ोर देता है । बचे हुए को आचार्य को दे दो ।
देवसोमा—जैसी आप आज्ञा देते हैं । आर्य ग्रहण करें ।
शाक्यभिक्षु—(अपने आप) अहा ! (यह) सौभाग्य सहज ही प्राप्त
हुआ है । दोष केवल इतना है कि—महात्मा लोग देख लेंगे । (प्रकट)
देवि ! नहीं-नहीं । यह हमारे लिए उचित नहीं है । (होंठ चाटता है )
देवसोमा—दूर हो जा । तेरा इतना भाग्य कहाँ ?
कपाली—प्यारी ! इसकी यह इच्छा के विरुद्ध वाणी, मुंह में पानी
भर आने के कारण लड़खड़ा रही है ।
शाक्यभिक्षु—अब भी तुम्हें दया नहीं आती ?
कपाली—यदि दया रही तो वैरागी कैसे होऊँगा ?
शाक्यभिक्षु—राग से रहित व्यक्ति को क्रोध से रहित (व्यक्ति) भी
होना चाहिए ।
कपाली—क्रोध नहीं करूँगा, यदि मुझे अपना (कपाल) दे देगा ।
शाक्यभिक्षु—तुम्हारा अपना क्या है ?
कपाली—कपाल ।
शाक्यभिक्षु—कैसा कपाल ?

४४ मत्तविलास-प्रहसन
कपाली—कथं कपालमित्याह । अथवा युक्तमेतत् ।
दृष्टानि वस्तूनि महीसमुद्रमहीधरादीनि महान्ति मोहात् ।
अपह्नुवानस्य सुतः कथं त्वमल्पं न निह्नोतुमलं कपालम् ॥१३॥
देवसोमा—भववं ! केवलं लालीयमाणो ण दइस्सिदि । ता
एदस्स हत्थादो आच्छिन्दिअ गच्छामो । [भगवन् ! केवलं लाल्यमानो
न दास्यति । तदेतस्य हस्तादाच्छिद्य गच्छावः ।]
कपाली—प्रिये ! तथा । (आच्छेत्तुं व्याप्रीयते५०)
शाक्यभिक्षुः—धंस दुट्ठकवालिअ ! [ध्वंसस्व५१ दुष्ट-
कापालिक !]
(हस्तेन नुदन्५२ पादेन ताडयति)
कपाली—कथं पतितोऽस्मि ।
देवसोमा—मुदो सि दासीएवुत्त ! (केशापकर्षणं५३
रूपयित्वा निरालम्बना पतिता) [मृतोऽसि दास्याः पुत्रः !]
शाक्यभिक्षुः—(आत्मगतम्) अघं बुद्धस्स विण्णाणं जेण मुण्डणं
दिट्ठं । (प्रकाशम्) उट्ठेहि, उट्ठेहि उसिए ! उट्ठेहि । [अहं
(अर्घं वा) बुद्धस्य विज्ञानं, येन मुण्डनं दृष्टम् । उत्तिष्ठोत्तिष्ठ
उपासिके उत्तिष्ठ ।] (इति देवसोमा५४मुत्थापयति ।)
कपाली—पश्यन्तु पश्यन्तु माहेश्वराः अनेन दुष्टभिक्षुनाम-
धारकेण नागसेनेन मम प्रियतमापाणिग्रहणं क्रियमाणम् ।
शाक्यभिक्षुः—आ वुस ! मा मा एवं । धम्मो खु अम्हाणं
विसमपदिदाणुकम्पा । [आ उपासक ! (आयुष्मन् वा) मा मैवम् ।
धर्मः खल्वस्माकं विषमपति५५तानुकम्पा ।]
कपाली—किमयमपि सर्वज्ञधर्मः, नन्वहं पूर्वं पतितोऽस्मि ।
भवतु किमनेन । इदानीं तव शिरः कपालं मम भिक्षाकपालं
भविष्यति ।
५०. येते । ५१. स गच्छ दु । ५२. न पादेन पातयति ।
५३. केशाकर्षणं । ५४. मां हस्तेन गृह्णाति । ५५. तानां अ—।

हिन्दी अनुवाद ४५
कपाली—'कैसा कपाल' कहता है ? अथवा यह ठीक ही है—
पृथ्वी, सागर, पर्वत आदि विशाल प्रत्यक्ष वस्तुओं को मोह के कारण
छिपाने वाले (बुद्ध) के पुत्र तुम छोटे से कपाल को छिपाने में कैसे समर्थ
नहीं हो ॥१३॥
देवसोमा—स्वामी ! केवल प्यार से नहीं देगा । इसलिए इसके
हाथ से छीन कर चलते हैं ।
कपाली—प्रिये ! ठीक है । (जबरदस्ती छीनता है )
शाक्यभिक्षु—दुष्ट कापालिक ! दूर हो जा । (हाथ से धकेलता
हुआ पैर से मारता है )
कपाली—अरे, मैं गिर पड़ा ।
देवसोमा—अरे दासी के पुत्र ! तू मर गया । (बालों को खींचने
का अभिनय करके आश्रय न पाकर गिर पड़ती है )
शाक्यभिक्षु—(अपने मन में) बुद्ध का विज्ञान ठीक है, जिन्होंने आज
मुण्डन (संस्कार) देखा । उपासिका ! उठो, उठो ।
(तब देवसोमा को उठाता है )
कपाली—माहेश्वरो ! देखें, देखें ! यह दुष्ट भिक्षुनामधारी
नागसेन मेरी प्रियतमा का पाणिग्रहण कर रहा है (हाथ पकड़ रहा है ) ।
शाक्यभिक्षु—अरे उपासक ! नहीं ऐसी बात नहीं है । आपत्ति में
पड़े हुए पर दया करना हमारा धर्म ही है ।
कपाली—क्या यह भी सर्वज्ञ (बुद्ध का) धर्म है । तो पहले मैं
गिरा हूँ । अच्छा रहने दे । इससे क्या ? अब तेरे सिर का कपाल मेरा
भिक्षा का कपाल (पात्र) होगा ।

४६ मत्तविलास-प्रहसन
(सर्वे कलहं रूपयन्ति )
शाक्यभिक्षु:—दुक्खं दुक्खं । [दुःखं दुःखम् । ]
कपाली—पश्यन्तु पश्यन्तु, माहेश्वराः । एष दुष्टभिक्षुनाम-
धारको मम भिक्षापालं मुषित्वा स्वयमेवाक्रन्दति । भवतु,
अहमप्याक्रोशयिष्ये । अब्रह्मण्यम् ! अब्रह्मण्यम् !
(ततः प्रविशति पाशुपतः)
पाशुपतः—सत्यसोम ! किमर्थमाक्रन्दसि ।
कपाली—भो बभ्रुकल्प ! अयं दुष्टभिक्षुनामधारको नागसेनो
मम भिक्षापालं चोरयित्वा दातुं नेच्छति ।
पाशुपतः—(आत्मगतम्) ५६ यदस्माभिरनुष्ठेयं, गन्धर्वैः-
तदनुष्ठितम् । एष दुरात्मा,
तां क्षौरिकस्य दासीं मम दयितां चीवरान्तदर्शिताया ।
आकर्षति काकण्या बहुशो गां ५७ ग्रासमुष्ट्येव ।।१४।।
तदिदानीं प्रतिहस्तिप्रोत्साहनेन ५८ शत्रुपक्षं ध्वंसयामि । (प्रकाशम्)
भो नागसेन ! अप्येवमेतद्, यथायमाह ।
शाक्यभिक्षुः—भअवं ! तुवं पि एवं भणासि । अदिण्णा-
दाणा वेरमणं सिक्खापदं । अब्बम्हचर्या ५९ वेरमणं सिक्खापदं । ६०
अकालभोअणा वेरमणं सिक्खापदं । अह्माअं बुद्धधम्मं सरणं
गच्छामि । [भगवन् ! त्वमप्येवं ६१ भणसि । अदत्तादानाद्विरमणं
शिक्षापदम् । मृषावादाद्विरमणं शिक्षापदम् । अब्रह्मचर्याद्विरमणं
शिक्षापदम् । प्राणातिपाताद्विरमणं शिक्षापदम् । अकालभोजना-
द्विरमणं शिक्षापदम् । अस्माकं बुद्धधर्मं शरणं गच्छामि ।]
पाशुपतः--सत्यसोम ! ईदृश एषां समयः । किमत्र प्रतिवचनम् ।
कपाली--नन्वस्माकमनृतं न वक्तव्यमिति समयः ।
५६ अये ! यद् । ५७. गाः । ५८. न अस्मत् श— । ५९. —म्हञ्च्च ।
६०. दं ओअणकालत्थेराने— । ६१. पि न जानासि । अद— ।

हिन्दी अनुवाद ४७
(सब झगड़े का अभिनय करते हैं )
शाक्यभिक्षु—दुःख है, दुःख है ।
कपाली—अरे माहेश्वरो ! देखें, देखें। यह दुष्ट भिक्षु नामधारी
मेरा भिक्षा कपाल चुराकर स्वयं ही चिल्ला रहा है। अच्छा मैं भी
चिल्लाऊँगा । अमङ्गल ! अमङ्गल !
(तब पाशुपत प्रवेश करता है )
पाशुपत—सत्यसोम ! किसलिए चिल्ला रहे हो ?
कपाली—अरे वभ्रुकल्प ! यह दुष्ट भिक्षु नामधारी नागसेन मेरे भिक्षा
कपाल को चुराकर देना नहीं चाहता है ।
पाशुपत—(स्वगत) जो हमारे द्वारा सम्पन्न किया जाना चाहिए था,
उसे गन्धर्वों ने कर दिया। यह दुष्टात्मा,
नाई की उस दासी के समान मेरी प्रिया को (यह) वस्त्र के मध्य
से दिखाई देने वाली कौड़ी से, घास की मुट्ठी से गाय (को आकर्षित करने)
के समान बार-बार आकर्षित कर रहा है ॥१४॥
इसलिए अब प्रतिद्वन्द्वी के प्रोत्साहन से शत्रुपक्ष को नष्ट करता हूँ ।
(प्रत्यक्ष) अरे नागसेन ! क्या यह ऐसा ही है जैसा यह (कपाली) कहता है ।
शाक्यभिक्षु—भगवन् ! आप भी ऐसा कह रहे हो ? जो (वस्तु)
नहीं दी गई है उसे न लेना ही शिक्षापद है, झूठ न बोलना शिक्षापद है,
ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना शिक्षापद है, प्राणिहिंसा न करना शिक्षापद है,
असमय भोजन न करना शिक्षापद है । अपने बुद्ध धर्म की शरण में जाता हूँ ।
पाशुपत—सत्यसोम ! इनका इस प्रकार का नियम है । इस विषय
में (तुम्हारा) क्या उत्तर है ?
कपाली—अरे हमारा नियम भी तो झूठ न बोलना ही है ।

४८ मत्तविलास-प्रहसन
पाशुपतः--उभयमप्युपपन्नम् । कोऽत्र⁶²निर्णयोपायः ।
शाक्यभिक्षुः-बुद्धवअणं पमाणीकरअन्तो भिक्खूसुराभा-
अणं गण्हादितिको एत्थ हेदू । ⁶³[बुद्धवचनं प्रमाणीकुर्वन् भिक्षुसुरा-
भाजनं गृह्णातीति कोऽत्र हेतुः ।]
पाशुपतः-नहि प्रतिज्ञामात्रेण हेतुवादिनः सिद्धिरस्ति ।
कपाली-प्रत्यक्षे हेतुवचनं निरर्थकम् ।
पाशुपतः-कथं प्रत्यक्षमेव ।
देवसोमा-भअवं एदस्स हत्थे चीवरान्तप्पच्छादिदं कवालं ।
[भगवन् ! एतस्य हस्ते चीवरान्तःप्रच्छादितं कपालम् ।]
पाशुपतः-श्रुतं भवता ।
शाक्यभिक्षुः-भो भअवं ! एदं कवालं ण परकेरअं । [भो
भगवन् एतत् कपालं न परकीयम् ।]
कपाली-तेन हि दर्शय तावत् ।
शाक्यभिक्षुः-तह । [तथा ।] (दर्शयति)
कपाली-पश्यन्तु पश्यन्तु माहेश्वराः ! ⁶⁴कापालिकेन कृत-
मन्वाय्यमस्य भदन्तस्य साधुवृत्ततां च ।
शाक्यभिक्षुः- अदिण्णादाणा वेरमणं सिक्खापदं ।
[अदत्तादानाद्विरमणं⁶५ शिक्षापदम् ।]⁶⁶ (इति पुनस्तदेव पठति)
(उभौ नृत्यतः )
शाक्यभिक्षुः-हद्धि । ⁶७लज्जिदव्वे काले णच्चदि । [हा धिक्
लज्जितव्ये काले नृत्यति ।]
कपाली-आः को नृत्यति । (सर्वतो विलोक्य)⁶८ आ मम
नष्टभिक्षाभाजन⁶९दर्शनकुतूहलमलयानिलप्रयुक्ताया ध्रुवमस्य
नृत्तबुद्धि प्रीतिलताया विलसितेषु ।
६२. को नि । ६३. भो बुद्ध— । ६४. कापालिने कृ —। ६५. णं मुनि शि ।
६६. दम् । (इत्यादि पठित्वा उभौ नृत्यतः) ६७. उदिदव्वे का ।
६८. विलोक्य आत्मगतम् । ६९. भाजनजनितकुतूहल··· ।

हिन्दी अनुवाद ४६
पाशुपत — दोनों (के) ही (नियम) युक्तिपूर्ण हैं। इसमें निर्णय का
क्या उपाय है ?
शाक्यभिक्षु — बुद्ध के वचन को प्रमाण मानने वाला भिक्षु मदिरा के
पात्र को लेता है, इसका क्या कारण है ?
पाशुपत — (किन्तु) प्रतिज्ञामात्र से हेतुवादियों की सिद्धि नहीं होती ।
कपाली — प्रत्यक्ष (प्रमाण) में हेतुवाद निरर्थक है।
पाशुपत—प्रत्यक्ष ही कैसे ?
देवसोमा — स्वामी ! इसके हाथ में वस्त्र के भीतर छिपा हुआ
कपाल है।
पाशुपत — आपने सुना !
शाक्यभिक्षु — अरे भगवन् ! यह कपाल दूसरे का नहीं है।
कपाली — तो जरा दिखा ।
शाक्यभिक्षु — अच्छा । (दिखाता है )
कपाली — अरे माहेश्वरो ! कापालिक द्वारा किए गए अन्याय को
और इस बौद्ध भिक्षु की सज्जनता को देखें, देखें ।
शाक्यभिक्षु — न दी गई वस्तु को न लेना शिक्षापद है। (इस प्रकार
फिर उसी को दोहराता है )
(दोनों नाचते हैं )
शाक्यभिक्षु—अरे धिक्कार है। लज्जित होने के अवसर पर नाच
रहा है।
कपाली—अरे कौन नाच रहा है। (चारों ओर देखकर) अरे !
मेरे खोए हुए भिक्षा के पात्र को देखने से कौतूहल के कारण मलय (पर्वत)
की वायु से हिलती हुई प्रेम रूपी लता के विलासों में इसकी बुद्धि नृत्तमयी
ही हो गई है। (अर्थात् इसे नाच ही दिखाई दे रहा है ।)

५० मत्तविलास-प्रहसन
शाक्यभिक्षुः—भववं ! केण कारणेण एदं ण लक्खीअदि ।
भोः अचिक्खदु भववं । इमस्स वराणो । ७०[भगवन् केन कारणे-
नेतन्न लक्ष्यते । भोः आचष्टां भगवान् । अस्यायं वर्णः ।]
कपाली—किमत्र७१ वक्तव्यम् । ननु मया दृष्टम् । काकादपि
कृष्णमिदं कपालम् ।
शाक्यभिक्षुः—तेण हि एदं ममकेरअं ति सअं एव अब्भुवगदं ।
[तेन ह्येतन्मदीयमिति स्वयमेवाभ्युपगतम् ।]
कपाली—सत्यमभ्युपगतं तव वर्णान्तकरणे नैपुण्यम् ! पश्य,
यदेतदासीत् प्रथमं स्वभावतो मृणालभङ्गच्छविचोरमम्बरम् ।
ननु त्वया नीतमचिन्त्यकर्मणा तदेव बालारुणरागताम्रताम् ॥१५॥
अपिच,
आवृत्तं बहिरन्तश्च कषायेणानपायिना ।
त्वां प्राप्तं स्यात् कथं नाम कपालमकषायितम् ॥१६॥
देवसोमा—हा हदह्नि मन्दभाआ । सव्वलक्खणसम्पण्ण दाए
कमलासणसीसकवालाणुभावस्स पुण्णमासिसोमदंसणस्स णिच्चसुरा-
गन्धिणो एदस्स मलिनपडसंसग्गेण इअं ईदंसी अवत्था संवृत्ता ।
[हा हतास्मि मन्दभागा । सर्वलक्षणसम्पन्नतया कमलासनशीर्षकपा-
लानुभावस्य पौर्णमासीसोमदर्शनस्य नित्यसुरागन्धिन एतस्य मलिन-
पटसंसर्गेणेयमीदृश्यवस्था संवृत्ता ।] (इति रोदिति )
कपाली--प्रिये ! अलं सन्तापेन । पुनःशुचिर्भविष्यति । श्रूयन्ते
हि महान्ति भूतानि प्रायश्चित्तैरपनीतकल्मषाणि भवन्ति । तथा हि-७२
आस्थाय प्रयतो महाव्रतमिदं बालेन्दुचूडामणिः
स्वामी नो मुमुचे पितामहशिरश्छेदोद्भवादेनसः ।
नाथोऽपि त्रिदिवौकसां त्रिशिरसं त्वष्टुस्तनूजं पुरा
हत्वा यज्ञशतेन शान्तदुरितो भेजे पुनःपुरायताम् ॥१७॥
भो ! बभ्रु कल्प ! नन्वेवमेतत् !
पाशुपतः—आगमानु७३गतमभिहितम् ।


७०. भो भगवन् । ७१. किमनृतन्ननु मया । ७२. यथा । ७३. —नुरूपमभि— ।

हिन्दी अनुवाद ५१
शाक्यभिक्षु-हे भगवन् ! यह किस कारण से दिखाई नहीं दे रहा
है ? अरे भगवान् ! आप बताएँ, इसका यह रंग ।
कपाली—इसमें कहना क्या ? मैंने निश्चित रूप से देखा है । यह कपाल
कौए से भी काला है ।
शाक्यभिक्षु—इसीलिए तो यह मेरा (ही) है, यह (तुमने) स्वयं
सिद्ध कर दिया ।
कपाली—रंग बदलने में तो तुम्हारी निपुणता अवश्य ही सिद्ध हो
गई । देखो,
जो यह वस्त्र पहले स्वाभाविक रूप से कमलनाल के तन्तु की सुन्दरता
को चुराने वाला (सफेद) (था) वही अब अचिन्त्यकर्मा तुम्हारे द्वारा
(प्रातःकालीन) नवीन सूर्य की लालिमावाला बना दिया गया है ॥१५॥
और भी,
गेरुए रंग के वस्त्र (चीवर) से बाह्य और अन्तःस्वरूप को ढकने
वाले तुमको प्राप्त हुआ यह कपाल भला कैसे अकषायित (रंगे बिना) रह
सकता है ॥१६॥
देवसोमा—हाय ! मन्दभागिनी मैं मारी गई । सम्पूर्ण लक्षणों से
युक्त होने के कारण ब्रह्मा के शिरःकपाल का अनुकरण करने वाले, पूर्णिमा
के चन्द्रमा के सदृश दर्शनीय, सदैव मदिरा की गन्ध से युक्त इस (कपाल) की
मैले वस्त्रों के सम्पर्क से यह ऐसी दशा हो गई है । (ऐसा कहकर रोती है)
कपाली—प्रिये ! दुःखी मत होओ । फिर से पवित्र हो जाएगा ।
ऐसा सुना जाता है कि महान् लोग प्रायश्चित्त के द्वारा पापों से रहित
(निष्पाप) हो जाते हैं । जैसे कि—
नवीन चन्द्रमारूपी चूडामण्डल वाले हमारे स्वामी (शिव) ब्रह्मा के
सिर को काटने से उत्पन्न पाप के कारण इस (प्रायश्चित्त-रूपी) महाव्रत
का नियमपूर्वक पालन करके (पाप) मुक्त हुए। प्राचीन काल में
देवताओं के स्वामी (इन्द्र) ने भी त्वष्टा के पुत्र त्रिशिरा को मारकर, सौ
यज्ञ (करने) से पापों को शान्त कर, फिर से पुण्यत्व का सेवन
किया ॥१७॥
बभ्रुकल्प ! निस्संदेह ऐसा ही है ।
पाशुपत—आगम के अनुसार ही कहा है ।

५२ मत्तविलास-प्रहसन
शाक्यभिक्षुः—भो०७४वण्णो दाव मए किदो । इमस्स
लट्ठाणपरिमाणं केण णिम्मिदं । [भोः ! वर्णस्तावन्मया कृतः ।
अस्य संस्थानपरिमाणं०७५ केन निर्मितम् । ]
कपाली—ननु मायासन्तानसम्भवाः खलु भवन्तः ।
शाक्यभिक्षुः—केत्तिअं वेलं भवन्तं अक्कोसामि । गण्हदु
भअवं । [कियतीं वेलां भवन्तमाक्रोशामि । गृह्णातु भगवान् ।]
कपाली—नूनमेवं बुद्धेनापि दानपारमिता पूरिता ।
शाक्यभिक्षुः—एवं गदे किं दाणि मे सरण । [ एवं गते किमि-
दानीं मे शरणम् ।]
कपाली—ननु बुद्धधर्मसङ्घाः ।
पाशुपतः—नायं व्यवहारो मया परिच्छेत्तुं शक्यते । तदधि-
करणमेव यास्यामः ।
देवसोमा—भअवं ! जइ एवं, णमो कवालस्स । [भगवन् !
यद्येवं, नमः कपलाय ।]
पाशुपतः—कोऽभिप्रायः ।
देवसोमा—एषो उण अणेअविहारभोअसमधिगवित्तसञ्चओ,
जहाकामं अधिकरणकारुणिआणं मुहाणि पूरेदुं पारेदि । अह्माअं
पुण अहिचम्म भूदिमत्तविभवस्सदरिद्दकवालिअस्स परिआरिआणं
को एत्त विभवो अधिकरणं पवेसिदुं । [एष पुनरनेकविहारसमधि-
गतवित्तसञ्चयो यथाकामम०७६धिकरणकारिणिकानां०७७ मुखानि
पूरयितुं पारयति । अस्माकं पुनरहिचर्मभूतिमात्रविभवस्य०७८
दरिद्रकापालिकस्य परिचारिकाणां कोऽत्र विभवोऽधिकरणं प्रवेष्टुम्]
पाशुपतः—नैतदेवम्०७६—
अजिह्मः सारगुरुभिः स्थिरैः श्लक्ष्णैः सुजन्मभिः ।
तैर्धर्मो धार्यते स्तम्भैः प्रासाद इव साधुभिः ॥१८॥
७४. भोदु वण्णं । ७५. णं तावत् कथम् । ७६. सं कारु ।
७७. —कारुणिका । ७८. —वदरिद्र । ७६. मा मैवम्—।

हिन्दी अनुवाद ५३
शाक्यभिक्षु—अरे ! ठीक है (माना कि) रंग तो मैंने बदल दिया ।
(परन्तु) इसका आकार और परिमाण किसने बदला ?
कपाली—आप लोग तो माया की ही सन्तान हैं !
शाक्यभिक्षु—कितनी देर तक आपकी निंदा करूँ भगवन् ! लीजिए ।
कपाली-वस्तुतः बुद्ध ने भी इस प्रकार दानपारमिता पूर्ण की थी ।
शाक्यभिक्षु—इसके बाद अब मेरी शरण कहाँ ?
कपाली—निस्संदेह बुद्धधर्म के सङ्घ ।
पाशुपत-इस विवाद का निर्णय करना मेरे लिए असम्भव है । तो
न्यायालय ही चलते हैं ।
देवसोमा-यदि ऐसा है तो कपाल को नमस्कार ।
पाशुपत-क्या मतलब ?
देवसोमा-फिर यह अनेक मठों से प्राप्त हुई धनराशि वाला, इच्छा-
नुसार न्यायालय के अधिकारियों के मुखों को (रिश्वत देकर) भर सकता है ।
लेकिन सर्प की केंचुली मात्र जिसकी सम्पत्ति है ऐसे दरिद्र कापालिक की
हम जैसी सेविकाओं के पास न्यायालय में प्रवेश के लिए कौन साधन है ?
पाशुपत-नहीं ऐसी बात नहीं है ।
सरल (स्तम्भ पक्ष में—सीधे) सारगर्भ के कारण गुरु बने हुए (पक्ष
में—भारी), धैर्यशाली (पक्ष में—ठोस), नम्र (पक्ष में-चिकने), सत्कुलोत्पन्न
(पक्ष में-अच्छी नस्ल वाले) उन साधुओं द्वारा धर्म वैसे ही धारण किया
जाता है, जैसे स्तम्भों से महल (धारण किया जाता है) ॥१५॥

५४ मत्तविलास-प्रहसन
कपाली—कृतमनेन। कुतश्चिदपि न्याय्यवृत्तेर्भयं नास्ति।
शाक्यभिक्षुः—भो भअवं ! तुमं दाव अग्गदो होहि। [भो८०
भगवन् ! त्वं तावदग्रतो भव ]
पाशुपतः—बाढम् ।
(सर्वे परिक्रामन्ति)
(ततः प्रविशत्युन्मत्तकः)
उन्मत्तकः—एशे एशे दुट्ठकुक्कुले । शुल्लमंशगब्भं कवालं
गण्हिअं धावशि। दाशीएवुत्त ! कहि गमिश्शिशि । एशे दाणि कवालं
णिक्खिविअ मं खादितुकामो अहिमुहं आहावइ । इमिण पत्थलेण
दन्ताणि शे भंजिश्शं । कहं कवालं उज्झिअ पलाअशि । उम्मत्ते
दुट्ठकुक्कुले ईदिशेण णाम शूलत्तणेण मए शह विलोशं कलेशि ।
गामशूगलं आलुहि अ गगणमुप्पदिदेण शागलेण पडिभञ्जिअ लावणं
बला गहीदे शाक्कशुदे तिमिङ्कले । अइ एलण्डलुकख ! किं भणाशि—
अलिअं अलिअं त्ति । णां एशे मुशलशमविशाललम्बहत्थे दद्दिले मे
शक्खी । अहव तेल्लोककविदिअपलक्कमश्श शक्खिणा कि कय्यं ।
एवं कलिश्शं । कुक्किलखादिअशेशं मंशखण्डं खादिशं । हा हा
मालिदोम्हि, बप्फेण मालिदोम्हि । के एशे मं तालेशि । दुट्ठदालआ
जश्शवा कश्श वा भाअणोओ खु अहं, भीमशेणश्श घटुक्कओ विअ ।
अविअशुणाथ,
गहीदशूला बहुवेशधालिणो शदं पिशाआ उदले वहन्ति मे ।
शदं च वग्घाण णिशग्गभीशणं मुहेण मुञ्चामि अहं महोलये ॥
कहं मं बाहन्ति । पशीदन्तु पशीदन्तु दालअभट्टा । इमश्श मंशखण्डश्श
कालणादो मामं वाहेह । एशे खु अम्हाणं आआलिए शूलनन्दी जावं
णं अवशप्पामि । [एष एष दुष्टकुक्कुरः । शूल्यमांसगर्भं कपालं
गृहीत्वा धावसि८१ । दास्याःपुत्र ! कुत्र गमिष्यसि । एष इदानीं कपालं
निक्षिप्य मां खादितुकामोऽभिमुखमाधावति । (दिशो विलोक्य)
अनेन प्रस्तरेण दन्तानस्य भङ्क्ष्यामि । कथं कपालमुज्झित्वा पलायसे ।
उन्मत्तो दुष्टकुक्कुर ईदृशेन नाम शूरत्वेन८२ मया सहापि८३ रोषं
८०. (पाशुपतमवलोक्य) भो । ८१. धावति । ८२. न सह । ८३. ह विरोधं क-।

हिन्दी अनुवाद ५५
कपाली—इसकी आवश्यकता नहीं । न्यायी व्यक्ति को कहीं से भी
भय नहीं होता है ।
शाक्यभिक्षु-हे भगवन् ! तब तुम्हीं आगे चलो ।
पाशुपत — अच्छा ।
(सब घूमते हैं)
(तब पागल व्यक्ति प्रवेश करता है )
उन्मत्तक-यह दुष्ट कुत्ता । 'शूल्यमांस से युक्त कपाल को लेकर
भाग रहा है। ओ दासी के पुत्र ! कहाँ जायगा ? अब यह कपाल को
फेंककर मुझे खाने की इच्छा से इधर की ओर दौड़ा आ रहा है। (चारों
ओर देखकर) इस पत्थर से इसके दाँतों को तोड़ दूंगा। क्या ? कपाल
को छोड़कर भाग रहा है ? पागल दुष्ट कुत्ते इस प्रकार की वीरता के बल
पर मुझसे क्रोध करता है। गाँव के सूअर पर चढ़कर आकाश में उड़ने वाले
समुद्र ने रावण को कुचल कर इन्द्र के पुत्र तिमिङ्गल को बलपूर्वक पकड़
लिया था। अरे एरण्ड के वृक्ष ! क्या कहते हो—झूठ है, झूठ है। लेकिन
मुसल के समान अत्यधिक लम्बे हाथ वाला यह मेढक मेरा साक्षी है।
अथवा तीनों लोकों में विख्यात पराक्रमी को साक्षी की क्या आवश्यकता ?
(तो) ऐसा करता हूँ। कुत्ते के खाने के बाद अवशिष्ट मांस के टुकड़े को
खाऊँगा। (खाता हुआ भ्रान्त होकर) हाय ! हाय ! आँसुओं से मारा

५६ मत्तविलास-प्रहसन
करोषि । ग्रामशूकर८४मारुह्य गगनमुत्पतितेन सागरेण८५ प्रभ-८६
ञ्ज्यरावणं८७ बलाद्गृहीतः८८शक्रसुतस्तिमिङ्गिलः८६ । अयि
एरण्डवृक्ष ! किं भणसि अलीकमलीकमिति । नन्वेष मुसलसम-
विशाललम्बहस्तो दर्दुरी मे साक्षी६० । अथवा त्रैलोक्यविदित-
पराक्रमस्य साक्षिणा किं कार्यम्६१ । एवं६२ करिष्यामि । कुक्कुर-
खादितशेषं मांसखण्डं खादिष्यामि । (खादन्भ्रान्तः) हा हा
मारितोऽस्मि वाष्पेण६३ मारितोऽस्मि (रुदित्वा विलोक्य) क एष मां
ताडयसि । (विलोक्य) दुष्टदारकाः ! यस्य वा कस्य वा भागिनेयः
खल्वहं भीमसेनस्य घटोत्कच इव । अपि च शृणुथ
गृहीतशूला बहुवेशधारिणाः शतं पिशाचा उदरे वहन्ति६४मे ।
शतं च व्याघ्राणां निसर्गभीषणं मुखेन मुञ्चाम्यहं महोरगान् ॥१६॥
कथं मां बाधन्ते । प्रसीदन्तु दारकभर्तारः । अस्यमांसखण्डस्य कार-
णाद् मा मां६५ बाधध्वम् । (अग्रतो विलोक्य) एष खल्वस्माकमा-
चार्यः शूरनन्दी । यावदेनमुपसर्पामि ।] (इति धावति)
पाशुपतः — अये ! अयमुन्मत्तः इत एवाभिवर्तते । य एषः,
निर्विष्टोज्झितचित्रचीवरधरो रूक्षैर्नितान्ताकुलैः
केशैरुद्धतभस्मपां६६सुनिचयैर्निर्मात्यमालाकुलैः६७ ।
उच्छिष्टाशनलोलुपैर्बलिभुजामन्वास्यमानो गणै-
र्भूयान् ग्रामकसारसञ्चय इव भ्राम्यन् मनुष्याकृतिः ॥२०॥
८४. र गल मा — । ८५. श्वगणेन । ८६. प्रतिभज्य ।
८७. ञ्ज्य ऐरावतं गृ — । ८८. तः ससुतः ।
८६. ग्रामसूकरः कुक्कुरः, तस्य गलं कण्ठं, गगनमुत्पतितेन मया श्वगणेन
सह ऐरावतं प्रतिभज्य गृहीतः ससुतस्तिमिङ्गिल इति उन्मत्तप्रलापः ।
६०. हनुमत एषा मुसलसमविशाललम्बहस्ते दर्दुरे मे शक्तिः ।
६१. अथवा किं मम त्रैलोक्यविदितपराक्रमस्य शक्त्या कार्यम् ।
६२. — वं तावत् करिष्ये । ६३. मालितोऽस्मि वाषेण ।
६४. — स — । ६५ मां ताउयथ । ६६. पाण्डुनि— ।
६७. — लावृतः, — लावृतैः ।

हिन्दी अनुवाद ५७
गया। (रोकर, देखकर) यह कौन मुझे मार रहा है ! (देखकर) अरे दुष्ट
लड़को ! मैं भीमसेन का घटोत्कच के समान जिस किसी का भी भान्जा
हूँ, और भी सुनो—
शूल ग्रहण किए हुए, नाना वेषधारी सैकड़ों पिशाच मेरे पेट में
घूम रहे हैं। स्वभाव से भयङ्कर मैं सैकड़ों बाघों को और बड़े-बड़े सर्पों को
मुख से उगल रहा हूँ ॥१६॥
मुझे कष्ट क्यों दे रहे हो ? अरे युवको ! प्रसन्न हो जाओ। इस मांस के
टुकड़े के कारण मुझको कष्ट मत दो। (सामने देखकर) अरे ये हमारे गुरु
शूरनन्दी ! तो इनके पास जाता हूँ। (दौड़ता है )
पाशुपत—अरे यह पागल इधर ही आ रहा है। जो यह—
सूखे हुए, अत्यधिक बिखरे हुए, उड़ती हुई भस्म और धूलि समूह से
भरे हुए, बासी मालाओं से व्याप्त बालों से, जूठा खाना खाने के लिए
लोलुप कौओं के समूह जिसका पीछा कर रहे हैं (ऐसा), पहनने के पश्चात्
छोड़े हुए विचित्र वस्त्र धारण करने वाला, मानों बहुत सारा गाँव के
कूड़े का ढेर ही मनुष्य का आकार धारण करके घूमता हुआ (इधर ही आ
रहा है ) ॥२०॥

५८ मत्तविलास-प्रहसन
उन्मत्तकः—जावणं उपशप्पमि । महाशाहणो चराधाल
कुक्कुलश्श शाआशादो अहिगदं एदं कवालं पडिगह्हदु भअवं ।
[^६८यावदेनमुपसर्पामि । (उपसृत्य) महासाधोश्चण्डालकुक्कुरस्य
सकाशादधिगतमेतत्^६६कपालं प्रतिगृह्णातु भगवान्^१००।]
पाशुपतः—(सहृष्टिक्षेपम्) पात्रे प्रतिपाद्यताम् ।
उन्मत्तकः—महाबम्हण ! कलिअदु पशादो । [महाब्राह्मण !
क्रियतां प्रसादः ।]
शाक्यभिक्षुः—एषो महापासुवदो एदस्स जोग्गो । [एष
महापाशुपत एतस्य योग्यः ।]
उन्मत्तकः—(कपालिनमुपगम्य कपालं भूमौ निक्षिप्य प्रदक्षिणी-
कृत्य पादयोः पतित्वा) महादेव ! कलिअदु पशादो । एशो दे
अञ्जली । [महादेव ! क्रियतां प्रसादः । एष ते ऽञ्जलिः ।]
कपाली—^१०१अस्मदीयं^१०२ कपालम् ।
देवसोमा—एवं एद [^१०३एवमेतत् ।]
कपाली—भगवत्प्रसादात् पुनरपि कपाली संवृत्तः । (ग्रहीतु-
मिच्छति ।)
उन्मत्तकः—दाशीएवुत्त ! विशं खादेहि । [दास्याःपुत्र ! विषं
खाद ।] (कपालमाच्छिद्य गच्छति)
कपाली—(अनुसृत्य) एष^१०४ यमपुरुषो मे जीवितं हरति ।
अभ्यवपद्येतां भवन्तौ ।
उभौ—होदु अम्हे दे सहाआ होम । [भवतु ! आवां ते
सहायौ भवावः ।]
(सर्वे रुन्धन्ति)
कपाली—भोः ! तिष्ठ तिष्ठ ।
उन्मत्तकः—किश्श मं लुन्धन्ति । [कस्मान्मां रुन्धन्ति ।]
कपाली—अस्मदीयं कपालं दत्वा गम्यताम् ।
उन्मत्तकः—मूढ ! कि ण पेक्खशि, शुवण्णभाअणं खु एदं ।
[मूढ ! किं न पश्यसि, सुवर्णभाजनं खल्वेतत् ।]
६८. (पाशुपतमवलोक्य) याव— । ६६. —शाद् मया अधि— ।
१००. भगवान् ! भगवान् ! मस्तकेन वन्दामि । १०१. प्रिये अस्म —।
१०२. —दीयमिदं क— । १०३. भगवन् एव— ।
१०४. हन्त यम— ।; कष्टं एषः।

उत्तरोत्तर रहस्योद्घाटन, भरतवाक्य, दार्शनिक समीक्षा एवं उपसंहार

हिन्दी अनुवाद ५६
उन्मत्तक - अब इसके पास जाता हूँ । (पास जाकर) महासज्जन
चण्डाल के कुत्ते से प्राप्त इस कपाल को भगवन् ग्रहण करें ।
पाशुपत—(दृष्टि तिरछी कर) उचित पात्र को दें ।
उन्मत्तक- महाब्राह्मण ! कृपा कीजिए ।
शाक्यभिक्षु-यह महापाशुपत इसके योग्य है ।
उन्मत्तक-(कपाली के पास जाकर कपाल को पृथ्वी पर रखकर,
प्रदक्षिणा करके, पैरों पर गिर कर) महादेव ! कृपा कीजिए । तुम्हारे लिए
यह अञ्जलि है ।
कपाली-हमारा कपाल !
देवसोमा—हां ।
कपाली-भगवान् की कृपा से फिर कपाली बन गया । (लेना
चाहता है )
उन्मत्तक-अरे दासी के पुत्र ! विष खा । (कपाल छीनकर जाने
लगता है)
कपाली-(पीछा करके) यह यमदूत मेरे प्राणों को ले रहा है । आप
दोनों इसे पकड़ें ।
दोनों-ठीकं है । हम दोनों तुम्हारे सहायक बनते हैं ।
(सब रोकते हैं )
कपाली-अरे ! ठहरो, ठहरो ।
उन्मत्तक-मुझे क्यों रोक रहे हो ।
कपाली-हमारे कपाल को देकर जाओ ।
उन्मत्तक-मूर्ख ! क्या देखता नहीं है, यह तो सोने का पात्र है ।

६० मत्तविलास-प्रहसन
कपाली—एवंविधं सुवर्णभाजनं केन कृतम् ।
उन्मत्तक—एदिणा शुवण्णवराणपडावुदेण शुवण्णकारावुत्त-
एण किदं त्ति भअवं ! शुवण्णभाअण त्ति भणामि । [एतेन सुवर्णवर्ण-
पटावृतेन सुवर्णकारा१०५वुत्तेन कृतमिति भगवन् ! सुवर्णभाजन-
मिति भणामि ।]
शाक्यभिक्षुः—किं भणसि ।
उन्मत्तकः—शुवण्णभाअणं त्ति । [सुवर्णभाजनमिति ।]
शाक्यभिक्षुः—किमअं उम्मत्तओ । [किमयमुन्मत्तकः ।]
उन्मत्तकः—उम्मत्तओ त्ति बहुशो एदं शद्दं शुणोमि । एदं
गण्हिअ दलिशेहि उम्मत्तअं । [१०६उन्मत्तक इति बहुश एतं शब्दं
शृणोमि । एतद् गृहीत्वा दर्शयोन्मत्तकम् ।] (कपालिने कपालं
प्रयच्छति)
कपाली—(कपालं गृहीत्वा) अयमिदानीं कुड्येनान्तर्हितः ।
शीघ्रमनुगम्यताम् ।
उन्मत्तकः—लद्धप्पशादे ह्नि । [लब्धप्रसादोऽस्मि ।]
(निष्क्रान्तो जवेनोन्मत्तकः)
शाक्यभिक्षुः—अहो अच्छरिअं । परवक्खस्स लाभेण अहं
परितुट्ठो ह्नि । [अहो आश्चर्यम् । परपक्षस्य लाभेनाहं परितुष्टोऽस्मि ।]
कपाली—(कपालं परिष्वज्य)
चिरं मया चरितमखण्डितं तपो
महेश्वरे भगवति भक्तिरस्ति१०७ मे ।
तिरोहितः स तु सहसा सुखेन न-
स्त्वमद्य यत् कुशलि कपाल ! दृश्यसे ॥२१॥
देवसोमा—भअवं ! चन्दसमागदं विअ पओसं भअवन्तं
पेक्खन्तीए अज्ज आणन्ददो विअ मे दिट्ठी । [भगवन् ! चन्द्रसमा-
गतमिव प्रदोषं भगवन्तं पश्यन्त्या अद्यानन्दतीव मे दृष्टिः ।]
१०५. —कारेण कृत— ।
१०६ युष्माकं उन्मत्तका । युष्माकं पुत्रा उन्मत्तकाः । एतद् दत्वा दर्शयामि
उन्मत्तकत्वम् । १०७. अस्तु ।

हिन्दी अनुवाद ६१
कपाली-ऐसा सोने का पात्र किसने बनाया ।
उन्मत्तक-भगवन् ! सुनहरे वर्ण वाले वस्त्र से (शरीर को) ढकने
वाले मेरे सुनार भगिनीपति ने बनाया है । इसलिए सोने का पात्र है (ऐसा)
कह रहा हूँ ।
शाक्यभिक्षु-क्या कह रहे हो ?
उन्मत्तक-सोने का पात्र ।
शाक्यभिक्षु-क्या यह पागल है ?
उन्मत्तक-'पागल' यह शब्द बार-बार सुनता हूँ । इसे (कपाल को)
लेकर (मुझे) पागल को दिखाओ । (कपाली को कपाल देता है )
कपाली-(कपाल को लेकर) यह तो अब दीवार से ओझल हो गया ।
जल्दी से पीछा करो ।
उन्मत्तक-मुझे प्रसन्नता हुई ।
(पागल तेजी से निकल जाता है )
शाक्यभिक्षु-अरे आश्चर्य है । मैं शत्रुपक्ष के लाभ से हर्षित हुआ ।
कपाली-(कपाल का आलिङ्गन करके)
मैंने बहुत समय तक अखण्ड तप किया है । भगवान् शिव में मेरी
भक्ति है । वह (पागल) तो अचानक सरलतापूर्वक ओझल हो गया, (किन्तु)
हमारे कुशल कपाल ! तुम आज दिखाई दे रहे हो ॥२१॥
देवसोमा-स्वामी ! चन्द्रमा के साथ आए हुए संध्याकाल के समान
आपको देखती हुई मेरी दृष्टि आज प्रफुल्लित हो रही है ।