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मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा

DevanagariHindipublished100 पृष्ठ

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पृष्ठ 61

हिन्दी अनुवाद ४६
पाशुपत — दोनों (के) ही (नियम) युक्तिपूर्ण हैं। इसमें निर्णय का
क्या उपाय है ?
शाक्यभिक्षु — बुद्ध के वचन को प्रमाण मानने वाला भिक्षु मदिरा के
पात्र को लेता है, इसका क्या कारण है ?
पाशुपत — (किन्तु) प्रतिज्ञामात्र से हेतुवादियों की सिद्धि नहीं होती ।
कपाली — प्रत्यक्ष (प्रमाण) में हेतुवाद निरर्थक है।
पाशुपत—प्रत्यक्ष ही कैसे ?
देवसोमा — स्वामी ! इसके हाथ में वस्त्र के भीतर छिपा हुआ
कपाल है।
पाशुपत — आपने सुना !
शाक्यभिक्षु — अरे भगवन् ! यह कपाल दूसरे का नहीं है।
कपाली — तो जरा दिखा ।
शाक्यभिक्षु — अच्छा । (दिखाता है )
कपाली — अरे माहेश्वरो ! कापालिक द्वारा किए गए अन्याय को
और इस बौद्ध भिक्षु की सज्जनता को देखें, देखें ।
शाक्यभिक्षु — न दी गई वस्तु को न लेना शिक्षापद है। (इस प्रकार
फिर उसी को दोहराता है )
(दोनों नाचते हैं )
शाक्यभिक्षु—अरे धिक्कार है। लज्जित होने के अवसर पर नाच
रहा है।
कपाली—अरे कौन नाच रहा है। (चारों ओर देखकर) अरे !
मेरे खोए हुए भिक्षा के पात्र को देखने से कौतूहल के कारण मलय (पर्वत)
की वायु से हिलती हुई प्रेम रूपी लता के विलासों में इसकी बुद्धि नृत्तमयी
ही हो गई है। (अर्थात् इसे नाच ही दिखाई दे रहा है ।)