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मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा

DevanagariHindipublished100 पृष्ठ

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पृष्ठ 63

हिन्दी अनुवाद ५१
शाक्यभिक्षु-हे भगवन् ! यह किस कारण से दिखाई नहीं दे रहा
है ? अरे भगवान् ! आप बताएँ, इसका यह रंग ।
कपाली—इसमें कहना क्या ? मैंने निश्चित रूप से देखा है । यह कपाल
कौए से भी काला है ।
शाक्यभिक्षु—इसीलिए तो यह मेरा (ही) है, यह (तुमने) स्वयं
सिद्ध कर दिया ।
कपाली—रंग बदलने में तो तुम्हारी निपुणता अवश्य ही सिद्ध हो
गई । देखो,
जो यह वस्त्र पहले स्वाभाविक रूप से कमलनाल के तन्तु की सुन्दरता
को चुराने वाला (सफेद) (था) वही अब अचिन्त्यकर्मा तुम्हारे द्वारा
(प्रातःकालीन) नवीन सूर्य की लालिमावाला बना दिया गया है ॥१५॥
और भी,
गेरुए रंग के वस्त्र (चीवर) से बाह्य और अन्तःस्वरूप को ढकने
वाले तुमको प्राप्त हुआ यह कपाल भला कैसे अकषायित (रंगे बिना) रह
सकता है ॥१६॥
देवसोमा—हाय ! मन्दभागिनी मैं मारी गई । सम्पूर्ण लक्षणों से
युक्त होने के कारण ब्रह्मा के शिरःकपाल का अनुकरण करने वाले, पूर्णिमा
के चन्द्रमा के सदृश दर्शनीय, सदैव मदिरा की गन्ध से युक्त इस (कपाल) की
मैले वस्त्रों के सम्पर्क से यह ऐसी दशा हो गई है । (ऐसा कहकर रोती है)
कपाली—प्रिये ! दुःखी मत होओ । फिर से पवित्र हो जाएगा ।
ऐसा सुना जाता है कि महान् लोग प्रायश्चित्त के द्वारा पापों से रहित
(निष्पाप) हो जाते हैं । जैसे कि—
नवीन चन्द्रमारूपी चूडामण्डल वाले हमारे स्वामी (शिव) ब्रह्मा के
सिर को काटने से उत्पन्न पाप के कारण इस (प्रायश्चित्त-रूपी) महाव्रत
का नियमपूर्वक पालन करके (पाप) मुक्त हुए। प्राचीन काल में
देवताओं के स्वामी (इन्द्र) ने भी त्वष्टा के पुत्र त्रिशिरा को मारकर, सौ
यज्ञ (करने) से पापों को शान्त कर, फिर से पुण्यत्व का सेवन
किया ॥१७॥
बभ्रुकल्प ! निस्संदेह ऐसा ही है ।
पाशुपत—आगम के अनुसार ही कहा है ।