मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी अनुवाद ५७
गया। (रोकर, देखकर) यह कौन मुझे मार रहा है ! (देखकर) अरे दुष्ट
लड़को ! मैं भीमसेन का घटोत्कच के समान जिस किसी का भी भान्जा
हूँ, और भी सुनो—
शूल ग्रहण किए हुए, नाना वेषधारी सैकड़ों पिशाच मेरे पेट में
घूम रहे हैं। स्वभाव से भयङ्कर मैं सैकड़ों बाघों को और बड़े-बड़े सर्पों को
मुख से उगल रहा हूँ ॥१६॥
मुझे कष्ट क्यों दे रहे हो ? अरे युवको ! प्रसन्न हो जाओ। इस मांस के
टुकड़े के कारण मुझको कष्ट मत दो। (सामने देखकर) अरे ये हमारे गुरु
शूरनन्दी ! तो इनके पास जाता हूँ। (दौड़ता है )
पाशुपत—अरे यह पागल इधर ही आ रहा है। जो यह—
सूखे हुए, अत्यधिक बिखरे हुए, उड़ती हुई भस्म और धूलि समूह से
भरे हुए, बासी मालाओं से व्याप्त बालों से, जूठा खाना खाने के लिए
लोलुप कौओं के समूह जिसका पीछा कर रहे हैं (ऐसा), पहनने के पश्चात्
छोड़े हुए विचित्र वस्त्र धारण करने वाला, मानों बहुत सारा गाँव के
कूड़े का ढेर ही मनुष्य का आकार धारण करके घूमता हुआ (इधर ही आ
रहा है ) ॥२०॥