मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी अनुवाद ४३
(देवसोमा कपाली को मदिरा देती है )
कपाली—(पीकर) प्रिये ! तुम्हें भी थकान दूर करनी चाहिए ।
देवसोमा—भगवन् ! अच्छा । (पीती है )
कपाली—यह हमारा अपकार करने वाला है । (लेकिन) हमारा
सिद्धान्त बराबर बांटने पर ज़ोर देता है । बचे हुए को आचार्य को दे दो ।
देवसोमा—जैसी आप आज्ञा देते हैं । आर्य ग्रहण करें ।
शाक्यभिक्षु—(अपने आप) अहा ! (यह) सौभाग्य सहज ही प्राप्त
हुआ है । दोष केवल इतना है कि—महात्मा लोग देख लेंगे । (प्रकट)
देवि ! नहीं-नहीं । यह हमारे लिए उचित नहीं है । (होंठ चाटता है )
देवसोमा—दूर हो जा । तेरा इतना भाग्य कहाँ ?
कपाली—प्यारी ! इसकी यह इच्छा के विरुद्ध वाणी, मुंह में पानी
भर आने के कारण लड़खड़ा रही है ।
शाक्यभिक्षु—अब भी तुम्हें दया नहीं आती ?
कपाली—यदि दया रही तो वैरागी कैसे होऊँगा ?
शाक्यभिक्षु—राग से रहित व्यक्ति को क्रोध से रहित (व्यक्ति) भी
होना चाहिए ।
कपाली—क्रोध नहीं करूँगा, यदि मुझे अपना (कपाल) दे देगा ।
शाक्यभिक्षु—तुम्हारा अपना क्या है ?
कपाली—कपाल ।
शाक्यभिक्षु—कैसा कपाल ?