मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी अनुवाद ५५
कपाली—इसकी आवश्यकता नहीं । न्यायी व्यक्ति को कहीं से भी
भय नहीं होता है ।
शाक्यभिक्षु-हे भगवन् ! तब तुम्हीं आगे चलो ।
पाशुपत — अच्छा ।
(सब घूमते हैं)
(तब पागल व्यक्ति प्रवेश करता है )
उन्मत्तक-यह दुष्ट कुत्ता । 'शूल्यमांस से युक्त कपाल को लेकर
भाग रहा है। ओ दासी के पुत्र ! कहाँ जायगा ? अब यह कपाल को
फेंककर मुझे खाने की इच्छा से इधर की ओर दौड़ा आ रहा है। (चारों
ओर देखकर) इस पत्थर से इसके दाँतों को तोड़ दूंगा। क्या ? कपाल
को छोड़कर भाग रहा है ? पागल दुष्ट कुत्ते इस प्रकार की वीरता के बल
पर मुझसे क्रोध करता है। गाँव के सूअर पर चढ़कर आकाश में उड़ने वाले
समुद्र ने रावण को कुचल कर इन्द्र के पुत्र तिमिङ्गल को बलपूर्वक पकड़
लिया था। अरे एरण्ड के वृक्ष ! क्या कहते हो—झूठ है, झूठ है। लेकिन
मुसल के समान अत्यधिक लम्बे हाथ वाला यह मेढक मेरा साक्षी है।
अथवा तीनों लोकों में विख्यात पराक्रमी को साक्षी की क्या आवश्यकता ?
(तो) ऐसा करता हूँ। कुत्ते के खाने के बाद अवशिष्ट मांस के टुकड़े को
खाऊँगा। (खाता हुआ भ्रान्त होकर) हाय ! हाय ! आँसुओं से मारा