मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी अनुवाद ४७
(सब झगड़े का अभिनय करते हैं )
शाक्यभिक्षु—दुःख है, दुःख है ।
कपाली—अरे माहेश्वरो ! देखें, देखें। यह दुष्ट भिक्षु नामधारी
मेरा भिक्षा कपाल चुराकर स्वयं ही चिल्ला रहा है। अच्छा मैं भी
चिल्लाऊँगा । अमङ्गल ! अमङ्गल !
(तब पाशुपत प्रवेश करता है )
पाशुपत—सत्यसोम ! किसलिए चिल्ला रहे हो ?
कपाली—अरे वभ्रुकल्प ! यह दुष्ट भिक्षु नामधारी नागसेन मेरे भिक्षा
कपाल को चुराकर देना नहीं चाहता है ।
पाशुपत—(स्वगत) जो हमारे द्वारा सम्पन्न किया जाना चाहिए था,
उसे गन्धर्वों ने कर दिया। यह दुष्टात्मा,
नाई की उस दासी के समान मेरी प्रिया को (यह) वस्त्र के मध्य
से दिखाई देने वाली कौड़ी से, घास की मुट्ठी से गाय (को आकर्षित करने)
के समान बार-बार आकर्षित कर रहा है ॥१४॥
इसलिए अब प्रतिद्वन्द्वी के प्रोत्साहन से शत्रुपक्ष को नष्ट करता हूँ ।
(प्रत्यक्ष) अरे नागसेन ! क्या यह ऐसा ही है जैसा यह (कपाली) कहता है ।
शाक्यभिक्षु—भगवन् ! आप भी ऐसा कह रहे हो ? जो (वस्तु)
नहीं दी गई है उसे न लेना ही शिक्षापद है, झूठ न बोलना शिक्षापद है,
ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना शिक्षापद है, प्राणिहिंसा न करना शिक्षापद है,
असमय भोजन न करना शिक्षापद है । अपने बुद्ध धर्म की शरण में जाता हूँ ।
पाशुपत—सत्यसोम ! इनका इस प्रकार का नियम है । इस विषय
में (तुम्हारा) क्या उत्तर है ?
कपाली—अरे हमारा नियम भी तो झूठ न बोलना ही है ।